By अंकित सिंह | Aug 18, 2026
मंगलवार को माओवादी हिंसा के कई पीड़ितों ने कांग्रेस के सीनियर नेता पी चिदंबरम के दिमागी नक्सल होने पर गर्व है वाले बयान की निंदा की। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ फ़ॉलोअर्स बढ़ाने या किसी तरह का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए। बस्तर शांति समिति की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में माओवादी हिंसा के शिकार रुद्रेश सिंह ने पत्रकारों से कहा कि सालों से नक्सली हिंसा में सैकड़ों लोगों की जान गई है। नक्सली हिंसा की अलग-अलग घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों ने अपने शरीर के अंग गंवा दिए हैं और किसी तरह अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। यह कोई मज़ाक नहीं है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए नक्सल हिंसा के कई अन्य पीड़ितों ने भी चिदंबरम के बयान की कड़ी आलोचना की और कहा कि हम उनकी टिप्पणी से बहुत आहत हैं। रविवार को चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'दिमागी नक्सल' वाले बयान पर तंज कसते हुए कहा था, "मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।" चिदंबरम का प्रधानमंत्री पर यह तंज मोदी की उस चेतावनी के एक दिन बाद आया, जिसमें उन्होंने देश को 'दिमागी नक्सलियों' के बारे में आगाह किया था। मोदी ने कहा था कि ये लोग सिस्टम में घुस गए हैं और नीतियों में हेर-फेर करके समाज के लिए खतरा बने हुए हैं। मोदी ने नागरिकों से उन्हें पहचानने और अलग-थलग करने की अपील की थी।
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में नक्सली हिंसा के एक और पीड़ित सियाराम रामटेके ने चिदंबरम की टिप्पणी की आलोचना की और उनके इरादे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा? हम यहां इसलिए आए हैं क्योंकि हम उनकी टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर सके। जब पूर्व गृह मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता होते हुए वे ऐसा बयान दे रहे हैं, तो हमारे साथ कौन खड़ा होगा? रामटेके ने कहा कि हम बच गए हैं और किसी तरह जी रहे हैं। हम 'दिमागी नक्सलियों' से कहना चाहते हैं कि हमें उसी दिशा में वापस नहीं जाना चाहिए। हमें शांति के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। बस्तर विकास चाहता है। सभी को इसका समर्थन करना चाहिए।
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