निर्भया मामले के सभी दोषियों को दी जाए एक साथ फांसी: दिल्ली हाई कोर्ट

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Feb 05, 2020

नयी दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले के सभी दोषियों को एक साथ फांसी दी जाए, न कि अलग-अलग। इसके साथ ही अदालत ने फांसी पर रोक के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ केंद्र की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को इस बात के लिए दोषी भी ठहराया कि उन्होंने 2017 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अभियुक्तों की अपील खारिज किए जाने के बाद मृत्यु वारंट जारी करने के लिए कदम नहीं उठाया।

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उच्च न्यायालय ने केंद्र की निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। निचली अदालत ने दोषियों की फांसी पर रोक लगा दी थी। गौरतलब है कि केंद्र और दिल्ली सरकार ने निचली अदालत के 31 जनवरी के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए मामले में चार दोषियों की फांसी पर ‘‘अगले आदेश तक’’ रोक लगा दी गई थी। ये चार दोषी- मुकेश कुमार सिंह (32), पवन गुप्ता (25), विनय कुमार शर्मा (26) और अक्षय कुमार (31) तिहाड़ जेल में कैद हैं।

इससे पहले निर्भया के माता-पिता ने दिल्ली उच्च न्यायालय से केंद्र की उस याचिका पर जल्द निर्णय का अनुरोध किया था, जिसमें दोषियों की फांसी पर रोक को चुनौती दी गयी है। निचली अदालत ने चारों दोषियों को 22 जनवरी की सुबह सात बजे फांसी की सजा देने के लिए सात जनवरी को मृत्यु वारंट जारी किया था, लेकिन उनमें से एक की दया याचिका लंबित होने के चलते उन्हें फांसी नहीं दी गई। इसके बाद 17 जनवरी को निचली अदालत ने एक फरवरी की तारीख तय की, लेकिन अदालत ने 31 जनवरी को फांसी की सजा स्थगित कर दी थी, क्योंकि दोषियों के वकील ने अदालत से फांसी पर अमल को ‘‘अनिश्चित काल’’ के लिए स्थगित करने की अपील की और कहा कि उनके कानूनी उपचार के मार्ग अभी बंद नहीं हुए हैं।

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मुकेश और विनय की दया याचिका राष्ट्रपति के पास खारिज हो चुकी है जबकि पवन ने यह याचिका अभी नहीं दाखिल की है। अक्षय की दया याचिका एक फरवरी को दाखिल हुई और अभी यह लंबित है। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार ने एक फरवरी को उच्च न्यायालय का रुख किया और फांसी पर रोक लगाने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्च न्यायालय से कहा कि निर्भया सामूहिक बलात्कार एवं हत्या मामले के दोषी कानून के तहत मिली सजा के अमल में विलंब करने की सुनियोजित चाल चल रहे हैं।

दोषियों के वकील ने इस याचिका का विरोध किया और कहा कि निचली अदालत में सुनवाई के दौरान कभी भी केंद्र सरकार पक्षकार नहीं थी और सरकार दोषियों पर देरी का आरोप लगा रही है, जबकि वह खुद अब जगी है।

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