By प्रज्ञा पांडेय | Sep 11, 2026
आज भाद्रपद अमावस्या है, हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का खास महत्व है। भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी (कुशोत्पाटिनी) अमावस्या और पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है। यह अमावस्या पितरों के तर्पण और संतान की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि के लिए समर्पित है तो आइए हम आपको भाद्रपद अमावस्या तिथि का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
अमावस्या की शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीया लगाने, पितरों का स्मरण, शिव जी और शनि देव की आराधना करने से जीवन में चारों तरफ लाभ मिलता है। इस वर्ष भाद्रपद अमावस्या की तिथि 11 सितंबर को है। भाद्रपद अमावस्या को स्नान और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है एवं पाप मिटते हैं। इस दिन नाराज पितरों को खुश करने और पितृ दोष की शांति के उपाय किए जाते हैं।
पंडितों के अनुसार 11 सितंबर को भाद्रपद अमावस्या के दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सकते हैं क्योंकि यह नहाने का सबसे उत्तम समय होता है। भाद्रपद अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त 04:32 से 05:18 तक है। जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में स्नान न कर पाएं, वे सूर्योदय के बाद भी स्नान कर सकते हैं। उसके बाद अपनी क्षमता के अुनसार दान करें।
भाद्रपद अमावस्या को स्नान करने के बाद आप किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को कपड़े का दान कर सकते है। इसके अलावा चावल, गेहूं, दाल, हरी सब्जियां, फल, अनाज, गुड़, बर्तन, छाता आदि का दान कर सकते हैं। दान के साथ कुछ पैसे भी दे सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद अमावस्या पर सुबह स्नान के बाद पितरों का ध्यान करें और उनके निमित्त तर्पण करें। अन्न-वस्त्र का दान कर जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। इसके अलावा गाय, कौआ, कुत्ता और अन्य जीवों को भी भोजन कराएं।
ज्योतिषीय दृष्टि से पितृ दोष होने पर व्यक्ति को करियर में बार-बार बाधा, आर्थिक अस्थिरता, पारिवारिक तनाव, संतान संबंधी चिंता या काम में अनावश्यक रुकावट जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
पंडितों के अनुसार भाद्रपद अमावस्या के दिन पितरों के नाम पर किए जाने वाले कर्म श्रद्धा और नियमपूर्वक करने चाहिए। दिखावे के लिए पूजा-पाठ करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार तर्पण, दान और भोजन कराएं। इस दिन किसी का अपमान करना, झूठ बोलना, क्रोध करना या जानबूझकर किसी को कष्ट पहुंचाने की गलती न करें।
अमावस्या के दिन स्नान के बाद पितरों का स्मरण कर जल, काले तिल और कुश से तर्पण करें। घर में पितरों का स्मरण करते हुए ॐ पितृभ्यः नमः मंत्र का जाप कर सकते हैं। परिवार की ओर से जाने-अनजाने हुई भूल के लिए पितरों से क्षमा प्रार्थना करें। इस दिन क्रोध, झूठ, अपमान और किसी जरूरतमंद को खाली हाथ लौटाने से बचें।
हिंदू परंपरा में पितरों को परिवार की वंश परंपरा का आधार माना गया है इसलिए अमावस्या जैसे अवसरों पर पूर्वजों का स्मरण केवल दोष दूर करने के लिए नहीं, बल्कि उनके प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा भी है। पूर्वजों का आशीर्वाद हो तो परिवारजन पर कष्ट नहीं आते।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक गांव में सात भाई रहते थे। उनके साथ उनकी सात पत्नियां भी रहती थीं जो हर साल भाद्रपद अमावस्या पर पिठोरी व्रत करती थीं। सबसे बड़े भाई की पत्नी ने जब पहली बार यह व्रत किया, तो उसके नवजात शिशु की मृत्यु हो गई। इसके बाद क्रमानुसार दूसरे, तीसरे और इसी तरह छह भाइयों की पत्नियों ने जब-जब यह व्रत किया, तो उनके यहां भी संतानों की अकाल मृत्यु जैसी घटनाएं होने लगीं। केवल सबसे छोटे (सातवें) भाई की पत्नी ने जब व्रत किया, तो उसके बच्चे सुरक्षित रहे। दुखी होकर उन छह बहुओं ने अपनी छोटी देवरानी से इसका कारण पूछा। छोटी बहू ने बताया कि माता पार्वती और षष्ठी देवी की सच्चे मन से पूजा न करने और विधि में त्रुटि होने के कारण ऐसा हुआ है। तब सभी बहुओं ने अपनी भूल का पश्चाताप किया और माता पार्वती (पिठोरी माता) की विधि-विधान से आटे की मूर्तियां बनाकर क्षमा-प्रार्थना के साथ दोबारा व्रत और पूजन किया। माता की कृपा से सभी के मरे हुए बच्चे जीवित हो गए और उनके घरों में खुशहाली लौट आई।
शास्त्रों के अनुसार पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अमावस्या के दिन पूजा-अर्चना करने के बाद मंदिर में या जरूरतमंदों को पितरों का ध्यान करते हुए अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल और छाते का दान करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस उपाय को करने से पितृ दोष की समस्या दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा रोजाना पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को नियमित रूप से करने से जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होती है। पितरों के तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के दौरान पितृ मंत्रों और पितृ चालीसा का पाठ करें। इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों पर अपनी कृपा बरसाते हैं।
- प्रज्ञा पाण्डेय