By अभिनय आकाश | May 15, 2025
जब भारत आत्मनिर्भर बनता है तो दुनिया के कुछ ताकतवर देश बेचैन हो जाते हैं। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल भारत की सबसे बड़ी और सबसे भरोसेमंद रक्षा कंपनी आज एक अंतरराष्ट्रीय विवाद के केंद्र में है। आरोप ये है कि एचएएल ने ब्रिटेन की एक रक्षा कंपनी से मिली तकनीक को रूस को ट्रंसफर कर दिया। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये आरोप हकीकत हैं या फिर अमेरिका की घबराहट का एक नया रूप है। दरअसल, 13 मई को अमेरिका के एक प्रतिठित अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट छापी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने मार्च में बताया कि, 2023 और 2024 के शिपिंग रिकॉर्ड के अनुसार, ब्रिटिश एयरोस्पेस निर्माता एचआर स्मिथ ग्रुप ने भारत को ऐसे उपकरण निर्यात किए जिन्हें रूसी हथियार प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण माना गया था। इसमें ट्रांसमीटर, कॉकपिट उपकरण और एंटेना शामिल थे। ये सभी ड्यूल यूज टेक्नोलॉजी हैं। यानी इनका इस्तेमाल सिविल एविएशन और मिलिट्री दोनों जगह किया जा सकता है।
भारतीय कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स, रूसी हथियार एजेंसी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट की सबसे बड़ी व्यापारिक साझेदार है। एच.आर. स्मिथ के वकील ने हाल ही में टाइम्स को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स का एक बयान उपलब्ध कराया, जिसमें कहा गया था कि ब्रिटिश उपकरण रूस को नहीं बेचे गए थे। लेकिन बात इतनी भर नहीं है। बड़ा सवाल ये है कि अमेरिका और पश्चिमी मीडिया को इतनी चिंता क्यों हो रही है। भारत और रूस का रक्षा सहयोग दशकों पुराना है। एचएएल ने एसयू-30 एमकेआई जैसा फाइटर जेट भारत में बनाए हैं। ये रूस की टेक्नोलॉजी पर आधारित है। एचएएल ब्रह्मोस मिसाइल प्रोग्राम का भी हिस्सा है जो भारत रूस का ज्वाइंट वेंचर है।
रूस की तकनीक पर भारत अब स्वदेशी बदलाव कर चुका है। लेकिन दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी मजबूत बनी हुई है। रिपोर्ट बताते हैं कि भारत और रूस मिलकर एस 500 का ज्वाइंट प्रोडक्शन भी कर सकते हैं। रूस के साथ मिलकर एस 500 के ज्वाइंट प्रोडक्शन का ऑफर मॉस्को की तरफ से दिया गया है। अमेरिक चाहता है कि भारत पूरी तरह पश्चिमी ब्लॉक में आ जाए। लेकिन भारत ने न तो रूस से दूरी बनाई न अमेरिकी दबाव में झुका है। यही बात कुछ ताकतवर देशों को खल रही है। रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर टेक्नोलॉजिकल प्रतिबंध लगाए हैं। कोई भी टेक्नोलाजी रूस तक न पहुंचे ये उनकी प्रमुख नीति है। इसके लिए वो तीसरे देशों की आपूर्ति चेन को भ निगरानी में रखते हैं।
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