By प्रेस विज्ञप्ति | Aug 11, 2026
हाल ही में अहमदाबाद के चांगोदर रोड स्थित श्रीमती एन. एम. पाडलिया फार्मेसी कॉलेज में "विश्व सिकल सेल दिवस" का आयोजन कॉलेज के मैनेजिंग ट्रस्टी मगनभाई पटेल की अध्यक्षता में किया गया।
कार्यक्रम के दौरान एक विशेष सत्र में "सिकल सेल रोग के विरुद्ध भारत की लड़ाई: आदिवासी आबादी का संरक्षण" विषय पर भी विस्तृत चर्चा की गई, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों में रोग की रोकथाम, समय पर स्क्रीनिंग, उपचार तथा जन-जागरूकता बढ़ाने के विभिन्न उपायों पर प्रकाश डाला गया। मगनभाई पटेल ने सिकल सेल रोग के संबंध में विस्तृत एवं रोचक सांख्यिकीय जानकारी प्रस्तुत करते हुए कहा कि "सिकल (Sickle)" का अर्थ होता है हंसिया (दरांती) और "सेल (Cell)" का अर्थ है कोशिका। इस रोग में लाल रक्त कोशिकाएँ अपने सामान्य गोल आकार के स्थान पर हंसिया जैसी आकृति धारण कर लेती हैं।
उन्होंने बताया कि हंसिया के आकार की ये रक्त कोशिकाएँ अक्सर शरीर की रक्त वाहिकाओं में फँस जाती हैं, जिससे रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है। परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न अंगों तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाती। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर हृदय, किडनी, यकृत (लीवर) तथा फेफड़ों जैसे महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। इसलिए सिकल सेल रोग की समय पर पहचान, नियमित उपचार और व्यापक जन-जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।
मगनभाई पटेल ने इस आनुवंशिक (जेनेटिक) रोग के उपचार के संबंध में आगे बताया कि सिकल सेल रोग का स्थायी उपचार केवल बोन मैरो ट्रांसप्लांट है, जो अत्यंत महंगा और जटिल उपचार है। हालांकि, उचित देखभाल, नियमित उपचार और संतुलित जीवनशैली अपनाकर रोगी लंबा एवं स्वस्थ जीवन जी सकता है।उन्होंने कहा कि सिकल सेल रोगियों को प्रतिदिन 3 से 4 लीटर पानी अवश्य पीना चाहिए, जिससे रक्त गाढ़ा होने और रक्त वाहिकाओं में अवरोध बनने की संभावना कम हो जाती है। आहार में हरी पत्तेदार सब्जियाँ तथा अंकुरित दालों का अधिक सेवन करना चाहिए। गर्मियों में अत्यधिक गर्मी से बचना चाहिए, वर्षा ऋतु में भीगने से परहेज़ करना चाहिए तथा सर्दियों में पर्याप्त गर्म कपड़े पहनने चाहिए। इसके अलावा धूम्रपान और किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहना रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
मगनभाई पटेल ने आगे बताया कि चिकित्सक की सलाह के अनुसार रक्त निर्माण में सहायक फोलिक एसिड की दवा नियमित रूप से लेनी चाहिए। निमोनिया तथा अन्य संक्रमणों से बचाव के लिए आवश्यक टीके समय पर लगवाने चाहिए। साथ ही, चिकित्सक के मार्गदर्शन में हाइड्रॉक्सीयूरिया (Hydroxyurea) जैसी दवाओं का सेवन करने से दर्द के तीव्र दौरों (पेन क्राइसिस) की आवृत्ति और गंभीरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मगनभाई पटेल ने सिकल सेल रोग से संबंधित सांख्यिकीय जानकारी देते हुए बताया कि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जुलाई 2023 में प्रारंभ किए गए नेशनल सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (NSCAEM) के अंतर्गत देश के 17 उच्च-प्रभाव (हाई-प्रिवेलेंस) वाले राज्यों में बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है।उन्होंने बताया कि फरवरी 2026 तक उपलब्ध आधिकारिक सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश के आदिवासी एवं अन्य उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में 6.83 करोड़ से अधिक लोगों की रक्त जांच (ब्लड स्क्रीनिंग) की जा चुकी है। इनमें से करीब 2.38 लाख व्यक्तियों में सिकल सेल रोग की पुष्टि हुई है और उन्हें सरकारी अभिलेखों में सिकल सेल रोगी के रूप में पंजीकृत किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (Global Burden of Disease) सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 82,500 बच्चे सिकल सेल रोग के साथ जन्म लेते हैं। सामान्य अनुमानों के अनुसार देश में 10 लाख से अधिक लोग इस रोग से प्रभावित हो सकते हैं, हालांकि दूरदराज़ एवं आदिवासी क्षेत्रों में आज भी अनेक मामलों का समय पर निदान नहीं हो पाता है।
मगनभाई पटेल ने आगे बताया कि भारत में सिकल सेल रोग से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात प्रमुख हैं। गुजरात में बनासकांठा जिले के दांता क्षेत्र से लेकर डांग जिले तक फैले पूर्व-दक्षिणी आदिवासी क्षेत्र में इस रोग का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में गुजरात में सरकारी अभिलेखों के अनुसार 30,512 से अधिक सक्रिय सिकल सेल रोगी पंजीकृत हैं।
मगनभाई पटेल ने सिकल सेल रोग के बारे में आगे जानकारी देते हुए कहा कि यह रोग केवल रक्त को ही नहीं, बल्कि शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित करता है। रक्त वाहिकाओं में अवरोध (ब्लॉकेज) उत्पन्न होने के कारण रोगियों को बार-बार तीव्र दर्द के दौरों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें "पेन क्राइसिस (Pain Crisis)" कहा जाता है। लगातार एनीमिया रहने के कारण कमजोरी, थकान तथा शारीरिक कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। समय के साथ बार-बार होनेवाले अवरोधों के कारण फेफड़े, हृदय, गुर्दे (किडनी), मस्तिष्क, हड्डियाँ तथा आँखें भी प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए रोगियों के लिए नियमित चिकित्सकीय जांच और फॉलो-अप अत्यंत आवश्यक है, ताकि उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाए रखी जा सके।
मगनभाई ने आगे कहा कि केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्क्रीनिंग के माध्यम से समय पर पहचान भी उतनी ही आवश्यक है। स्क्रीनिंग कार्यक्रमों से सिकल सेल रोगियों के साथ-साथ सिकल सेल लक्षण (ट्रेट) वाले व्यक्तियों की भी पहचान की जा सकती है। उन्होंने बताया कि सिकल सेल एनीमिया एक वंशानुगत (हेरिडिटरी) एवं आनुवंशिक (जेनेटिक) रक्त विकार है। इसलिए इस रोग के प्रसार को रोकने के लिए विवाह से पूर्व युवक और युवती दोनों की रक्त जांच कराना अत्यंत आवश्यक है। यदि माता और पिता दोनों सिकल सेल ट्रेट के वाहक (कैरियर) हों, तो उनकी संतान में सिकल सेल रोग होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
उन्होंने कहा कि विवाह तय करने से पहले युवक एवं युवती दोनों को एच.पी.एल.सी (HPLC – High-Performance Liquid Chromatography) जांच अवश्य करानी चाहिए, क्योंकि यह परीक्षण सिकल सेल की वास्तविक स्थिति का सटीक पता लगाता है। भारत सरकार के नेशनल सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के अंतर्गत पुरुषों को नीले (ब्लू) तथा महिलाओं को गुलाबी (पिंक) रंग का सिकल सेल स्टेटस कार्ड प्रदान किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिकल सेल कोई संक्रामक रोग या सामाजिक कलंक नहीं है, बल्कि एक सामान्य आनुवंशिक विकार है। इसलिए किसी व्यक्ति की रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर उसके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।उन्होंने समाज के वरिष्ठ नागरिकों और युवाओं से आह्वान किया कि विवाह संबंधी चर्चाओं में सिकल सेल परीक्षण को अनिवार्य प्राथमिकता दी जाए। उनका कहना था कि ऐसे निवारक कदम भविष्य की पीढ़ियों में सिकल सेल रोग के साथ जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकते हैं।
अपने संबोधन के अंत में मगनभाई पटेल ने कहा कि प्रत्येक स्वास्थ्य सेवा पेशेवर की जिम्मेदारी है कि वह समाज को आनुवंशिक रोगों के प्रति जागरूक और शिक्षित करे। उन्होंने कहा कि फार्मेसी के विद्यार्थी विशेष रूप से जागरूकता अभियान आयोजित करके, स्वास्थ्य जांच शिविरों में भाग लेकर तथा लोगों को उचित स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मार्गदर्शन देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य के फार्मासिस्ट केवल दवाइयाँ उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज के शिक्षक,परामर्शदाता (काउंसलर) और जनस्वास्थ्य के सशक्त समर्थक भी हैं।
यह विकार विश्व के अनेक देशों में पाया जाता है, विशेष रूप से आदिवासी समुदायों में इसकी व्यापकता अधिक है। चूँकि यह एक आनुवंशिक (जेनेटिक) एवं वंशानुगत रोग है, इसलिए यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवारों में स्थानांतरित होता रहता है। इस रोग से उत्पन्न जटिलताएँ प्रभावित व्यक्तियों के जीवन की गुणवत्ता, शिक्षा, रोजगार तथा समग्र सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
भारत में विश्व की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी निवास करती है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) समुदायों का है। इन समुदायों में सिकल सेल रोग की अधिकता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसे आदिवासी स्वास्थ्य से जुड़ी प्रमुख चिंताओं में से एक के रूप में चिन्हित किया है, जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को सिकल सेल रोग की रोकथाम एवं नियंत्रण में भारत सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में भी जानकारी दी गई। नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के अंतर्गत सिकल सेल रोग तथा थैलेसीमिया सहित विभिन्न हीमोग्लोबिन विकारों की रोकथाम, पहचान, उपचार और प्रभावी प्रबंधन के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। इसके साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्क्रीनिंग कार्यक्रम, निदान, उपचार तथा रोगियों के समुचित प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
कार्यक्रम में नेशनल सिकल सेल एनीमिया एलिमिनेशन मिशन की उपलब्धियों पर भी विशेष प्रकाश डाला गया, जिसे भारत की सबसे महत्वाकांक्षी सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों में से एक माना जाता है। इस मिशन के अंतर्गत अब तक लाखों लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है, जिससे स्वास्थ्यकर्मी प्रारंभिक चरण में ही प्रभावित व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें समय पर उचित चिकित्सकीय उपचार से जोड़ पा रहे हैं। इस मिशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जागरूकता की कमी अथवा स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच के कारण कोई भी व्यक्ति बिना निदान और उपचार के न रह जाए।
इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य सिकल सेल रोग से प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना तथा व्यापक जन-जागरूकता और नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के माध्यम से इस रोग के प्रसार को कम करना है। मिशन का दीर्घकालिक लक्ष्य वर्ष 2047 से पहले भारत में सिकल सेल रोग को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करना है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों, शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, सामुदायिक नेताओं तथा आम नागरिकों के बीच मजबूत सहयोग और सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।
इस कार्यक्रमने विद्यार्थियों को स्वास्थ्य शिक्षा अभियानों में सक्रिय रूप से भाग लेने तथा अपने समुदाय के लोगों को, जब भी ऐसी सुविधाएँ उपलब्ध हों, सिकल सेल स्क्रीनिंग करवाने के लिए प्रेरित करने का संदेश दिया। कार्यक्रम में बताया गया कि समय पर पहचान, शीघ्र उपचार, नियमित चिकित्सकीय फॉलो-अप तथा समुदाय की सक्रिय भागीदारी—ये सभी मिलकर भारत में सिकल सेल रोग के बोझ को कम करने की सबसे प्रभावी रणनीति बनाते हैं।
इस जागरूकता कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण भाग विद्यार्थियों को यह समझाने के लिए समर्पित था कि सिकल सेल रोग कैसे विकसित होता है, इसके कौन-से चेतावनी संकेतों को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए तथा समय पर निदान और उपचार क्यों अत्यंत आवश्यक हैं। सत्र के दौरान बताया गया कि यद्यपि सिकल सेल रोग जन्म से ही वंशानुगत रूप में प्राप्त होता है, फिर भी इसकी अनेक जटिलताओं को समय पर पहचान, नियमित चिकित्सकीय देखभाल और व्यापक जन-जागरूकता के माध्यम से काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कार्यक्रम में बताया गया कि इन जटिलताओं को कम करने के लिए प्रारंभिक निदान (Early Diagnosis) सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के माध्यम से सिकल सेल रोग से प्रभावित व्यक्तियों के साथ-साथ सिकल सेल ट्रेट (वाहक) वाले लोगों की भी पहचान की जा सकती है। ऐसी पहचान स्वास्थ्य विशेषज्ञों को प्रारंभिक अवस्था में ही उचित परामर्श, उपचार तथा आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करने में सक्षम बनाती है। साथ ही, परिवार आनुवंशिक परामर्श (Genetic Counselling) के माध्यम से यह भी समझ सकते हैं कि भविष्य की पीढ़ियों में इस रोग के स्थानांतरण की संभावना को कैसे कम किया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि सिकल सेल रोग एक आजीवन रहनेवाली चिकित्सकीय स्थिति है, जिसके लिए निरंतर चिकित्सा देखभाल आवश्यक होती है। यद्यपि इस प्रस्तुति में किसी सरल या त्वरित उपचार की चर्चा नहीं की गई, फिर भी यह बताया गया कि उचित रोग-प्रबंधन से इसकी जटिलताओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और रोगियों के समग्र स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, दर्द के दौरों के समय शीघ्र उपचार, संक्रमण से बचाव तथा चिकित्सकीय सलाह का पालन करने से रोगी अधिक स्वस्थ, सक्रिय और उत्पादक जीवन व्यतीत कर सकते हैं। साथ ही परिवार के सदस्यों एवं देखभाल करनेवालों में जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वे लक्षणों की शीघ्र पहचान कर समय रहते चिकित्सकीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
कार्यक्रम में जन-जागरूकता बढ़ाने में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर भी विशेष बल दिया गया। यह बताया गया कि फार्मेसी के विद्यार्थी, भविष्य के स्वास्थ्य सेवा पेशेवर होने के नाते, समाज को वंशानुगत रोगों के प्रति जागरूक करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा सकते हैं। स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन, जन-जागरूकता अभियानों में सक्रिय भागीदारी तथा स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करके विद्यार्थी सिकल सेल रोग की समय पर पहचान, रोकथाम और नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
कार्यक्रम में कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर भावना पी. जाधव ने अपने संबोधन में कहा कि आनुवंशिक रोगों से जुड़ी अनेक भ्रांतियाँ और गलत धारणाएँ अक्सर परिवारों को समय पर स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त करने से रोकती हैं। भय, सामाजिक कलंक तथा जागरूकता के अभाव के कारण अनेक लोग सिकल सेल की स्क्रीनिंग कराने से हिचकिचाते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा, वैज्ञानिक जानकारी और खुले संवाद के माध्यम से इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है। जन-जागरूकता अभियान समाज में फैली भ्रांतियों को समाप्त करने तथा सिकल सेल रोग से प्रभावित व्यक्तियों के लिए सहयोगपूर्ण और संवेदनशील वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि सिकल सेल रोग की प्रभावी रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों, सरकारी एजेंसियों, शैक्षणिक संस्थानों, सामुदायिक नेताओं तथा परिवारों के बीच समन्वित सहयोग अत्यंत आवश्यक है। जब समुदाय जागरूकता अभियानों और स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाता है, तब रोग की समय पर पहचान की संभावना बढ़ जाती है, जिससे अंततः इस रोग का बोझ कम किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि जागरूकता ही रोकथाम और बेहतर रोग-प्रबंधन की दिशा में पहला कदम है। इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में सिकल सेल रोग के प्रति समझ विकसित करने के साथ-साथ उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य संवर्धन में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित किया। जानकारीपूर्ण प्रस्तुतियों, विचार-विमर्श तथा वक्ताओं के साथ संवाद के माध्यम से प्रतिभागियों ने सिकल सेल रोग, उसके कारणों, संभावित जटिलताओं, रोकथाम के उपायों तथा समय पर निदान के महत्व के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की।
कार्यक्रम में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि सामूहिक स्क्रीनिंग के माध्यम से प्रारंभिक पहचान सिकल सेल रोग के बोझ को कम करने की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक है। सिकल सेल ट्रेट (वाहक) वाले व्यक्तियों को समय पर आनुवंशिक परामर्श उपलब्ध कराया जा सकता है, जबकि सिकल सेल रोग से प्रभावित मरीजों का शीघ्र निदान होने पर उनका उपचार और नियमित चिकित्सकीय फॉलो-अप समय पर प्रारंभ किया जा सकता है। ये उपाय न केवल रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाते हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों में इस रोग के नए मामलों की संख्या कम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
कार्यक्रम के दौरान वर्ष 2047 से पहले सिकल सेल रोग को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने के भारत सरकार के संकल्प पर भी विशेष प्रकाश डाला गया। उपस्थित श्रोताओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ बनाने, स्क्रीनिंग कार्यक्रमों का विस्तार करने, निदान सुविधाओं में सुधार लाने तथा संवेदनशील एवं आदिवासी समुदायों में जन-जागरूकता बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों को सामुदायिक जन-जागरूकता गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाने तथा लोगों को सिकल सेल रोग की समय पर पहचान और स्क्रीनिंग के महत्व के प्रति जागरूक करके इस राष्ट्रीय अभियान को सफल बनाने का आह्वान किया गया।
सिकल सेल रोग के विरुद्ध संघर्ष केवल स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों के प्रयासों से ही सफल नहीं हो सकता। इसकी सफलता परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों, सामुदायिक संगठनों, सरकारी एजेंसियों तथा आम जनता की सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करती है। जब समाज के सभी वर्ग मिलकर कार्य करते हैं, तब आनुवंशिक रोगों से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया जा सकता है, सामाजिक कलंक को कम किया जा सकता है तथा अधिक से अधिक लोगों को समय पर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों ने इस सत्र के माध्यम से आनुवंशिक विकारों के प्रति अपनी समझ को और अधिक विकसित किया तथा समाज सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत किया। अनेक प्रतिभागियों ने परिवारों को जागरूक करने, स्वैच्छिक स्क्रीनिंग को प्रोत्साहित करने तथा सिकल सेल रोग से प्रभावित व्यक्तियों को सहयोग प्रदान करने के महत्व को स्वीकार किया। इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को अपने व्यावसायिक ज्ञान का उपयोग समाज के व्यापक हित में करने तथा स्वस्थ और जागरूक समुदायों के निर्माण में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रेरित किया।
जागरूकता कार्यक्रम का समापन आयोजन समिति, फैकल्टी सदस्यों तथा विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए किया गया, जिनके सहयोग और समर्पण से यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम की मुख्य प्रस्तुतकर्ता असिस्टेंट प्रोफेसर सुश्री भावना पी. जाधव की सराहना की गई, जिन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों को व्यावहारिक जनस्वास्थ्य जागरूकता के साथ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हुए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक सत्र प्रदान किया।
कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि व्यापक जन-जागरूकता, समय पर स्क्रीनिंग, शीघ्र निदान, उचित उपचार तथा मजबूत सामुदायिक सहभागिता सिकल सेल रोग के बोझ को कम करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। समाज के प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि वह सिकल सेल रोग के प्रति जागरूकता फैलाने, प्रभावित व्यक्तियों का सहयोग करने तथा स्वस्थ, जागरूक और सशक्त समाज के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दे।
यह कार्यक्रम इस आशा के साथ संपन्न हुआ कि शिक्षा,अनुसंधान,स्वास्थ्य सेवाओं की सुदृढ़ पहल तथा सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से भारत वर्ष 2047 से पहले सिकल सेल रोग को एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में समाप्त करने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।श्रीमती एन. एम. पाडलिया फार्मेसी कॉलेज, अहमदाबाद में आयोजित यह जागरूकता कार्यक्रम इस राष्ट्रीय मिशन में एक सार्थक योगदान के रूप में सामने आया, जिसने विद्यार्थियों को अपने-अपने समुदायों में स्वास्थ्य, करुणा और वैज्ञानिक जागरूकता के दूत बनने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि श्रीमती एन. एम. पाडलिया फार्मेसी कॉलेजने अपने चेयरमैन एवं मैनेजिंग ट्रस्टी श्री मगनभाई पटेल के दूरदर्शी मार्गदर्शन और प्रभावी नेतृत्व में Gujarat Technological University से संबद्ध अग्रणी फार्मेसी संस्थानों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है।
कॉलेज के प्राचार्य डॉ. जितेन्द्र भंगाले के नेतृत्व में प्रत्येक माह स्वास्थ्य एवं फार्मेसी से संबंधित करीब चार से पाँच राष्ट्रीय संगोष्ठियों (नेशनल सेमिनार) का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों (नेशनल एवं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस) का भी सफल आयोजन होता है, जिनमें देश और राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा फार्मेसी महाविद्यालयों के प्रख्यात प्राध्यापक, विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक विद्यार्थियों को स्वास्थ्य विज्ञान और फार्मेसी के क्षेत्र की नवीनतम एवं मार्गदर्शक जानकारी प्रदान करते हैं। इसी कारण इस कॉलेज में बी. फार्म तथा एम. फार्म के परिणाम निरंतर उत्कृष्ट रहे हैं।
कॉलेज में अध्ययन करनेवाले अधिकांश विद्यार्थी अहमदाबाद जिले के धोलका, चांगोदर और साणंद जैसे ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। आधुनिक प्रयोगशालाएँ, अत्याधुनिक उपकरण, अनुभवी एवं समर्पित प्राध्यापकों की टीम तथा बिना किसी जाति, धर्म या सामाजिक भेदभाव के सभी विद्यार्थियों को समान अवसर प्रदान करनेवाली यह संस्था गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। विभिन्न पृष्ठभूमियों से आनेवाले विद्यार्थी यहाँ सौहार्दपूर्ण वातावरण में साथ मिलकर अध्ययन करते हैं। इन विशेषताओं के आधार पर यह कहना उचित होगा कि यह महाविद्यालय केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि देश के उत्कृष्ट फार्मेसी शिक्षण संस्थानों में महत्वपूर्ण स्थान पर है।