सौ से ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद अपनी पार्टी को बचाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं अखिलेश यादव

By अजय कुमार | Apr 27, 2022

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्ष की लड़ाई की धार लगातार कुंद होती जा रही है। यूपी विधान सभा चुनाव से पहले जहां बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने बीजेपी के खिलाफ हथियार डाल दिए थे, वहीं चुनाव नतीजों में जनता ने कांग्रेस को नकार दिया। प्रियंका वाड्रा पर प्रदेश की जनता ने 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद 2022 के विधान सभा चुनाव में भी भरोसा नहीं किया। बल्कि कांग्रेस की हालत और भी पतली हो गई। पंजाब विधान सभा चुनाव में बड़ा धमाका करने वाली आम आदमी पार्टी यूपी में चारों खाने चित हो गई। ऐसे में थोड़ी बहुत उम्मीद सपा प्रमुख अखिलेश यादव से नजर आ रही थी कि वह अगले पांच वर्षों तक योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रहेंगे, क्योंकि उनकी सीटें बढ़ी थीं। सपा 2017 में 47 सीटें जीत पाई थी औरे इस बार उसने सौ से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की लेकिन 111 विधान सभा सीटें जीतने के बाद भी अखिलेश अपनी पार्टी को बचा नहीं पा रहे हैं। जिस तरह से चुनाव के पहले मायावती और नतीजों के बाद प्रियंका वाड्रा गांधी दीनहीन नजर आ रही थीं, उसी प्रकार अब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में काफी बौने नजर आ रहे हैं। उनके (अखिलेश) परिवार का विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है तो पार्टी के दिग्गज नेता एक के बाद अखिलेश की सियासी समझ पर सवाल खड़ा करके विद्रोह करते जा रहे हैं। विधान सभा चुनाव सम्पन्न हुए अभी दो महीने भी पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी में बगावत का हाल यह है कि ऐसा लग रहा है कि कल चुनाव होने वाला है और जिनको टिकट मिलने की उम्मीद नहीं है, वह पार्टी से किनारा करते जा रहे हैं।

      

राजनीति के जानकारों का कहना है कि पिछले चार चुनावों से यही देखने को मिल रहा है कि अखिलेश यादव अपनी ग़ैर राजनीतिक टीम पर ज़रूरत से ज्यादा भरोसा करने का खामियाजा भुगत रहे हैं। चुनावी रणनीति बनाने के मामले में वो अपने पिता का कभी मुक़ाबला नहीं कर पाए। हाल में सम्पन विधान सभा चुनाव की बात की जाए तो पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सपा प्रमुख ‘वन मैन आर्मी’ की तरह आगे बढ़ते रहे और अपने पिता की तरह जनेश्वर मिश्र, रेवती रमण सिंह, माता प्रसाद पाँडे, बेनी प्रसाद वर्मा और आज़म ख़ाँ जैसा दूसरी पंक्ति का नेतृत्व देना तो दूर उसके आसपास भी नहीं फटके। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि मुलायम सिंह के राजनीतक प्रबंधन का ही बूता था कि वर्ष 2012 में उन्होंने कन्नौज से अपनी बहू और अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव की जीत सुनिश्चित कराई थी, वह भी निर्विरोध जोकि कम से कम आज की राजनीति में कल्पना से भी बाहर की चीज है।

   

खैर, फ्लॉप नेता पुत्रों-पुत्रियों की लिस्ट में अखिलेश यादव अकेले नहीं हैं। इसमें कांग्रेस के राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा, राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी, लोकशक्ति पार्टी के चिराग पासवान आदि कई नाम शामिल हैं। इस कड़ी में शिवसेना नेता और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का भी नाम जोड़ा जा सकता है। भले ही उद्धव जोड़तोड़ करके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए हों, लेकिन पार्टी को उन्होंने गर्दिश में पहुंचा दिया है। इन नेता पुत्रों की नाकामयाबी के बीच कुछ नेता पुत्र ऐसे भी हैं जो सियासत में अपने पिता से भी आगे निकलते दिख रहे हैं। तमिलनाडु में दिवंगत करुणानिधि के पुत्र-पुत्री एमके स्टाालिन एवं एमके कनिमोझी, राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख और बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव के साहबजादे तेजस्वी यादव भी बिहार की राजीति में तेजी से जगह बना रहे हैं। यहां तेजस्वी यादव के मुकाबले अखिलेश के पिछड़ने की वजह तलाशी जाए तो साफ लगता है कि तेजस्वी अपने पिता लालू यादव द्वारा खींची गई सियासी लाइन पर चल रहे हैं। वह कभी भी पिता द्वारा तय की गई लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघते हैं, जबकि अखिलेश यादव अपनी अकड़ और गलतफहमी की वजह से अभी भी किसी निर्णायक जीत के लिए तरस रहे हैं।

इसे भी पढ़ें: अखिलेश यादव ने नजरें फेर लीं ! अब यूपी में नये दल का साथ तलाश रहे हैं मुस्लिम मतदाता

करीब 50 वर्षीय सपा प्रमुख अखिलेश यादव वर्ष 2000 से सक्रिय राजनीति में हैं और लगातार किसी न किसी सदन के सदस्य रहे हैं, लेकिन उनके मुकाबले तेजस्वी यादव ने मात्र 32 वर्ष की उम्र में कई सियासी मुकाम हासिल कर लिए हैं। तेजस्वी का विधायक के रूप में यह दूसरा कार्यकाल है। अखिलेश लगातार पांच साल देश के सबसे बड़े राज्य यूपी के मुख्यमंत्री रह चुके हैं जबकि तेजस्वी के पास महज 20 महीने ही उप मुख्यमंत्री रहने का अनुभव है। पिछले हफ्ते अलग-अलग राज्यों की एक लोकसभा और चार विधानसभा सीटों के लिए उप-चुनाव हुए थे। उनमें से एक विधानसभा सीट बिहार की भी थी। यह सीट ऐसी थी, जो एनडीए के हिस्से की थी। इस पर दावेदारी को लेकर जिस तरह से बीजेपी और एनडीए के घटक दल वीआईपी में तकरार हुई और बीजेपी ने उस पर अपना प्रत्याशी उतार दिया, उसके मद्देनजर यह उप-चुनाव बीजेपी के साथ नीतीश सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। लेकिन तेजस्वी ने इस सीट को जीत कर बिहार में एनडीए को बैकफुट पर ला दिया। तेजस्वी ने सिर्फ सीट ही नहीं जीती, बल्कि आरजेडी के मुस्लिम-यादव समीकरण से आगे ले जाते दिखे। उनके साथ भूमिहार समाज का बड़ा समर्थन देखा गया और उसका श्रेय तेजस्वी के परिपक्व नेतृत्व को जा रहा है।

इसी प्रकार से हाल ही में सम्पन्न हुए विधान परिषद से लेकर विधानसभा उप-चुनाव के नतीजे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि तेजस्वी पार्टी को मुस्लिम-यादव के दायरे से बाहर निकाल कर उसे भूमिहारों तक ले जाने की रणनीति में कामयाब हुए हैं। उप-चुनाव से पहले विधान परिषद चुनाव के मद्देनजर उम्मीदवारों के चयन में तेजस्वी ने जिस तरह की विविधता दिखाई, उसी से लगने लगा था कि वह अब पार्टी को सवर्ण वर्ग की भी स्वीकार्यता दिलाना चाहते हैं। विधान परिषद चुनाव में तो उन्हें अच्छी खासी सीटें जीत कर इसका फायदा मिला ही, विधानसभा उप-चुनाव में भी तेजस्वी ने एनडीए को हराकर अपनी धमक दिखाई। उनका हश्र अखिलेश जैसा नहीं हुआ।

राजनैतिक पंडित दावा कर रहे हैं कि अखिलेश यादव को यदि यूपी की राजनीति में ऊंचा मुकाम हासिल करना है तो अपने पिता मुलायम सिंह के सियासी दांवपेंच को उन्हें बारीकी से समझना होगा। सबको साथ लेकर चलने की महारथ हासिल करनी होगी। अखिलेश को समझना होगा कि जनता के मुद्दों पर सड़क पर संघर्ष करने की बजाए यदि वह ट्विटर से राजनीति करते रहे तो न उनका कोई भला होगा, न पार्टी को फायदा होगा। सपा से बगावत करके जा रहे नेताओं की खिल्ली उड़ाने की बजाए इसको गंभीरता से लेना चाहिए। इस समय सपा कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी गिरा हुआ है, उन्हें सियासी बूस्टर डोज की भी आवश्यकता है। लब्बोलुआब, यह है यदि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को यूपी की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल करना है तो उन्हें पिता मुलायम सिंह यादव की राजनीति को अप्रासंगिक नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसका अध्ययन करके इस पर चल कर आगे बढ़ना चाहिए।

-अजय कुमार

प्रमुख खबरें

Sawan Third Monday पर ग्रहों के राजा का राशि परिवर्तन, Lucky Zodiac Signs की बढ़ेगी Wealth और Reputation

Rajasthan Cabinet approves UCC Bill 2026: राजस्थान में बहुविवाह पर बैन और पंजीकरण अनिवार्य, कैबिनेट की मुहर

NCB Mumbai का Interstate Drug Network पर बड़ा एक्शन, Gujarat से Mumbai तक फैला था अवैध कारोबार

Dharamshala में Tibet Tattoo Protest: चीन के Ethnic Unity Law के खिलाफ तिब्बतियों का अनोखा और बड़ा संघर्ष