Iran सुलग रहा है, सत्ता कांप रही है, जनता का डर खत्म हो रहा है, क्या इस्लामी शासन के दिन पूरे हो गये?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 09, 2026

ईरान इस समय उबाल पर है। जो विरोध महंगाई, बेरोजगारी और बदहाल अर्थव्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ था वह अब सीधे इस्लामी सत्ता व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की चुनौती बन चुका है। लगातार बारह दिनों से सड़कों पर उतर रही जनता अब केवल नारे नहीं लगा रही बल्कि सत्ता के प्रतीकों को जलाकर यह साफ संदेश दे रही है कि डर की दीवार टूट चुकी है। सरकारी इमारतें, पुलिस चौकियां और प्रशासनिक वाहन जनता के गुस्से का निशाना बन रहे हैं। यह केवल प्रदर्शन नहीं है, यह व्यवस्था के खिलाफ खुला विद्रोह है।


तेहरान से लेकर मशहद, इस्फहान और दर्जनों छोटे शहरों तक हालात एक जैसे हैं। सड़कों पर युवा हैं, महिलाएं हैं, मजदूर हैं और अब मध्यम वर्ग भी खुलकर सामने आ चुका है। नारे अब रोटी कपड़ा और नौकरी तक सीमित नहीं रहे। सीधे सर्वोच्च नेता और पूरी इस्लामी व्यवस्था को ललकारा जा रहा है। सत्ता के खिलाफ इस तरह की खुली बगावत ईरान के इतिहास में बहुत कम देखी गई है।

इसे भी पढ़ें: Iran Protests | शहजादे रजा पहलवी की अपील पर दहला ईरान! सड़कों पर उतरे हजारों लोग, प्रदर्शनों के बीच इंटरनेट और फोन सेवाएं ठप

हालांकि ईरान सरकार का जवाब भी उतना ही सख्त और बेरहम है। इंटरनेट बंद, मोबाइल सेवाएं ठप, सुरक्षा बलों को खुली छूट और गिरफ्तारियों का अंधाधुंध दौर चल रहा है। दर्जनों मौतें हो चुकी हैं और हजारों लोग जेलों में ठूंस दिए गए हैं। सत्ता यह दिखाना चाहती है कि वह अब भी मजबूत है, लेकिन हकीकत यह है कि डर के बल पर चलने वाली किसी भी व्यवस्था का अंत हमेशा हिंसक होता है।


हम आपको यह भी बता दें कि इन हालात के बीच रेजा पहलवी का नाम फिर से उभर रहा है। वह ईरान के आखिरी शाह के बेटे हैं और खुद को देश का वैध क्राउन प्रिंस मानते हैं। हम आपको याद दिला दें कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उनका परिवार देश छोड़ने पर मजबूर हुआ था। तब से वह निर्वासन में हैं और खुद को लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष ईरान का चेहरा बताने की कोशिश कर रहे हैं। रेजा पहलवी खुले तौर पर मौजूदा सत्ता को अवैध बताते हैं और सेना तथा जनता से अपील कर रहे हैं कि वह इस्लामी नेतृत्व का साथ छोड़ दें। उनके समर्थक उन्हें ईरान के लिए एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में पेश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ भावनात्मक अपील है या वाकई सत्ता परिवर्तन का कोई ठोस खाका है। सवाल यह भी है कि क्या ईरान में तख्तापलट होने वाला है?


देखा जाये तो यह सवाल इस समय हर विश्लेषण का केंद्र बना हुआ है। मगर सच्चाई यह है कि ईरान में हालात गंभीर जरूर हैं लेकिन तख्तापलट के लिए संगठित नेतृत्व, सेना का समर्थन और सत्ता संरचना के भीतर दरार जरूरी होती है। फिलहाल जो दिख रहा है वह जनता का गुस्सा है, लेकिन वह गुस्सा बिखरा हुआ है। कोई एक केंद्रीकृत नेतृत्व नहीं है जो सत्ता संभालने की स्थिति में हो। रेजा पहलवी की लोकप्रियता सोशल मीडिया और प्रवासी ईरानियों में जरूर है, लेकिन देश के भीतर उनके पास न तो संगठन है और न ही जमीन पर नियंत्रण। ईरान की सुरक्षा व्यवस्था बेहद मजबूत और वैचारिक रूप से कट्टर है। रिवोल्यूशनरी गार्ड केवल सेना नहीं बल्कि सत्ता की भी रीढ़ हैं। जब तक इस ढांचे में टूट नहीं होती तब तक तख्तापलट की बात करना जल्दबाजी होगी।


जहां तक यह सवाल है कि क्या राजशाही की वापसी संभव है तो आपको बता दें कि राजशाही की वापसी एक और भावनात्मक कल्पना है। आज का ईरान 1979 वाला ईरान नहीं है। चार दशक की इस्लामी सत्ता ने समाज की संरचना बदल दी है। नई पीढ़ी स्वतंत्रता चाहती है लेकिन जरूरी नहीं कि वह किसी शाह को फिर से गद्दी पर बैठाना चाहती हो। रेजा पहलवी खुद भी खुलकर यह नहीं कहते कि वे राजा बनेंगे। वह सत्ता को जनता के हवाले करने और जनमत संग्रह की बात करते हैं। इसका मतलब साफ है कि राजशाही की वापसी फिलहाल एक नारा भर है, हकीकत नहीं।


ईरान संकट का सामरिक प्रभाव देखें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि ईरान पूरे पश्चिम एशिया की धुरी है। यहां अस्थिरता का मतलब है तेल बाजार में उथल पुथल, खाड़ी क्षेत्र में तनाव और कई देशों में प्रॉक्सी संघर्ष का तेज होना। ईरान के कमजोर होने से उसके समर्थित गुटों की स्थिति भी बदलेगी। इससे इजराइल और अरब देशों के बीच संतुलन बदल सकता है। अमेरिका और पश्चिमी शक्तियां इस मौके को अपने हित में भुनाने की कोशिश करेंगी। दूसरी ओर रूस और चीन भी ईरान को हाथ से जाने नहीं देना चाहेंगे। अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है तो उसका असर केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरे क्षेत्र को हिला देगा और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को भी झटका देगा।


देखा जाये तो ईरान में जो हो रहा है वह केवल सत्ता के खिलाफ गुस्सा नहीं बल्कि दशकों की घुटन का विस्फोट है। जनता अब सुधार नहीं बल्कि बदलाव चाहती है। लेकिन बदलाव अपने आप नहीं आता, उसे दिशा देनी पड़ती है। रेजा पहलवी इस विद्रोह का चेहरा बन सकते हैं, लेकिन वह मसले का समाधान नहीं हैं। सत्ता परिवर्तन के लिए केवल नाम नहीं बल्कि जमीन पर ताकत चाहिए। अगर यह विद्रोह संगठित नहीं हुआ तो सत्ता इसे बेरहमी से कुचल देगी।


बहरहाल, ईरान आज चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता दमन का है, दूसरा बदलाव का। तख्तापलट होगा या नहीं यह आने वाले दिनों में तय होगा, लेकिन इतना तय है कि ईरान अब पहले जैसा नहीं रहेगा। डर टूट चुका है और यही किसी भी सत्ता के पतन की पहली सीढ़ी होती है।


-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Bangladesh में फिर हिंदू निशाने पर, Joy Mahapatro की हत्या के बाद बढ़ा खौफ, परिवार का दावा- सुनियोजित साजिश

Mamata Banerjee का चुनाव आयोग पर सीधा प्रहार, बोलीं- CEC Gyanesh Kumar तानाशाहों जैसा व्यवहार कर रहे

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने SIR समीक्षा के दौरान कांग्रेस और TMC पर किया करारा प्रहार

World Book Fair: युवा लेखकों को मिली खास सलाह, Social Media पर लिखने से पहले खूब करें अध्ययन