By रेनू तिवारी | Jul 03, 2026
पारंपरिक मसाला फिल्मों और घिसी-पिटे थ्रिलर फॉर्मूलों से अलग जब कोई सिनेमा अपनी एक नई राह चुनने का जोखिम उठाता है, तो सिनेप्रेमियों का ध्यान उसकी तरफ खिंचा चला आता है। इस शुक्रवार बड़े पर्दे पर रिलीज हुई निर्देशक नचिकेत सामंत की फिल्म 'बेबी डू डाई डू' (Baby Do Die Do) हिंदी सिनेमा के इसी ढर्रे को तोड़ने का एक साहसिक प्रयास है। फिल्म का शीर्षक पहली बार सुनने में थोड़ा अजीब या उलझा हुआ लग सकता है, लेकिन कहानी की गहराई में उतरते ही इसका गणित साफ हो जाता है। दरअसल, यह नाम मुख्य किरदार 'बेबी करमरकर' के उपनाम से निकला है—'कर-मर-कर' (Kar-Mar-Kar) यानी 'डू, डाई, डू' (Do, Die, Do)। 2 घंटे 5 मिनट की यह 'A' सर्टिफाइड एक्शन-क्राइम-थ्रिलर पल्प फिक्शन और डार्क ह्यूमर की एक ऐसी अनोखी दुनिया रचती है, जहां खामोशी की गूंज हथियारों की आवाज से कहीं ज्यादा तेज है।
कहानी: अतीत का स्याह साया और छाते वाली 'हिटवुमन'
फिल्म की शुरुआत किसी शोर-शराबे से नहीं, बल्कि एक डरावनी खामोशी से होती है। मुख्य किरदार 'बेबी' (हुमा कुरैशी) न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है। बचपन में एक अनजाने सफर के दौरान बेबी अपनी जुड़वां बहन के साथ एक खाली आलीशान फाइव-स्टार होटल में दाखिल हो जाती है, जहां दोनों बहनें अनजाने में एक खौफनाक मर्डर की चश्मदीद बन जाती हैं। बेरहम कातिल बेबी की जुड़वां बहन का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतार देता है, जबकि बेबी किसी तरह अपनी जान बचाकर भाग निकलती है। एक शराबी पिता के साये में पली-बढ़ी बेबी के सीने में उस रात बदले की जो चिंगारी सुलगती है, वह उसे एक सामान्य जीवन से बहुत दूर ले जाती है।
बड़ी होने पर बेबी का सामना पीएम जैन (चंकी पांडे) से होता है, जो उसे कॉन्ट्रैक्ट किलिंग (सुपारी लेकर हत्या करने) के स्याह और बेरहम अंडरवर्ल्ड में ले आता है। अपनी शारीरिक अक्षमता को कमजोरी बनाने के बजाय बेबी उसे अपनी सबसे बड़ी ढाल बना लेती है और इस अपराध जगत की सबसे अचूक 'हिटवुमन' बनकर उभरती है।
कातिलाना अंदाज: बेबी का मर्डर करने का तरीका बेहद जुदा है। वह किसी पारंपरिक गन या चाकू के बजाय एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए 'छाते' (Umbrella) का इस्तेमाल करती है, जो देखने में जितना साधारण है, एक्शन में उतना ही जानलेवा।
शहर में एक के बाद एक होने वाली हाई-प्रोफाइल हत्याएं पुलिस महकमे को हिलाकर रख देती हैं। हालांकि, बेबी का असली मकसद सिर्फ एक पेशेवर कातिल बने रहना नहीं है; वह तो उस बड़े कॉर्पोरेट और क्रिमिनल नेक्सस को भेदकर अपनी बहन के असली कातिल तक पहुंचना चाहती है। इसी बीच उसकी जिंदगी में प्यार की दस्तक होती है, और कहानी प्रतिशोध से आगे बढ़कर पहचान, जज्बात और मुक्ति के मुहाने पर जा खड़ी होती है।
अभिनय: हुमा की खामोशी दमदार, चंकी पांडे का सरप्राइज पैकेज
हुमा कुरैशी (बेबी): यह फिल्म पूरी तरह से हुमा के कंधों पर टिकी है और यह उनके करियर की सबसे परिपक्व परफॉर्मेंस है। बिना एक भी शब्द बोले, सिर्फ अपनी आंखों के उतार-चढ़ाव, चेहरे की सूक्ष्म रेखाओं और सधी हुई बॉडी लैंग्वेज से उन्होंने बेबी के दर्द और आक्रोश को जीवंत कर दिया है। पर्दे पर बिना किसी लाउड मेकअप के खुद को पेश करने का उनका फैसला किरदार को बेहद वास्तविक (Raw) बनाता है। वह एक पल में क्रूर शूटर तो दूसरे ही पल एक संवेदनशील प्रेमी के रूप में ढल जाती हैं।
चंकी पांडे (पीएम जैन): चंकी पांडे इस फिल्म के सबसे बड़े 'सरप्राइज पैकेज' हैं। अपनी पुरानी कॉमिक छवि को पूरी तरह ध्वस्त करते हुए उन्होंने अंडरवर्ल्ड के एक शांत, गंभीर और बेहद क्रूर गैंग लीडर के रूप में स्क्रीन पर खौफ पैदा किया है।
सिकंदर खेर (ज़फ़र): एक चालाक और लालची बिल्डर के निगेटिव रोल में सिकंदर खेर ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है, जो कहानी के तनाव को और गहरा करती है।
सीमा पाहवा (DCP अंजुम खान): अनुभवी सीमा पाहवा ने हमेशा की तरह बेहद स्वाभाविक अभिनय किया है। उनका एक संवाद—"हम पुलिस हैं, हीरो नहीं"—फिल्म के यथार्थवादी मिजाज को बखूबी बयां करता है।
रचित सिंह (सिद्धू): बेबी के प्रेमी 'सिद्धू' के रूप में रचित सिंह काफी ईमानदार लगे हैं। उनका किरदार पारंपरिक और टॉक्सिक मस्कुलर हीरो जैसा नहीं है, बल्कि वह एक 'घरेलू' और केयरिंग पार्टनर होने में गर्व महसूस करते हैं। ब्लैक-एंड-व्हाइट फ्लैशबैक दृश्यों में हुमा और उनके बीच का रोमांस फिल्म की हिंसा के बीच ताजी हवा के झोंके जैसा है।
इसके अलावा विद्या मालवड़े, हिमांशु मलिक, रूपेश बाने, अरुण कुशवाहा और मरुधर शेखावत ने अपने छोटे लेकिन दिलचस्प किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष: शानदार 'नॉयर' ट्रीटमेंट
निर्देशक नचिकेत सामंत ने एक बेहद संवेदनशील और बोल्ड विषय को कमर्शियल मनोरंजन के सांचे में बेहतरीन तरीके से ढाला है। वह मुंबई के क्राइम नेटवर्क को बेवजह का ग्लैमर देने के बजाय एक ऐसे ऑर्गनाइज़्ड सिस्टम के रूप में दिखाते हैं, जहां हिंसा महज एक बिजनेस डील है। फिल्म की रफ्तार तेज है, जो दर्शकों को बांधकर रखती है।
Baby Do Die Do: डार्क ह्यूमर, नॉयर ट्रीटमेंट और दमदार डायरेक्शन
डायरेक्टर नचिकेत सामंत ने एक बोल्ड और संवेदनशील विषय को पूरी तरह से कमर्शियल और मनोरंजक फॉर्मेट में ढालने की कोशिश की है। वे मुंबई के क्राइम नेटवर्क को बहुत ज़्यादा ग्लैमरस या काल्पनिक नहीं, बल्कि एक ऐसे ऑर्गनाइज़्ड सिस्टम के तौर पर दिखाते हैं जहाँ हिंसा एक बिज़नेस डील की तरह काम करती है। डार्क कॉमेडी, सस्पेंस और एक्शन के बीच बैलेंस बनाने की डायरेक्टर की कोशिश काफी हद तक सफल रही है। फिल्म शुरू से ही तेज़ रफ़्तार बनाए रखती है, जिससे दर्शक कभी बोर नहीं होते।
तकनीकी तौर पर फिल्म काफी शानदार है। टोजो ज़ेवियर की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की एक और बड़ी खूबी है। वे मुंबई की बारिश से भीगी सड़कों, तंग गलियों और कम रोशनी वाले कमरों को क्लासिक नॉयर सिनेमा के अंदाज़ में दिखाते हैं, जिससे पूरे समय एक रहस्यमयी और इंटेंस माहौल बना रहता है। मुंबई शहर खुद कहानी में एक खामोश किरदार की तरह उभरता है। एडिटिंग कसी हुई है, जिससे कहानी कहीं भी बेवजह खिंचती नहीं है। एक्शन सीक्वेंस बहुत स्टाइलिश तरीके से कोरियोग्राफ किए गए हैं, खासकर मुंबई लोकल ट्रेन के अंदर फिल्माया गया मर्डर सीक्वेंस, जो बेहद डरावना और रोंगटे खड़े कर देने वाला है। बैकग्राउंड स्कोर और म्यूज़िक सीन के असर को बढ़ाते हैं, और गानों को कहानी में इस तरह पिरोया गया है कि वे कहानी के बहाव में रुकावट नहीं डालते।
इसके अलावा, फिल्म में कुछ दिलचस्प समकालीन सिनेमाई रेफरेंस भी शामिल हैं, जैसे 'अल्फा' का ज़िक्र और साकिब सलीम वाला 'अल्फा Q' नाम का क्वीर क्लब नंबर। फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा से जुड़ा एक स्मार्ट 'ईस्टर एग' भी है।
Baby Do Die Do: 'Baby' कहाँ कमज़ोर पड़ गई?
इतनी खूबियों के बावजूद, 'Baby Do Die Do' में कुछ कमियां भी हैं। पहले हाफ में सेटअप बनाने में काफी समय लगता है और 'Baby' के सामने आने वाली चुनौतियां काफी देर से सामने आती हैं, जो थोड़ा सुस्त लग सकता है। हालांकि, अगर आप शुरुआती 10-12 मिनट की उस सुस्ती को झेल लेते हैं, तो कहानी बाद में कहीं भी निराश नहीं करती।
इसके अलावा, फिल्म ऐसे मोड़ पर खत्म होती है जहाँ पार्ट 2 की गुंजाइश बनती है। हालांकि, यह ट्विस्ट शायद ज़रूरी नहीं था। वजह यह है कि जिस मकसद के लिए 'Baby' क्रिमिनल बनी थी - बदला लेने की उसकी इच्छा - वह पहले ही पूरा हो चुका है। ऐसे में, दूसरे हिस्से में उसका कोई निजी मकसद नहीं रह जाता और वह सिर्फ़ इसलिए अपराध करती रहती है क्योंकि अपराध की दुनिया में एक बार घुसने के बाद, पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से कमर्शियल कोशिश ज़्यादा लगती है।
बेबी डू डाई डू: फ़िल्म की खास बातें
फ़िल्म हर पल सस्पेंस बनाए रखती है और आखिर तक यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि आगे क्या होगा। दूसरे हाफ़ में सस्पेंस धीरे-धीरे खुलता है। फ़िल्म का दूसरा हाफ़ बहुत अच्छे से लिखा गया है और इसमें कई ट्विस्ट हैं। क्लाइमैक्स फ़िल्म का सबसे मज़बूत हिस्सा है; यह आपको हैरान कर सकता है और ऐसा एहसास दिलाता है कि "हमने इसकी उम्मीद नहीं की थी"।
सिनेमैटोग्राफ़ी बेहतरीन है; पानी की बूंदों के टपकने से लेकर लंबे शॉट्स तक, सब कुछ शानदार ढंग से शूट किया गया है।
बेबी डू डाई डू: फ़ाइनल वर्डिक्ट
कमियों के बावजूद, ‘बेबी डू डाई डू’ एक बहुत ईमानदार, बोल्ड और मनोरंजक थ्रिलर फ़िल्म है। इस फ़िल्म की एक बड़ी खासियत यह है कि ऐसे दौर में जब महिलाओं पर केंद्रित एक्शन फ़िल्में अक्सर सीधे OTT प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ होती हैं, इसके मेकर्स (साकिब सलीम) ने इसे सिनेमाघरों में रिलीज़ करने का साहस दिखाया। यह फ़िल्म साबित करती है कि मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा में नए विचारों और प्रयोगों के लिए अभी भी जगह है।
अगर आपको पारंपरिक, फ़ॉर्मूला-बेस्ड मसाला फ़िल्मों से कुछ अलग, स्टाइलिश, थोड़ी डार्क और सस्पेंस से भरपूर फ़िल्में देखना पसंद है, तो आपको हुमा कुरैशी के शांत लेकिन दमदार अवतार को देखने के लिए ज़रूर सिनेमाघर जाना चाहिए। यह फ़िल्म निश्चित रूप से आपकी वॉचलिस्ट में जगह पाने की हकदार है।