Modi के Gujarat की Hilsa Fish के आयात पर Tarique Rahman ने लगा दी रोक, India-Bangladesh रिश्तों में आई नई टेंशन

By नीरज कुमार दुबे | Sep 24, 2026

भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंध पहले ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की हिलसा मछली का आयात रोक कर इस चिंगारी को और भड़का दिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार शाम बांग्लादेश ने भारत से हिलसा मंगाने वाले आयात परमिट रद्द कर दिए। पिछले करीब दो महीनों में बांग्लादेश लगभग 550 टन भारतीय हिलसा मंगा चुका था, लेकिन अब अचानक इस व्यापार पर रोक लगा दी गई है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश खुद हिलसा की कमी और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। यानी जिस भारतीय हिलसा की जरूरत बांग्लादेश के अपने बाजार को पड़ रही थी, उसी पर रोक लगाकर ढाका ने भारत के साथ पहले से तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

इसे भी पढ़ें: BRICS की सफलता और Mecca Pact की विफलता देख Bangladesh ने बदला रुख, नवंबर में India आने को आतुर हैं PM Tarique Rahman

लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं है। बंगाली समाज में इसका स्वाद, परंपरा, धार्मिक रीति और सांस्कृतिक पहचान से गहरा संबंध है। बांग्लादेश इसे अपनी राष्ट्रीय मछली मानता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी पद्मा की हिलसा को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है। हम आपको बता दें कि पद्मा गंगा की एक प्रमुख वितरिका है, जो आगे मेघना से मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाती है। यही वजह है कि पद्मा और मेघना की हिलसा भारत में महंगी कीमत पर भी खरीदी जाती है।

विडंबना देखिए कि बांग्लादेश लंबे समय से भारत को सीमित मात्रा में हिलसा भेजता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत से सैकड़ों टन हिलसा खरीद भी रहा है। पिछले दो महीनों में भारत से करीब 500 टन हिलसा बांग्लादेश पहुंची और अतिरिक्त 150 से 200 टन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इनमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की हिलसा की बताई गई है।

इसका कारण स्वाद से ज्यादा अर्थशास्त्र है। बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की अच्छी हिलसा लगभग 2,200 से 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिलसा वहां के थोक बाजार में लगभग 500 से 700 टका प्रति किलो की लागत पर पहुंचती है और खुदरा बाजार में करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो में बिक सकती है। यानी बांग्लादेश के लिए गुजरात की हिलसा स्थानीय कमी को पूरा करने का अपेक्षाकृत सस्ता माध्यम बन गई है।

यही वह कारण है जहां बांग्लादेश का मौजूदा फैसला सवालों के घेरे में आता है। अगर भारतीय हिलसा वहां की आपूर्ति व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग और कीमतों को संभालने में उपयोगी है, तो अचानक आयात परमिट रोकने से सबसे सीधा असर वहां के बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारत में भी इसका असर होगा। पश्चिम बंगाल के व्यापारियों के अनुसार गुजरात में मौजूदा हिलसा की उपलब्धता भी सीमित हो चुकी है और कोलकाता के बाजार में म्यांमार की हिलसा ही एक प्रमुख विकल्प बच सकती है।

भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन की है। पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन वर्ष 2001 के करीब 80 हजार टन से घटकर 2013 में लगभग 15 हजार टन और 2020 में करीब 10 हजार टन रह गया था। इसके पीछे बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक मछली पकड़ने को एक प्रमुख कारण बताया गया है। इसी कमी ने गुजरात की हिलसा के लिए बाजार तैयार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार गुजरात ने 2025-26 में करीब 14,588 टन हिलसा का उत्पादन किया।

वहीं बांग्लादेश में भी हिलसा का उत्पादन गिरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वार्षिक उत्पादन 2022 के 5,71,324 टन से घटकर 2025 में करीब 5 लाख टन रह गया। इसी दौरान कीमतों में भारी उछाल आया। ऐसे में भारत से आने वाली अपेक्षाकृत सस्ती हिलसा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

मगर सबसे बड़ा खतरा उपभोक्ता भरोसे का है। पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे बाजारों में गुजरात और गंगा की हिलसा में अंतर करना कई खरीदारों के लिए आसान नहीं है। कुछ व्यापारियों ने खुद माना कि खरीदार को यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि मछली वास्तव में कहां की है। ऐसे में गलत नाम से बिक्री का आरोप सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि खाद्य पारदर्शिता का मुद्दा भी बन जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक निहितार्थ साफ है। हिलसा अब सिर्फ स्वाद और परंपरा का विषय नहीं रही। यह सीमा-पार व्यापार, कीमत, स्थानीय उत्पादन, उपभोक्ता विश्वास और दोनों देशों के बाजारों की परस्पर निर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। बांग्लादेश भारत से हिलसा खरीदकर अपनी कमी पूरी करता है, जबकि भारत में बंगाली उपभोक्ता बांग्लादेशी पद्मा हिलसा के लिए तरसते हैं। देखा जाये तो एक ही मछली है, लेकिन सीमा के दोनों ओर उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका अलग है।

देखना होगा कि बांग्लादेश का यह परमिट-रोक फैसला अस्थायी प्रशासनिक कदम साबित होता है या हिलसा व्यापार में एक लंबी खींचतान की शुरुआत करता है। दुर्गापूजा से ठीक पहले लिया गया यह फैसला भारत के बाजार में पद्मा हिलसा की संभावित उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है। उधर, बांग्लादेश के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि जिस भारतीय आपूर्ति ने उसकी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों में एक खाली जगह भरी है, उसे अचानक रोकने का असर अंततः वहां के बाजार पर ही दिखाई देगा।

बहरहाल, हिलसा की यह कहानी अब सिर्फ स्वाद, परंपरा और बंगाली भावनाओं की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच बदलते व्यापारिक समीकरणों और एक-दूसरे पर निर्भर बाजारों की भी कहानी है। बांग्लादेश जिस भारतीय हिलसा को अपनी आपूर्ति की कमी पूरी करने के लिए खरीदता है, वही बांग्लादेशी पद्मा हिलसा भारत में दुर्लभता और प्रतिष्ठा के कारण सोने के भाव बिकती है। यानी एक ही मछली सीमा के इस पार भावनाओं की कीमत तय करती है और उस पार जरूरत की। ऐसे में अचानक व्यापार पर लगाई गई रोक सिर्फ मछली की आवाजाही रोकने का फैसला नहीं है। यह दोनों तरफ के बाजार, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि आखिर हिलसा के बहाने रिश्तों और व्यापार का यह खेल कब तक चलता रहेगा?

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Monsoon Snacks: Office Meal Plan में शामिल करें भुना चना और Sprouts Chaat, बारिश में नहीं होगी परेशानी

Kerala Sports Council के 14 जिला दफ्तरों में VACB की जांच, वित्तीय गड़बड़ी और गायब फाइलें पकड़ीं

Karnataka में 200 से अधिक तालुकों में सूखा, PM Modi से Relief Fund मांगेंगे DK Shivakumar

Gautam Adani ने की जबरदस्त वापसी! Mukesh Ambani को पछाड़ कर फिर बने नंबर-1, India में अमीरों की संख्या भी बढ़ी