By नीरज कुमार दुबे | Aug 05, 2026
एक ओर पूरा देश और स्वयं जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक पिछले सात वर्षों में घाटी में आए शांति, विकास और नए अवसरों का स्वागत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ स्थानीय राजनीतिक दल और नेता आज भी पांच अगस्त को 'काला दिवस' मनाकर अपने पुराने राजनीतिक एजेंडे से बाहर निकलने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। सबसे अधिक विवाद पीडीपी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को लेकर खड़ा हुआ, जो विरोध प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रध्वज को उल्टा पकड़े हुए दिखाई दीं। राष्ट्रीय ध्वज जैसे सर्वोच्च राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति इस तरह की लापरवाही या असंवेदनशीलता ने उनकी राजनीतिक मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अधिकारियों ने इसे ध्वज संहिता का उल्लंघन मानते हुए कानूनी कार्रवाई पर भी विचार शुरू कर दिया है।
इसके विपरीत नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस ने पांच अगस्त को 'काला दिवस' के रूप में मनाते हुए विरोध प्रदर्शन किए। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने श्रीनगर में मार्च निकालने का प्रयास किया और विशेष दर्जे की बहाली की मांग दोहराई। पार्टी का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकार समाप्त किए गए और राज्य का दर्जा अब तक बहाल नहीं किया गया है। कांग्रेस और पीडीपी ने भी राज्य का दर्जा, भूमि और रोजगार संबंधी सुरक्षा बहाल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किए। प्रशासन ने किसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए श्रीनगर में विशेषकर लाल चौक और राजनीतिक दलों के कार्यालयों के आसपास सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे।
हालांकि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन पिछले सात वर्षों के आंकड़े जम्मू-कश्मीर में आए व्यापक बदलावों की अलग तस्वीर पेश करते हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन सुरक्षा के क्षेत्र में दिखाई देता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार आतंकवादी घटनाओं, घुसपैठ के प्रयासों, पत्थरबाजी और हिंसा में उल्लेखनीय गिरावट आई है। आतंकवादी घटनाएं वर्ष 2022 की 151 से घटकर 2025 में केवल 35 रह गईं। इसी अवधि में मारे गए आतंकवादियों की संख्या 193 से घटकर 46 हो गई, जबकि सुरक्षाबलों के शहीद होने की घटनाओं में भी कमी दर्ज की गई। पत्थरबाजी की घटनाओं में लगभग 99 प्रतिशत तक गिरावट आई है और 2025 पिछले दो दशकों का सबसे कम हिंसक वर्ष माना गया। 2026 में भी अब तक आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं की संख्या सीमित रही है।
शांति का सबसे बड़ा लाभ पर्यटन क्षेत्र को मिला है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला स्वयं विधानसभा में बता चुके हैं कि 2016 से 2018 के बीच जहां लगभग 59 लाख पर्यटक जम्मू-कश्मीर आए थे, वहीं 2023 से 2025 के बीच यह संख्या बढ़कर 2.42 करोड़ तक पहुंच गई। हालांकि पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के कारण कश्मीर घाटी में पर्यटकों की संख्या कुछ घटी, फिर भी जम्मू संभाग और विशेष रूप से माता वैष्णो देवी धाम में श्रद्धालुओं की भारी आमद जारी रही। पर्यटन विभाग के आंकड़े भी बताते हैं कि 2019 की तुलना में 2023 तक पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो घाटी में सामान्य होते हालात और लोगों के बढ़ते विश्वास का संकेत है।
साथ ही आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिले हैं। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक के शुरू होने से पहली बार कश्मीर घाटी सीधे देश के रेल नेटवर्क से जुड़ गई है। इसी परियोजना के तहत चिनाब नदी पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल बनाया गया, जो भारत की इंजीनियरिंग क्षमता का प्रतीक बन चुका है। इसके साथ ही नई सड़कों, सुरंगों, डिजिटल कनेक्टिविटी और अन्य आधारभूत परियोजनाओं ने क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति दी है।
यही नहीं, आर्थिक मोर्चे पर भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। जम्मू-कश्मीर के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2019 के बाद प्रति व्यक्ति आय में औसतन 8.81 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2025-26 में प्रति व्यक्ति आय लगभग 1.68 लाख रुपये रहने का अनुमान है। यद्यपि यह अभी राष्ट्रीय औसत से कम है, फिर भी यह स्पष्ट करता है कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। हालांकि कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, सीमित औद्योगिकीकरण और रोजगार सृजन की धीमी गति जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं, जिन पर सरकार को आगे और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होगी।
बहरहाल, देखा जाये तो ऐसे समय में जब जम्मू-कश्मीर धीरे-धीरे हिंसा की छवि से बाहर निकलकर विकास, निवेश और पर्यटन की नई पहचान बना रहा है, तब 'काला दिवस' की राजनीति आम कश्मीरी की आकांक्षाओं से मेल खाती नहीं दिखती। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन राष्ट्रध्वज जैसे राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीक के प्रति असावधानी किसी भी राजनीतिज्ञ से अपेक्षित नहीं है। महबूबा मुफ्ती का तिरंगे को उल्टा पकड़ना केवल एक विवाद नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच पर भी प्रश्नचिह्न है जो आज भी राष्ट्रीय एकता से जुड़े प्रतीकों के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखा पा रही है। सात वर्षों के अनुभव बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में अभी चुनौतियां अवश्य हैं, लेकिन शांति, आधारभूत विकास, पर्यटन, निवेश और राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में जो बदलाव आए हैं, उन्हें नकारना कठिन है। यही कारण है कि अनुच्छेद 370 हटाने का निर्णय सिर्फ संवैधानिक बदलाव नहीं, बल्कि नए जम्मू-कश्मीर की आधारशिला के रूप में देखा जा रहा है।
-नीरज कुमार दुबे