Allahabad HC ने Ghaziabad Police कमिश्नर व अफसरों पर दिए जांच के आदेश, नहीं दर्ज की थी FIR

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 13, 2026

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डिजिटल दुष्कर्म, छेड़छाड़ और अन्य अपराध की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के लिए पुलिस आयुक्त समेत गाजियाबाद के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच का आदेश दिया है। ‘डिजिटल दुष्कर्म’ का मतलब वह यौन अपराध है, जिसमें पीड़िता की सहमति के बिना उंगली, अंगूठा या पैर का अंगूठा या कोई और वस्तु उसकी योनि में डाली जाती है। पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच के निर्देश के साथ न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने आरोपी अर्पित गुप्ता द्वारा दायर रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि पीड़िता की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने के कारण उसे मजिस्ट्रेट से संपर्क करने पर विवश होना पड़ा।

इस मामले में खामियों पर विचार करते हुए अदालत ने पुलिस महानिदेशक को इस मामले की समीक्षा करने विशेषकर वेव सिटी पुलिस थाने में तैनात पुलिसकर्मियों के आचरण और आयुक्त समेत संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने को कहा। पुलिस महानिदेशक को पुलिस आयुक्त, एसएचओ और अन्य अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने और यह पूछने को कहा गया कि प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई। अदालत ने कहा, ‘‘डीजीपी व्यक्तिगत तौर पर जांच की निगरानी करेंगे और चार सप्ताह के भीतर एक व्यक्तिगत हलफनामे के जरिए रिपोर्ट दाखिल करेंगे।’’ आरोपी अर्पित गुप्ता को रियल एस्टेट कंपनी ‘पारित एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड’ का मालिक बताया गया है।

आरोपी याचिकाकर्ता ने मजिस्ट्रेट के निर्देश पर अपने खिलाफ दर्ज दुष्कर्म का मामला रद्द करने का अनुरोध किया था। वहीं दूसरी ओर, पीड़िता ने गाजियाबाद की अदालत में की गई शिकायत में आरोप लगाया है कि आरोपी अपने केबिन में उसका यौन उत्पीड़न किया करता था और इस घटना की जानकारी किसी को देने पर धमकी देता था। महिला ने यह आरोप भी लगाया कि मार्च, 2026 में आरोपी ने उसके गुप्तांग में उंगली डाली और उसका स्तन दबाया।

इसके बाद, महिला ने आठ अप्रैल को कंपनी से इस्तीफा दे दिया। अदालत को बताया गया कि इसके बाद आरोपी ने 14 अप्रैल को महिला के खिलाफ कथित वसूली का मामला दर्ज कराया। इस पर महिला को गिरफ्तार किया गया और बाद में उच्च न्यायालय द्वारा उसे जमानत दे दी गई।

जेल से रिहा होने के बाद उसने वेव सिटी पुलिस थाने में छेड़छाड़, डिजिटल दुष्कर्म और आपराधिक धमकी की शिकायत की। हालांकि, पुलिस ने उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की जिसके बाद महिला ने गाजियाबाद के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया। मजिस्ट्रेट के निर्देश पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 64 (दुष्कर्म), 74 (शील भंग करने के इरादे से महिला पर आपराधिक बल प्रयोग), 75(2) (यौन उत्पीड़न) और 351(3) (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया।

इसके बाद, आरोपी ने प्राथमिकी रद्द करने का अनुरोध करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। अदालत ने छह अगस्त को आरोपी की याचिका खारिज करते हुए इस बात पर बल दिया कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोपों की संवेदनशीलता के साथ और निष्पक्ष जांच करना आवश्यक है।

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