By नीरज कुमार दुबे | Apr 09, 2026
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस समय एक ऐसा तूफान उठ रहा है, जिसने दुनिया की सबसे मजबूत मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। हम आपको बता दें कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई अब खुलकर सामने आ चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो से बाहर निकलने की चर्चा ने साफ कर दिया है कि अब यह गठबंधन केवल औपचारिकता बनकर रह सकता है।
देखा जाये तो ट्रंप का यह रुख अचानक सामने नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों से वह लगातार यूरोपीय देशों पर रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं। नाटो के सदस्य देशों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने की सहमति भी इसी दबाव का परिणाम थी। लेकिन जब असली परीक्षा आई तो सहयोगी देश पीछे हट गए। यही वह क्षण था जिसने ट्रंप को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि नाटो केवल कागजी शेर बनकर रह गया है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह घटनाक्रम कई स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यह ट्रांस अटलांटिक गठबंधन की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है। यदि अमेरिका वास्तव में नाटो से दूरी बनाता है तो यूरोप की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के लिए यह सुनहरा अवसर साबित होगा, क्योंकि यूरोप बिना अमेरिकी सैन्य समर्थन के कमजोर पड़ जाएगा।
एक और बड़ा पहलू है पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर। होरमुज जलडमरूमध्य को लेकर हुए तनाव और तेल आपूर्ति पर पड़े प्रभाव ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा अब वैश्विक शक्ति राजनीति का केंद्र बन चुकी है। ट्रंप का यह कहना कि यह जिम्मेदारी उन देशों की है जो तेल पर निर्भर हैं, सीधे तौर पर यूरोप और एशिया को चेतावनी है कि वह अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करें।
वहीं सबसे आक्रामक संकेत है अमेरिका द्वारा अपने सैन्य अड्डों को स्पेन और जर्मनी जैसे देशों से हटाने या कम करने की योजना। यदि यह कदम उठाया जाता है तो यह केवल सैन्य पुनर्संतुलन नहीं बल्कि एक प्रकार का रणनीतिक दंड होगा। इसका संदेश साफ है कि जो अमेरिका के साथ नहीं खड़ा होगा, उसे उसकी कीमत चुकानी होगी।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की जिद भी इस पूरे घटनाक्रम का अहम हिस्सा है। उन्होंने बार बार यह दोहराया है कि यह क्षेत्र अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। डेनमार्क और यूरोपीय देशों के विरोध के बावजूद यह मुद्दा अभी ठंडा नहीं पड़ा है। यह दिखाता है कि अमेरिका अब पारंपरिक कूटनीतिक सीमाओं को तोड़कर खुली रणनीतिक आक्रामकता की ओर बढ़ रहा है।
इस बीच, नाटो महासचिव मार्क रुटे और ट्रंप के बीच हुई बातचीत भले ही औपचारिक रूप से सकारात्मक बताई गई हो, लेकिन अंदर की कड़वाहट साफ झलक रही है। रुटे ने माना कि ट्रंप निराश हैं, जबकि ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि नाटो ने अमेरिका का साथ नहीं दिया।
इतिहास गवाह है कि नाटो की सबसे बड़ी परीक्षा 2001 में हुई थी, जब अमेरिका पर हमला हुआ और सभी सदस्य देशों ने उसका साथ दिया। लेकिन आज स्थिति उलट गई है। अब अमेरिका खुद को अकेला महसूस कर रहा है और यही असंतोष उसे गठबंधन से दूरी बनाने की ओर धकेल रहा है।
यदि अमेरिका नाटो से अलग होता है तो वैश्विक शक्ति संरचना बहुध्रुवीय हो जाएगी। चीन और रूस जैसे देश तेजी से अपने प्रभाव का विस्तार करेंगे। यूरोप को मजबूरन अपनी स्वतंत्र सैन्य नीति बनानी पड़ेगी, जबकि एशिया में भी नए सुरक्षा गठबंधनों का उदय हो सकता है। ट्रंप का आक्रामक रवैया यह संकेत देता है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिक कठोर, स्वार्थ आधारित और टकरावपूर्ण होने वाले हैं।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि नाटो संकट उस पूरी व्यवस्था का संकट है जिसने दशकों तक दुनिया को एक ढांचे में बांधकर रखा। अब यह ढांचा दरक रहा है और इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है। यही कारण है कि यह घटनाक्रम आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा।