Umar Khalid और Sharjeel Imam समेत अन्य आरोपियों की जमानत याचिका खारिज, जेल में ही रहेंगे दिल्ली दंगों के 'मास्टरमाइंड'

By नीरज कुमार दुबे | Sep 02, 2025

दिल्ली हाईकोर्ट ने आज 2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साज़िश से जुड़े मामले में 18 में से 10 आरोपियों की ज़मानत याचिका खारिज कर दी। आरोपियों में शरजील इमाम, उमर खालिद सहित कई अन्य शामिल हैं। इन सभी की गिरफ्तारी को पाँच साल बीत चुके हैं। न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शालिंदर कौर की खंडपीठ ने उनकी ज़मानत याचिकाओं पर फैसला सुनाया। अन्य आरोपियों में आतहर खान, अब्दुल खालिद सैफी, मोहम्मद सलीम खान, शिफाउर रहमान, मीरान हैदर, गुलफिशा फ़ातिमा और शादाब अहमद शामिल हैं।

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हम आपको बता दें कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों को पाँच साल बीत चुके हैं। ज़िला पुलिस द्वारा दंगा, आगज़नी और अवैध भीड़ से जुड़े 695 मामलों में से अब तक 109 मामलों में अदालतें फैसला सुना चुकी हैं। फरवरी 2020 में 24 से 26 तारीख़ के बीच भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में 53 लोग मारे गए थे, 500 से अधिक लोग घायल हुए थे और करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुँचा था। मार्च 2020 में दिल्ली क्राइम ब्रांच ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसकी जाँच स्पेशल सेल कर रही है।

उमर खालिद उन कई युवा कार्यकर्ताओं में शामिल है जिन पर दिल्ली दंगों की हिंसा से जुड़े मामले दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा, 18 आरोपियों में से कार्यकर्ता सफ़ूरा ज़रगर को जून 2020 में ज़मानत मिल गई थी, जबकि एक अन्य आरोपी फ़ैज़ान को अक्टूबर 2020 में ज़मानत दी गई थी। तीन अन्य कार्यकर्ताओं— नताशा नरवाल, देवांगना कलीता और आसिफ़ इक़बाल तन्हा को जून 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट ने ज़मानत दी थी। कांग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहाँ को मार्च 2022 में इस मामले में ज़मानत दी गई थी। एक अन्य आरोपी सलीम मलिक की ज़मानत अर्जी अप्रैल 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी। आम आदमी पार्टी (AAP) का पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन भी इस मामले में अभी हिरासत में है।

हम आपको बता दें कि 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे आधुनिक भारत के सबसे गंभीर साम्प्रदायिक दंगों में गिने जाते हैं। तीन दिनों तक फैली इस हिंसा में 53 लोगों की जान गई थी, सैंकड़ों घायल हुए थे और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गई थी। अब पाँच साल बाद भी इस प्रकरण से जुड़े कई मामले न्यायिक प्रक्रिया में लंबित हैं। देखा जाये तो दिल्ली दंगे केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक परिघटना भी है। सरकार और एजेंसियों का तर्क है कि यह हिंसा एक “पूर्व नियोजित साज़िश” थी, जबकि आलोचकों का मानना है कि कठोर क़ानूनों का इस्तेमाल कर असहमति की आवाज़ों को दबाया गया है।

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