Vanakkam Poorvottar: अन्नाद्रमुक का घोषणापत्र है या लॉटरी का टिकट? हर परिवार को 10000 रुपए, मुफ्त फ्रिज, फ्री बस यात्रा जैसे कई लुभावने वादे

By नीरज कुमार दुबे | Mar 25, 2026

मुफ्त की सौगातों की राजनीति क्या सचमुच जनता के हित में है या फिर यह केवल चुनावी जीत का आसान रास्ता बनती जा रही है? देश के कई राज्यों में यह सवाल अब गंभीर रूप से उठने लगा है। चुनावी घोषणाओं में बढ़ती मुफ्त योजनाएं जहां एक तरफ आम लोगों को तात्कालिक राहत देती हैं, वहीं दूसरी तरफ लंबे समय में राज्यों की आर्थिक सेहत पर भारी दबाव डालती हैं।

इसे भी पढ़ें: आबकारी नीति मामले में आप नेताओं का बरी होना बड़ी संजीवनी

घोषणा पत्र में हर परिवार को 10000 रुपये देने का वादा किया गया है। इसके अलावा महिलाओं को हर महीने 2000 रुपये की आर्थिक सहायता देने की बात कही गई है। हर घर को साल में तीन मुफ्त गैस सिलेंडर, पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए मुफ्त बस यात्रा, राशन कार्ड धारकों को एक किलो दाल और एक लीटर खाद्य तेल मुफ्त देने जैसे वादे भी शामिल हैं। इतना ही नहीं, चावल राशन कार्ड वाली महिलाओं को मुफ्त रेफ्रिजरेटर देने की घोषणा भी की गई है।

पार्टी का कहना है कि ये कदम बढ़ती महंगाई के बीच परिवारों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ को कम करने के लिए जरूरी हैं। साथ ही यह भी दावा किया गया है कि रोजगार सृजन और कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने अपने पुराने दौर की योजनाओं की याद भी दिलाई, जब पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने पंखा, मिक्सी और ग्राइंडर जैसी मुफ्त योजनाएं लागू की थीं। अब उसी मॉडल को और विस्तार देने की कोशिश दिखाई दे रही है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी मुफ्त योजनाएं वास्तव में विकास को आगे बढ़ाती हैं? हाल के उदाहरण बताते हैं कि इसका असर उल्टा भी पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में मुफ्त की घोषणाओं का बोझ सरकारी खजाने पर साफ दिखाई दे रहा है।

हिमाचल प्रदेश में सरकार को बढ़ते कर्ज और राजकोषीय दबाव के कारण खर्चों में बड़ी कटौती करनी पड़ रही है। जनप्रतिनिधियों के भुगतान और बुनियादी सेवाओं के संचालन में भी कठिनाइयों की खबरें सामने आई हैं। वहीं कर्नाटक में भी विकास परियोजनाओं के लिए फंड की कमी की चर्चा हो रही है। कई परियोजनाएं धीमी पड़ गई हैं क्योंकि संसाधनों का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं पर खर्च हो रहा है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब सरकारें अपनी आय से अधिक खर्च करने लगती हैं, तो उन्हें कर्ज लेना पड़ता है। इससे राज्य का कर्ज लगातार बढ़ता जाता है और भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ पड़ता है। विकास परियोजनाएं जैसे सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग निवेश पीछे छूट जाते हैं।

तमिलनाडु में भी यही खतरा नजर आ रहा है। चुनाव जीतने के लिए आकर्षक वादे करना आसान है, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए भारी संसाधनों की जरूरत होती है। यदि आय के स्थायी स्रोत नहीं बढ़ाए गए, तो राज्य की वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है।

राजनीतिक दल अक्सर यह तर्क देते हैं कि ये योजनाएं सामाजिक न्याय और गरीबों के कल्याण के लिए जरूरी हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि जरूरतमंद लोगों को सहायता मिलनी चाहिए, लेकिन सवाल संतुलन का है। यदि पूरी राजनीति मुफ्त बांटने पर आधारित हो जाए, तो विकास की गति धीमी पड़ना तय है।

हम आपको बता दें कि तमिलनाडु में आगामी चुनाव 23 अप्रैल को एक ही चरण में होंगे और मतगणना 4 मई को की जाएगी। अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ सीट बंटवारे का फार्मूला भी तय कर लिया है, जिसमें वह 178 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि अन्य सहयोगी दलों को भी हिस्सेदारी दी गई है।

बहरहाल, यह स्पष्ट है कि मुफ्त की सौगातें चुनावी राजनीति का अहम हथियार बन चुकी हैं। लेकिन हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के अनुभव यह संकेत देते हैं कि यह मॉडल लंबे समय में टिकाऊ नहीं है। तमिलनाडु के सामने अब यह चुनौती है कि वह तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक विकास के बीच सही संतुलन कैसे बनाए। अगर यह संतुलन बिगड़ा, तो सत्ता तो मिल सकती है, लेकिन विकास की कीमत पर।

प्रमुख खबरें

Mamata Banerjee पर हमले से गरमाया बंगाल का माहौल, BJP ने TMC के आरोपों पर किया पलटवार

Gold और Silver की कीमतों में आएगी भारी तेजी, West Asia Tension और Inflation डेटा पर रहेगी निवेशकों की पैनी नजर

Prayagraj के छात्र से बातचीत का हवाला देकर Rahul Gandhi ने देश के युवाओं की बेबसी पर जताया दुख

Bumrah और Hardik Pandya की चोट पर बोले VVS Laxman, कहा- खिलाड़ी मशीन नहीं, COE और Team India के बीच है शानदार तालमेल