मंदिर आंदोलन पहले भी चले लेकिन अब मस्जिद के पक्षकार कम हो गये

By अजय कुमार | Nov 27, 2018

'अखाड़ा' कुश्ती का हो या फिर सियासी अथवा खेल का। जीतने का मजा तभी है, जब आमने−सामने दमदार प्रतिद्वंद्वी ताल ठोंकते हैं। वर्ना तो मुकाबला एक तरफ होकर नीरस हो जाता है, नीरसता के माहौल में न खिलाड़ी को मजा आता है न ही दर्शक लुत्फ उठा पाते हैं। आजकल धर्म की सियासत में भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। बात अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बनाने वालों की हुंकार का हो रहा है, जो अयोध्या से लेकर पूरे देश को राममय किए हुए हैं। आज जो माहौल दिखाई दे रहा है, 1992 या उससे पहले भी कई बार भगवान राम का मंदिर बनाने के लिये रामभक्त और राम नाम की सियासत करने वाले ऐसा ही माहौल बना चुके थे, लेकिन तब जितनी बुलंद आवाज मंदिर बनाने वालों की हुआ करती थी, उतना ही तीखा विरोध राम मंदिर निर्माण की मुहिम की मुखालफत करने वालों की तरफ से दिखाई पड़ता था। मामला अदालत में होने के बाद भी मंदिर निर्माण के पक्ष और विपक्ष में गलत बयानबाजी करने वालों के मुंह बंद नहीं हुए। इसकी वजह से कई सरकारें आईं और कई चली भी गईं। भगवान राम की कृपा से कल्याण सिंह जैसे नेता मुख्यमंत्री बने तो कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव और बिहार में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोक कर उन्हें गिरफ्तार करने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने भी मंदिर विरोध की सियासत में खूब नाम कमाया।

सबसे बड़ी बात यह थी कि भाजपा के समर्थन से पहली बार 10 मार्च 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने लालू की राजनीति को राम मंदिर आंदोलन के विरोध से ही खाद−पानी मिला। इसके पहले उन्हें संयोग का मुख्यमंत्री माना जाता था। 1989 में केंद्र में कांग्रेस सरकार के पतन के बाद 1990 में 324 सदस्यीय बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ था, जिसमें लालू की पार्टी जनता दल के 122 विधायक जीत कर आए थे। कांग्रेस का ग्राफ भी काफी नीचे गिरा था। फिर भी उसके खाते में 71 सीटें आई थीं। 39 विधायकों वाली भाजपा एवं अन्य दलों के समर्थन से गैर−कांग्रेसी सरकार की पहल हुई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने चहेते रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे कर दिया। शरद यादव और देवीलाल की पसंद लालू थे। चंद्रशेखर के खासमखास रघुनाथ झा ने तीसरे प्रत्याशी के रूप में वोट काटकर लालू की जीत का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।

भाजपा के सहारे लालू सत्ता में आए और जल्द ही बिहार की सियासत में छा गए। लालू ने अपनी सियासी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये अपनी सरकार को दांव पर लगा दिया था। आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने केंद्र के साथ बिहार की लालू सरकार से भी समर्थन वापस ले लिया था। भाजपा ने लालू सरकार से समर्थन वापस लिया तो लालू ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और सरकार सहज तरीके से चलती रही। इसका साइड इफेक्ट सीधे कांग्रेस पर पड़ा और उसका वोट बैंक लालू के खाते में ट्रांसफर होने लगा। कांग्रेस सरकार के दौरान 1989 में हुए भागलपुर दंगे का दर्द अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। इसी दौरान आडवाणी के रथ का पहिया थमने के बाद मुस्लिमों ने लालू को रहनुमा मान लिया। इसी समीकरण के बूते लालू ने बिहार में 15 साल राज किया। दिल्ली में कोई भी सरकार बनती लालू यादव की उसमें अहम भूमिका रहती।

बिहार में आडवाणी का रथ रोक कर लालू ने मुस्लिमों के दिलों में जगह बनाई थी तो उत्तर प्रदेश में यही कारनामा सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाकर दोहराया था। लालू यादव के चलते आडवाणी का रथ समस्तीपुर से भले आगे नहीं बढ़ पाया था लेकिन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिये कारसेवकों का आना जारी था। माहौल में तनाव और गरमी दोनों थी। इसी तनाव के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने बयान दिया कि विवादित ढांचे के पास परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। कारेसवकों को अयोध्या की सीमाओं से बाहर रोका जा रहा था। जहां−तहां रोका जा रहा था, लेकिन रामभक्तों का सैलाब उमड़ता ही जा रहा था। कारसेवकों की भीड़ को संभालना पुलिस के लिये मुश्किल होता जा रहा थ। इसी बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था, जिसमें करीब डेढ़ दर्जन कारसेवकों की मौत हो गई, लेकिन मुलायम को इस पर रत्ती भर भी अफसोस नहीं हुआ। कुछ वर्ष पूर्व उनका एक बयान सामने आया जिसमें वह कह रहे थे कि और कारसेवक भी मर जाते तबी भी उन्हें अफसोस नहीं होता।

गौरतलब है कि मुलायम सिंह यादव को अयोध्या गोलीकांड के बाद हुए विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। इस घटना के बाद 1991 की राम लहर और ध्रुवीकरण वाले माहौल में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार यूपी में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने थे। यह और बात थी कि बिहार में लालू की तरह यूपी में मुलायम भी मुसलमानों के चहेते बन चुके थे। 2 नवंबर 1990 को जब कारसेवकों ने अयोध्या में विवादित ढांचे कथित बाबरी मस्जिद गिराने की कोशिश की थी, तब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कारसेवकों पर पुलिस ने फायरिंग की थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक फायरिंग में 16 लोग मारे गए थे। मुलायम ने कहा था कि अगर और भी जानें जातीं तब भी वह धर्मस्थल को बचाते, जिसके बाद मुलायम के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हो चुका है।

खैर, अब मुलायम की जगह समाजवादी पार्टी अखिलेश की हो गई है। सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात तो यह है कि वर्तमान समय में राम मंदिर आंदोलन पर पूर्व मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव व उनकी समाजवादी पार्टी चुप है। इस चुप्पी के मायने भी अपने आप में काफी अहम माने जा रहे हैं। भले ही समाजवादी पार्टी का नेतृत्व मुलायम सिंह यादव ना कर रहे हों, लेकिन समाजवादी पार्टी का नेतृत्व मुलायम के ही पुत्र मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मुलायम सिंह यादव या समाजवादी पार्टी की चुप्पी अपने आप में काफी मायने रखती है। इसके पीछे की वजह 2014 के बाद देश की बदली सियासत को भी माना जा रहा है।

2014 के आम चुनाव से पूर्व जिस प्रखरता से मुसलमानों के पक्ष में तमाम दल और नेता हुंकार भरते हुए लामबंद हो जाया करते थे, अब वह नजारा देखने को नहीं मिलता है। इसके पीछे वजह है बीजेपी नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हिन्दुत्व को हवा देना। हिन्दुत्व को हवा देकर मोदी ने तुष्टिकरण की सियासत करने वालों के सामने एक बड़ी लाइन खींच दी है। इसी के चलते राहुल गांधी को जनेऊ दिखाना पड़ता है। कभी मंदिरों में जाने वाले लड़कियों से छेड़छाड़ करते हैं, जैसा बयान देने वाले राहुल गांधी आज सब कुछ भूल कर मंदिर−मंदिर का खेल खेल रहे हैं। हिन्दुत्व के उभार के बाद कथित बाबरी मस्जिद के पक्ष में खड़े वाले नेताओं का टोटा हो गया है। इसी के चलते हिन्दूवादी संगठनों की धर्म सभा से लेकर रैलियों तक के खिलाफ कोई मुंह नहीं खोलता है, जबकि मुलसमानों को मुलायम और लालू जैसे रहनुमा की तलाश है जो उनके पक्ष में खड़ा होने का साहस जुटा सके।

-अजय कुमार

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