इलाहाबाद HC ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया पर लगायी रोक, प्रियंका गांधी ने UP सरकार पर साधा निशाना

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jun 04, 2020

लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पर बुधवार को अंतरिम रोक लगा दी। यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर की पीठ ने सैकड़ों अभ्यर्थियों की ओर से अलग अलग दाखिल ढ़ाई दर्जन ने अधिक याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया। अदालत ने एक जून को अपना आदेश सुरक्षित किया था जिसे आज सुनाया।

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अदालत ने कहा कि स्वयं राज्य सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में स्वीकार किया है कि कुछ प्रश्न हैं जो विवादपूर्ण हैं और जिनके एक से अधिक उत्तर सही हो सकते हैं।’’ पीठ ने सरकार की ओर से महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह व मुख्य स्थाई अधिवक्ता रणविजय सिंह की इस दलील को ठुकरा दिया कि भले ही कुछ प्रश्न व उत्तर विवादपूर्ण है किंतु अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एल पी मिश्रा , एच जी एस परिहार व सुदीप सेठ ने प्रश्न पत्र के प्रश्नों को संदर्भित करते हुए कहा कि ये प्रश्न या तो भ्रमित करने वाले है , या तो उनके एक से अधिक उत्तर हैं। उनका तर्क था कि यदि इन प्रश्नों के अंक याचियों को दे दिये जाये तो वे मेरिट में स्थान पाकर चयन के अग्रिम प्रकिया में शामिल हो सकते हैं। गौरतलब है कि परीक्षा में सामान्य और ओबीसी के लिए 65 प्रतिशत एवं एससी, एसटी के लिए 60 प्रतिशत की कटआफ रखी गयी थी। याचियों में कुछ एक ,दो या तीन अंको से मेरिट में आने से रह गये थे। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्वीट कर राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। 

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उन्होंने कहा,‘‘ 69000 शिक्षक भर्ती मामला: एक बार फिर से उत्तर प्रदेश के युवाओं के सपनों पर ग्रहण लग गया। यूपी की सरकार की अव्यवस्था के चलते तमाम भर्तिया कोर्ट में अटकी हैं। पेपर लीक, कटआफ विवाद, फर्जी मूल्याकंन और गलत उत्तर कुंजी, यूपी सरकार की व्यवस्था की इन सारी कमियों के चलते 69000 शिक्षक भर्ती का मामला अटका हुआ है। सरकार की लापरवाही की सबसे ज्यादा मार युवाओं पर पड़ रही है। गौरतलब है कि इससे कुछ दिन पूर्व उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उप्र सरकार का जवाब मांगा था। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इन पदों पर नियुक्तियों के लिए ऊंची कट आफ रखने के राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखा था। याचियों ने घोषित परीक्षा परिणाम में कुछ प्रश्नों की सत्यता पर प्रश्न उठाया था। उच्चतम न्यायालय ने 21 मई को राज्य सरकार से कहा था कि वह रिक्त स्थानों का विवरण और नियुक्तियों के लिये अपनाई गयी प्रक्रिया को सिलसिलेवार तरीके से एक चार्ट के माध्यम से स्पष्ट करे। शीर्ष अदालत की न्यायमूर्ति उदय यू ललित, न्यायमूर्ति एम एम शांतानागौदर और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ हालांकि शुरू में उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थी लेकिन बाद में उसने अपने आदेश में सुधार करके उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया और सुनवाई की अगली तारीख छह जुलाई निर्धारित की। 

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पीठ ने इसके साथ ही उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा मित्र एसोसिएशन तथा अन्य की याचिकाओं को इसके बाद छह जुलाई के लिये सूचीबद्ध कर दिया। पीठ ने राज्य सरकार से यह भी जानना चाहा है कि इस परीक्षा के निर्धारित सामान्य श्रेणी के लिये 45 प्रतिशत अंक और आरक्षित वर्ग के लिये 40 प्रतिशत अंकों के कट ऑफ आधार में उसने बदलाव क्यों किया। उप्र प्राथमिक शिक्षा मित्र और कई अन्य लोगों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के छह मई के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर की है। छह मई के अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह 69,000 सहायक बेसिक अध्यापकों की भर्ती की प्रक्रिया अगले तीन महीने के भीतर पूरा करे। खंड पीठ ने इससे पूर्व एकल पीठ के आदेश को दरकिनार कर दिया था जिसमें सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था जिसमें सामान्य श्रेणी के लिए 65 फीसदी और आरक्षित श्रेणी के लिए 60 फीसदी अहर्ता अंक रखे गए थे। एकल पीठ ने कहा था कि सामान्य श्रेणी के लिए न्यूनतम कट आफ 45 फीसदी और आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम कट आफ 40 फीसदी रहेगी।

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