बाला साहेब ने जिन्हें पंचक कहा था, उद्धव ने उन्हीं के साथ सरकार बना ली

By डॉ. अजय खेमरिया | Nov 30, 2019

महाराष्ट्र की सियासी महाभारत में कांग्रेस को क्या हासिल हुआ है ? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना को तो सीएम की कुर्सी चाहिये थी, जो उसे मिल गई। और पवार साहब 79 साल की उम्र में भी खुद को महाराष्ट्र की सियासत के असली खिलाड़ी साबित करने में कामयाब रहे। लगे हाथ अपनी बेटी को मराठा राजनीति में अग्रणी रूप से स्थापित भी कर गए। कांग्रेस को स्पीकर के पद के अलावा क्या मिला है ? मोदी अमित शाह के अश्वमेधी रथ को रोकने के लिये क्या कांग्रेस ने फिर उसी तर्ज पर हथियार डाल दिये जैसा यूपी, बिहार में उसने लालू और अखिलेश के सामने समर्पण मुद्रा खुद ही अख्तियार कर ली थी। इस पूरे प्रहसन में आरंभिक तौर पर दो दल जमीनी तौर पर सबसे घाटे में रहने वाले हैं पहला शिवसेना और दूसरा कांग्रेस।

 

शिवसेना भले संजय राउत के अथक प्रयासों से मुख्यमंत्री पद हांसिल करने में कामयाब रही लेकिन उसका वैचारिक धरातल और कैडर विशुद्ध रूप से दरक चुका है। राष्ट्रपति चुनाव में मराठी मानुस के नाम पर प्रतिभा पाटिल का समर्थन हो या प्रणब मुखर्जी को वोट करने का मामला, जमीनी राजनीति से इसका कोई सीधा रिश्ता नहीं है क्योंकि राष्ट्रपति का चुनाव वोटरों और कार्यकर्ता के स्तर पर नहीं होता है। जाहिर है जो लोग पुराने उदाहरण देकर इस युति के लिये तार्किकता खड़ी कर रहे हैं वह जमीन की राजनीतिक हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश के महागठबंधन प्रयोग का अध्ययन करना चाहिये जो कागजों के अलावा बीजेपी के नेतृत्व को भी नतीजों से पहले वाटरलू का मैदान ही प्रतीत हो रहा था। उपचुनावों के नतीजों ने इस महागठबंधन की सार्थकता को कैमेस्ट्री की जगह अर्थमेटिक ज्यादा साबित किया था लेकिन जब मुख्य चुनावी बिसात बिछी तो गठबंधन हवा हो गया। बिहार में तो कमोबेश विपक्ष का सफाया ही हो गया था।

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जाहिर है मराठा राजनीति के इस गढ़ को भी हमें गहराई से विश्लेषण करने की आवश्यकता है। इस राज्य में पहली बार गैर मराठा गैर दलित मुख्यमंत्री मोदी ने बनाया था जिसने अपनी बेहतरीन स्ट्राइक रेट के साथ बीजेपी को 105 सीटें जिताई हैं। हमें याद रखना होगा कि बीजेपी के 25.8 फ़ीसदी के बाद सर्वाधिक मत इस राज्य में निर्दलीयों (18.6%) को मिले हैं और उद्धव ठाकरे दूसरी नहीं तीसरी (16.7%) बड़ी ताकत हैं, एनसीपी (16.4%) और कांग्रेस (15.6%) उनके पीछे हैं। यानी बीजेपी गैर मराठा गैर दलित कार्ड के साथ हिंदुत्व की जमीन पर अभी भी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत है। उसे शिवसेना के परंपरागत हिंदू मानसिकता वाला समर्थन भी 105 सीटों पर तो मिला ही है और जिन 56 सीटों पर शिवसेना जीती है वहाँ उसे मोदी का कोर वोटर मिला होगा। इस युति ने मोदी और बाल ठाकरे के फोटो लगाकर वोट मांगे। सवाल यह है कि अब महाराष्ट्र में बाला ठाकरे ब्रांड हिंदुत्व का क्या होगा ? जिसने पाकिस्तान, अयोध्या, तुष्टीकरण, सावरकर, गोडसे, कॉमन सिविल कोड जैसे मुद्दों पर बीजेपी से ज्यादा आक्रमक रुख अपना रखा है।

 

बाल ठाकरे ने दशहरे की अंतिम रैली में शिवसैनिकों से आग्रह किया था कि वे भारत को 'पंचक' से मुक्त कराकर ही दम लें। पंचक भारतीय ज्योतिष गणना में सबसे अशुभ माने जाते हैं इस अवधि में हिन्दू कोई शुभ या नया काम नहीं करते हैं। बाल ठाकरे ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, रॉबर्ट वाड्रा और अहमद पटेल को पंचक कहा था। इसी पंचक के आशीर्वाद से उद्धव ने बाल ठाकरे की समाधि के सामने खड़े होकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बाल ठाकरे के इसी कट्टर कांग्रेस विरोधी धरातल पर हजारों शिवसैनिकों की फ़ौज खड़ी हुई। करीब 35 साल के इस वैचारिक और बूथ स्तर के सियासी सँघर्ष का कांग्रेस से समेकन होना भविष्य में असंभव इसलिये लगता है क्योंकि यूपी, बिहार में महागठबंधन के बड़े नेताओं के पास खुद का जातिगत जनाधार मौजूद था लेकिन महाराष्ट्र में उद्धव की जमीन तो विशुद्ध हिंदुत्व की है उनका खुद का कोई जातिगत आधार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में त्रिदेव की इस युति में शिवसेना को वैसा ही नुकसान उठाना पड़ सकता है जैसा यूपी में अखिलेश यादव को उठाना पड़ा था। इस प्रदेश में मराठा राजनीति के शिखर पुरुष अभी भी शरद पवार ही हैं जो खुद को साबित कर चुके हैं और कांग्रेस के दूसरे नेता पृथ्वीराज चव्हाण, अशोक चव्हाण, शरद पवार के आगे आज भी बेहद फीके ही हैं।

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जाहिर है सत्ता में भागीदारी हासिल कर एनसीपी अपने मराठा कोर जनाधार को बरकरार रखने में सफल होगी। वैसे भी अपने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन में भी एनसीपी 65 सीट से ऊपर इस राज्य में नहीं जा सकती है। इस सीमित फलक के बावजूद वह बीजेपी के दिल्ली दरबार को चुनौती देने में सफल रहे। वहीं कांग्रेस इस मामले में कहीं भी किसी भी भूमिका में नहीं दिखी। शरद पवार इस घटनाक्रम के जरिये अपनी पारिवारिक विरासत को भी करीने से बेटी सुप्रिया सुले को हस्तांतरित करने में सफ़ल रहे हैं। यही नहीं वे पूरी कांग्रेस पर भारी साबित हुए हैं क्योंकि इस सरकार के मौजूदा गठन में उन्हें ही चाणक्य कहा जा रहा है। मोदी अमित शाह के तिलिस्म को तोड़ने या उसे फेल करने का श्रेय भी कोई 10 जनपथ या राहुल को नहीं दे रहा है।

 

समझा जा सकता है कि राष्ट्रीय परिदृश्य में भी मोदी से मुकाबिल होने की काबिलियत कांग्रेस नहीं शरद पवार ने स्वयंसिद्ध की है। जिस समय ईडी, सीबीआई के डर से कांग्रेस या दूसरे दलों के नेता डरे सहमे हैं तब शरद पवार खुद मुम्बई के ईडी दफ्तर पहुंचे तो इससे उनकी ब्रांड मराठा छवि तो मजबूत हुई ही साथ ही वे दिल्ली को चुनौती देते भी नजर आए। असल में यह चुनौती 79 साल के शरद पवार की जगह राहुल गांधी या काँग्रेस के नेताओं की तरफ से आनी चाहिये थी क्योंकि शरद पवार अधिकतम 60 असेम्बली सीट के नेता हैं। सही मायनों में मुंबई की महाभारत ने कांग्रेस के लिये बगैर लड़े ही सरेंडर योद्धा सी स्थिति निर्मित कर दी। पूरे चुनाव में पार्टी नेतृत्व कहीं नजर नही आया, किसी उम्मीदवार को चुनाव खर्च तक पार्टी उपलब्ध नहीं करा पाई और जो 44 लोग अपने दम और कांग्रेस की पहचान से जीत कर आ गए तब उनके ऊपर केसी वेणुगोपाल, मल्लिकार्जुन खड़गे और अहमद पटेल को बेताल की तरह लाद दिया गया। इनमें से किसी को महाराष्ट्र की समझ नहीं है। अनिर्णय का शिकार कोई कैसे होता है यह इस प्रकरण में कांग्रेस आलाकमान को देखकर समझा जा सकता है।

 

यह भी स्पष्ट है कि सोनिया गांधी इस युति के पक्ष में नहीं थीं, उन्होंने शरद पवार से कहा था कि वे शिवसेना से हाथ मिलाकर ऊपर महात्मा गांधी को क्या मुँह दिखायेंगी ? इस मनस्थिति के बावजूद आज महाराष्ट्र में कांग्रेस ठाकरे परिवार के साथ खड़ी होकर राज्याभिषेक करा रही है। सवाल महात्मा गांधी का नहीं फिलहाल के दो गुजराती धावकों को पीछे करने का है। कांग्रेस 2014, 2019 के दौरान कहीं टक्कर देती नहीं दिखी। इस त्रियुति में कांग्रेस ने पांचवीं पोजीशन खुद स्वीकार कर ली है क्योंकि सँघर्ष की जगह समर्पण दिल्ली के नेताओं को ज्यादा रास आता है इसीलिये पंचक और मातोश्री की नया सियासी समेकन खड़ा किया है अहमद पटेल ने। फिलहाल सरकार के सुशासन से पहले महाराष्ट्र में बीजेपी नैतिक रूप से शिकस्त और कलंकित होने के बावजूद बड़ी ताकत के रूप में रहेगी। एनसीपी बीजेपी को मैदानी टक्कर देगी। सवाल शिवसेना और कांग्रेस के भविष्य का है ?

 

-डॉ. अजय खेमरिया

 

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