Prabhasakshi NewsRoom: Allahabad High Court की सख्त टिप्पणी, ''भारत की संप्रभुता को सीधी चुनौती है ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा'', Maulana Tauqeer Raza की जमानत अर्जी खारिज

By नीरज कुमार दुबे | Sep 08, 2026

अभिव्यक्ति और धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता के नाम पर कानून को चुनौती देने वाली मानसिकता को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है। बरेली हिंसा मामले में इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के संस्थापक मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया है कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा धार्मिक श्रद्धा की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कानून के शासन, भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती के रूप में देखा जा सकता है।

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देखा जाये तो यह टिप्पणी केवल एक आरोपी की जमानत याचिका तक सीमित नहीं है, बल्कि उन तमाम लोगों और मानसिकताओं के लिए गंभीर चेतावनी है जो धार्मिक भावनाओं की आड़ में हिंसा, धमकी और भीड़तंत्र को वैध ठहराने की कोशिश करते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में असहमति का अधिकार हो सकता है, विरोध का अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी का सिर काटने की धमकी देने वाली सोच को न धर्म का संरक्षण मिल सकता है, न संविधान का। आस्था व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन कानून से ऊपर होने का लाइसेंस नहीं है।

हम आपको बता दें कि यह मामला सितंबर 2025 में बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान से जुड़े घटनाक्रम के दौरान भड़की हिंसा से संबंधित है। पुलिस के अनुसार, प्रशासन द्वारा रैली की अनुमति देने से इंकार किए जाने के बाद मौलाना तौकीर रजा ने 26 सितंबर 2025 को शुक्रवार की नमाज के बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों से इस्लामिया इंटर कॉलेज में जुटने का आह्वान किया था।

उस समय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए और पुलिस के अनुसार वे तख्तियां लेकर तथा नारे लगाते हुए श्यामगंज चौराहे की ओर बढ़े। पुलिस द्वारा मार्च को रोकने का प्रयास किए जाने पर स्थिति हिंसक हो गई। झड़पों में पुलिसकर्मी घायल हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

मौलाना रजा का तर्क था कि अनुमति नहीं मिलने और निषेधाज्ञा लागू होने के बाद उन्होंने सभा का आह्वान वापस ले लिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को निर्णायक नहीं माना और कहा कि इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल की ओर बढ़े। अदालत ने हिंसा के बाद उनके आचरण पर भी असंतोष जताया। पीठ के अनुसार, उन्होंने बाद में एक भाषण में बड़ी संख्या में लोगों के उनके आह्वान पर पहुंचने के लिए भीड़ का धन्यवाद किया और उनके कार्यों की सराहना की।

हम आपको बता दें कि मौलाना तौकीर रजा 13 अक्टूबर 2025 से जेल में है। मामले में 21 दिसंबर 2025 को आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, हालांकि उनके खिलाफ आरोप अभी तय नहीं हुए हैं। हाईकोर्ट ने मौजूदा चरण में उन्हें जमानत देने से इंकार कर दिया। देखा जाये तो इस फैसले का संदेश बेहद स्पष्ट है कि भारत में नारे के नाम पर हिंसा, आस्था के नाम पर धमकी और भीड़ के नाम पर कानून की अवहेलना स्वीकार नहीं की जा सकती। ‘सर तन से जुदा’ जैसी सोच दरअसल किसी धर्म की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाती, बल्कि धर्म के नाम को हिंसा से जोड़कर उसकी गरिमा को ही नुकसान पहुंचाती है। सबको एक बात स्पष्ट होनी चाहिए कि संविधान से चलने वाले भारत में अंतिम फैसला न उग्र भीड़ करेगी, न धमकी देने वाले नारे, अंतिम फैसला सिर्फ कानून करेगा।

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