आंबेडकर ने संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव दिया था : प्रधान न्यायाधीश बोबडे

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Apr 14, 2021

नागपुर। देश के प्रधान न्यायाधीश शरद बोबडे ने बुधवार को कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संस्कृत को आधिकारिक बनाने का प्रस्ताव दिया था क्योंकि वह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को अच्छी तरह समझते थे और यह भी जानते थे कि लोग क्या चाहते हैं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि प्राचीन भारतीय ग्रंथ ‘न्यायशास्त्र’ अरस्तू और पारसी तर्क विद्या से जरा भी कम नहीं है और ‘‘कोई कारण नहीं है कि हमें इसकी अनदेखी करनी चाहिए और अपने पूर्वजों की प्रतिभाओं का लाभ ना उठाया जाए।’’ न्यायमूर्ति बोबडे महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एमएनएलयू) के शैक्षणिक भवन के उद्घाटन के दौरान संबोधित कर रहे थे।

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न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा, ‘‘आंबेडकर की राय थी कि चूंकि उत्तर भारत में तमिल स्वीकार्य नहीं होगी और इसका विरोध हो सकता है जैसे कि दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध होता है। लेकिन उत्तर भारत या दक्षिण भारत में संस्कृत का विरोध होने की कम आशंका थी और यही कारण है कि उन्होंने ऐसा प्रस्ताव दिया किंतु इस पर कामयाबी नहीं मिली।’’ देश के प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आंबेडकर को ना केवल कानून की गहरी जानकारी थी बल्कि वह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से भी अच्छी तरह अवगत थे। न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा, ‘‘वह जानते थे कि लोग क्या चाहते हैं, देश का गरीब क्या चाहता है। उन्हें इन सभी पहलुओं की अच्छी जानकारी थी और मुझे लगता है कि इसी वजह से उन्होंने यह प्रस्ताव दिया होगा।’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ‘लॉ स्कूल’ कानूनी पेशे की ‘नर्सरी’ है। उन्होंने कहा, ‘‘लॉ स्कूल नर्सरी के समान है जहां से हमारे कानूनी पेशेवरों के साथ न्यायाधीशों की पौध भी तैयार होती है। महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के साथ उनमें से कई लोगों के सपने साकार होते हैं।’’ प्रधान न्यायाधीश बोबडे 23 अप्रैल को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। न्यायमूर्ति एन वी रमण अगले प्रधान न्यायाधीश होंगे।

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