Prabhasakshi NewsRoom: Hadi Murder Case में Bangladesh का झूठ बेनकाब, हत्या का आरोपी बोला- मैं Dubai में हूँ

By नीरज कुमार दुबे | Jan 01, 2026

बांग्लादेश में इस्लामवादी कट्टरपंथी और ‘इंक़िलाब मंच’ के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के मामले में अब ऐसा मोड़ आ गया है, जिसने अंतरिम सरकार की विश्वसनीयता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस आरोपी को ढाका लगातार भारत में छिपा हुआ बताकर आरोपों की झड़ी लगा रहा था, वही आरोपी अब सामने आकर न केवल हत्या से इंकार कर रहा है, बल्कि बांग्लादेश सरकार के दावों को सिरे से झूठा बता रहा है।


हम आपको बता दें कि हादी हत्याकांड के प्रमुख संदिग्धों में शामिल फैसल करीम मसूद उर्फ दाऊद (37) ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा है कि वह भारत में नहीं, बल्कि दुबई में है। उसने यह भी साफ किया कि उसका हादी की हत्या से कोई लेना-देना नहीं है और यह पूरा मामला गढ़ी हुई साजिश का हिस्सा है। मसूद ने दावा किया कि झूठे आरोपों और राजनीतिक दबाव के चलते उसे बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और वह वैध मल्टी-एंट्री वीज़ा पर बड़ी मुश्किल से दुबई पहुंचा।


हम आपको याद दिता दें कि 28 दिसंबर को ढाका ने दावा किया था कि हादी हत्याकांड के दो मुख्य आरोपी फैसल करीम मसूद और आलमगीर शेख देश से फरार होकर भारत के मेघालय राज्य में स्थानीय सहयोगियों की मदद से घुस गए हैं। इस बयान पर भारत की एजेंसियों ने कड़ा एतराज जताया था और इसे मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण करार दिया था। अब मसूद के वीडियो संदेश ने बांग्लादेश सरकार के उस दावे को लगभग ध्वस्त कर दिया है।

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मसूद ने स्वीकार किया कि वह गोलीकांड से पहले हादी के दफ्तर गया था, लेकिन उसने ज़ोर देकर कहा कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह पेशेवर थे। उसके अनुसार वह एक आईटी उद्यमी है और पहले वित्त मंत्रालय में काम कर चुका है। वह हादी से नौकरी के सिलसिले में मिलने गया था। मसूद का दावा है कि हादी ने नौकरी दिलाने का वादा किया था और उससे पांच लाख टका अग्रिम के रूप में लिए थे। इसके अलावा, उसने हादी के विभिन्न कार्यक्रमों के लिए आर्थिक मदद भी की थी।


सबसे अहम बात यह है कि मसूद ने हादी की हत्या के लिए जमाती तत्वों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि हादी स्वयं भी उसी वैचारिक धारा की उपज था। उसने आरोप लगाया कि उसके परिवार को झूठे मामले में फंसाकर प्रताड़ित किया जा रहा है।


हम आपको बता दें कि यह वीडियो ऐसे समय सामने आया है जब यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार 30 दिनों के अल्टीमेटम के दबाव में है, जो हादी की मौत के एक दिन बाद इंक़िलाब मंच ने दिया था। इस बीच, बांग्लादेश में यह आरोप भी जोर पकड़ रहे हैं कि हादी की हत्या और उसके बाद भड़की हिंसा, जिसमें हिंदुओं पर हमले शामिल हैं, यह सब एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है, जिसका मकसद फरवरी में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव को प्रभावित करना था।


हम आपको यह भी बता दें कि ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त एसएन मोहम्मद नज़रुल इस्लाम, जिन्होंने मसूद के भारत भागने का दावा किया था, वह अब तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर पाए हैं। उनके बयान को मेघालय की डीजीपी इदाशिशा नोंगरांग ने बेबुनियाद बताया था जबकि भारत की सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने भी साफ कहा था कि न तो सीमा पार करने की कोई घटना पकड़ी गई है और न ही ऐसी कोई रिपोर्ट मिली है।


हम आपको याद दिला दें कि 12 दिसंबर को ढाका में सिर में गोली लगने के बाद 18 दिसंबर को हादी की मौत हो गई थी। वह 2024 के जुलाई विद्रोह का एक प्रमुख चेहरा था। उसकी मौत के बाद बांग्लादेश में हिंसा भड़क उठी थी जिसका खामियाजा एक बार फिर अल्पसंख्यक हिंदुओं को भुगतना पड़ा।


देखा जाये तो यह मामला अब केवल एक हत्या की जांच तक सीमित नहीं रहा। यह बांग्लादेश की उस राजनीति और सोच का प्रतीक बन चुका है, जिसमें हर असफलता, हर साजिश और हर गड़बड़ी का ठीकरा भारत के सिर फोड़ देना सबसे आसान रास्ता माना जाता है। बिना किसी सबूत, बिना चार्जशीट और बिना ज़मीनी सच्चाई की जांच किए यह ऐलान कर देना कि आरोपी भारत भाग गया, केवल गैर-जिम्मेदाराना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय बदनामी अभियान का हिस्सा लगता है।


सवाल यह है कि जब खुद आरोपी सामने आकर कह रहा है कि वह दुबई में है, जब भारत की एजेंसियां और सीमा सुरक्षा बल साफ-साफ इस दावे को खारिज कर चुके हैं, तो बांग्लादेश सरकार किस आधार पर भारत का नाम घसीट रही थी? क्या यह अक्षमता छिपाने की कोशिश थी, या फिर देश के भीतर उबलते असंतोष से ध्यान भटकाने का हथकंड़ा था?


साथ ही हादी की हत्या के बाद जिस तरह हिंसा फैली और हिंदुओं को निशाना बनाया गया, उसने बांग्लादेश की कानून-व्यवस्था और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए। लेकिन उन सवालों का जवाब देने की बजाय, सरकार ने एक पुराना और घिसा-पिटा नुस्खा अपनाया कि भारत को दोषी ठहराओ। देखा जाये तो यह वही पैटर्न है, जो बार-बार दोहराया जाता रहा है। सीमा पार तस्करी हो, कट्टरपंथी हिंसा हो या राजनीतिक उथल-पुथल, हर बार उंगली भारत की ओर कर दी जाती है। यह मानसिकता खतरनाक है। यह न केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि बांग्लादेश के भीतर सच्चाई तक पहुंचने की प्रक्रिया को भी कुंद कर देती है। जब सरकारें दोष बाहर ढूंढ़ने में लग जाती हैं, तब असली गुनहगार भीतर ही सुरक्षित रह जाते हैं।


बहरहाल, फैसल करीम मसूद का बयान इस पूरे नैरेटिव की बखिया उधेड़ देता है। अगर उसके आरोपों में आधा भी सच है, तो सवाल उठता है कि क्या हादी की हत्या वाकई एक आंतरिक सत्ता-संघर्ष का नतीजा थी? क्या जमाती तत्वों और सत्ता के कुछ हिस्सों के बीच चल रही खींचतान ने इस खूनखराबे को जन्म दिया? और अगर ऐसा है, तो क्या भारत को बदनाम करना एक षड्यंत्र था? बांग्लादेश को यह समझना होगा कि हर बार भारत को कटघरे में खड़ा कर देने से न तो उसकी आंतरिक समस्याएं सुलझेंगी, न लोकतंत्र मजबूत होगा। सच्चाई का सामना करने का साहस ही किसी राष्ट्र की परिपक्वता का प्रमाण होता है। वरना इतिहास गवाह है कि झूठ पर टिकी राजनीति आखिरकार अपने ही बोझ से ढह जाती है।

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