डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक होने से ही रुकेगी बैंकों के साथ धोखाधड़ी

By दीपक गिरकर | Jul 31, 2019

आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 45 सी तथा 45 ई के तहत ग्राहकों के कर्ज से जुड़ी सूचना को गोपनीय रखने का प्रावधान है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। अप्रैल, 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में भारतीय रिजर्व बैंक के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि आरबीआई डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई को निर्देशित किया था कि वह डिफॉल्टर्स के नाम और उनकी सूचना सार्वजनिक नहीं करने के प्रावधानों को निरस्त करे। इसके पूर्व भी वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह का आदेश दिया था कि बैंकों के कर्ज नहीं लौटाने वाले डिफॉल्टर्स के नाम छिपाने वाले प्रावधानों को हटाएँ।

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रिजर्व बैंक ने देश में ऋण लेने वाले सभी व्यक्तियों, इकाइयों का ब्योरा एक जगह उपलब्ध कराने के लिए डिजिटल सार्वजनिक साख पंजिका (पीसीआर) स्थापित करने का कदम उठाया है। इसमें जानबूझकर कर्ज़ नहीं लौटाने वालों के नाम और कर्ज़ चुकाने में अनियमितताओं से संबंधित लंबित क़ानूनी मामलों की जानकारी रखी जाएगी। इस कदम का मकसद बाजार में कर्ज़ की धांधली रोकना है। पीसीआर में सेबी, माल एवं सेवा कर नेट वर्क (जीएसटीएन) तथा इनसोल्वेंसी एवं बैंकरप्सी बोर्ड (आईबीसी) से प्राप्त सूचनाएँ भी शामिल की जाएंगी, जिससे बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को कर्ज़दारों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त हो सके। अभी तक जांच एजेंसियां आर्थिक अपराध और बैंक धोखाधड़ी के मामलों में समय-समय पर बैंकों से जानाकरियां लेती रही हैं, लेकिन अपनी जानकारी बैंकों के साथ साझा नहीं करती थीं। सरकार ने अब सभी जांच एजेंसियों को दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं कि वे आर्थिक अपराध और बैंक घोटाले रोकने के लिए बैंकों के साथ अपनी जानकारियां साझा करें। जांच एजेंसियों और बैंकों के बीच जानकारियां साझा होने से बैंक उन व्यक्तियों के खिलाफ सावधान हो जाएँगे जिनके खिलाफ आर्थिक अपराध और धोखाधड़ी करने के आरोप लगे हैं।

बैंक बहुत बार ऐसे लोगों को ऋण दे देता है जिनके ऋण खाते किसी अन्य बैंक में अनियमित हैं। चूककर्ताओं के नाम सार्वजनिक नहीं होने से पुराना चूककर्त्ता ऋणी नये नाम से या तो उसी बैंक की अन्य शाखा से से या दूसरी बैंक से ऋण प्राप्त करने में सफल हो जाता है। चूककर्त्ता ऋणी अपनी सहायक कंपनियों (सिस्टर कन्सर्न) के नाम से लोन लेने में सफलता प्राप्त कर लेता है। बैंक एनपीए खातों की सूची और न्यायालय में लगे हुए मुक़दमों के प्रकरणों की सूची सीआईसी (क्रेडिट इन्फॉर्मेशन कंपनीज) अर्थात सिबिल, इक्विफेक्स क्रेडिट इन्फॉर्मेशन सर्विसेस, एक्सपेरियन क्रेडिट इन्फॉर्मेशन कंपनी, सीआरआईएफ हाई मार्क क्रेडिट इन्फॉर्मेशन सर्विसेस को समय पर नहीं देती है जिसके कारण अन्य बैंक ऐसे खराब खातों के ऋणी को वित्त सुविधाएं प्रदान कर देते हैं और कुछ ही समय में ऐसे नये ऋण खाते उस अन्य बैंक में भी एनपीए में तब्दील हो जाते हैं। इस प्रकार बैंक उद्योग में एनपीए दिनों-दिन बढ़ता जाता है।

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एक ही व्यक्ति अलग-अलग बैंकों से कई बार आसानी से कर्ज ले लेता है। बैंक एक दूसरे से संपर्क में नहीं रहते हैं। बैंक का अन्य वित्तीय संस्थाओं से समन्वय नहीं रहता है और तो और बैंकों में आपस में ही समन्वय नहीं रहता है, इसी कारण जानबूझकर चूक करने वाले ऋणी इसका फ़ायदा उठाकर बैंकों को बहुत बड़ा चूना लगा देते हैं। अधिक बैंक होने से बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा का फ़ायदा चूककर्ता ऋणी आसानी से उठा लेते हैं। वे एक बैंक के अपने अनियमित खातों को नियमित करने के लिए दूसरे बैंक से अपनी नई फर्जी कंपनी बनाकर ऋण लेते हैं और फिर दूसरे बैंक के ऋण खातों को ठीक करने के लिए तीसरे बैंक से एक और नई फर्जी कंपनी बनाकर ऋण लेते हैं। इस प्रकार ऐसे चूककर्ता ऋणी कई सालों तक इस प्रकार की फर्जी कंपनियां खड़ी करके कई बैंकों को चूना लगाते रहते हैं और जब किसी कारण से इनकी और ऋण लेने की चेन टूट जाती है तो इनका भांडा फूट जाता है।

1994 में रिजर्व बैंक ने बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और गैर वित्तीय कंपनियों की निगरानी और नियंत्रण के लिए बोर्ड ऑफ फ़ाइनैन्शियल इंस्टीट्यूशंस (बीएफआई) का गठन किया था। रिजर्व बैंक ने बड़े ऋण से संबंधित सूचनाओं के लिए एक सीआरआईएलसी का भी गठन किया था जिसमें बड़े कर्ज़ पर जानकारी प्राप्त करके उन पर वित्तीय एवं जोखिम आधारित निगरानी रखी जा सके और बैंकों को उन बड़े खातों के संबंध में उचित दिशा-निर्देश दिए जा सकें। केंद्रीय बैंक को लोन डिफॉल्टर्स और एनपीए की जानकारी सभी नियामक एजेंसियों और जांच एजेंसियों के साथ साझा करनी चाहिए लेकिन आरबीआई ने लोन डिफॉल्टर्स और एनपीए की जानकारी को न तो सेबी के साथ और न ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सेंट्रल विजिलेंस कमीशन के साथ साझा की हैं। अन्य मुद्दों (लोन डिफॉल्टर्स और एनपीए खातों के चूककर्ताओं को छोड़कर) पर तो आरबीआई और सेबी के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बड़े पैमाने पर होता हैं। जानबूझकर ऋण न चुकाने के कितने भयंकर दुष्परिणाम होते हैं, यह डर विलफुल डिफॉल्टर्स के दिमाग़ में बैठाना होगा। विलफुल डिफॉल्टर्स के खिलाफ कठोर कार्रवाई की ज़रूरत है। बैंकों द्वारा इरादतन चूककर्ताओं के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवाने में देरी नहीं करनी चाहिए।

बैंकों में जमाकर्ताओं और ऋणियों को ही ग्राहक मानना चाहिए, चूककर्ताओं और डिफॉल्टर्स को नहीं। डिफॉल्टर्स अन्य बैंकों में खाते खोलकर ऋण राशि का डाइवर्जन कर देते हैं। कुछ ऋणी कंपनियां निधियों का डाइवर्जन करके सहयोगी संस्थाओं को सहयोग करके उनको उभार लेती हैं। बड़े डिफॉल्टर्स अपने पुराने खराब खातों को नियमित करने के लिए बैंकों से नये ऋण लेते रहते हैं। प्रवर्तक कर्ज़ की राशि का एक बड़ा हिस्सा सहायक कंपनियों / समूह कंपनियों में स्थानांतरित कर देते हैं। प्रवर्तक फर्जी कंपनियों द्वारा ऋण राशि का अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग कर लेते हैं। जानबूझकर कर्ज़ नहीं लौटाने के मामले कारोबार की असफलता से कहीं अधिक हैं। कुछ उधारकर्ताओं का इरादा कपटी होता है, वे जानबूझकर चूक करते हैं। ऐसे ऋणी समर्थ होते हुए भी कर्ज़ नहीं चुकाते हैं। कंपनी परियोजना के लिए जो अनसेक्योर्ड लोन लाई थी उसे परियोजना के पूर्ण होने के पूर्व ही निकाल लेती है। क्या इसके बावजूद भी चूककर्ताओं को ग्राहक मानना चाहिए? ऐसे ऋणी जो लेनदेन में धोखेबाजी करते हैं, बिना बैंक को जानकारी दिए प्रतिभूतियों का निपटान कर देते हैं या प्रतिभूतियों को अन्य जगह शिफ्ट कर देते हैं, जिन आस्तियों के लिए बैंक ने वित्त पोषण किया था या तो वे उसे खरीदते ही नहीं हैं या उन्हें बेच देते हैं और बिक्री से प्राप्त राशि का दुरुपयोग कर देते हैं। क्या ऐसे विलफुल डिफॉल्टर्स को बैंकों ने ग्राहक मानना चाहिए? डिफॉल्टर को डिफॉल्टर ही कहा जाना चाहिए न की ग्राहक। 

आरबीआई को सभी नियामकों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। रिजर्व बैंक को संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र सरकार के अधीन रखा गया है। भारत में संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था रिजर्व बैंक के नियमन, नियंत्रण एवं दिशा-निर्देश के अनुसार संचालित होती है। नियामक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। बैंकों में फंसे कर्ज की समस्या को दूर करने के लिए वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच निरंतर संवाद ज़रूरी है। बैंकों को चूककर्ताओं की सूची और जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वालों की सूची सभी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, नियामक संस्थाओं, एन्फोर्समेंट एजेंसियों और जनता के साथ साझा करनी चाहिए। बैंकों को डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने चाहिए। अब समय आ गया है कि सरकार को आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 45 सी तथा 45 ई में संशोधन करने हेतु कदम उठाने चाहिए। आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 45 सी तथा 45 ई में संशोधन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि बैंक अपने चूककर्ताओं के नाम सार्वजनिक कर सकें और सभी वित्तीय संस्थाओं, नियामक संस्थाओं, एन्फोर्समेंट एजेंसियों और जनता के साथ भी साझा करें। डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक होने से एक ओर वे अन्य वित्तीय संस्थाओं से ऋण नहीं ले पायेंगे और दूसरी ओर उन पर सामाजिक दबाव भी बनेगा। 

-दीपक गिरकर

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