By नीरज कुमार दुबे | Sep 11, 2026
दिल्ली इस समय दुनिया की कूटनीति का नया केंद्र बन गई है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए एक के बाद एक दुनिया के प्रमुख नेता भारत पहुंच रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय मुलाकातों का लंबा सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि भारत की वैश्विक भूमिका अब कितनी तेजी से बढ़ रही है। रूस से लेकर चीन, ईरान से लेकर खाड़ी देशों और अफ्रीका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक, इन मुलाकातों के जरिए भारत एक साथ कई मोर्चों पर अपने रिश्तों को मजबूत कर रहा है। यह केवल नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती ताकत, उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और अपनी शर्तों पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति का स्पष्ट संकेत है।
इसके बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकातें होंगी। ईरान के साथ संवाद पश्चिम एशिया में भारत के हितों, ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह जैसे संपर्क-साधनों के लिहाज से अहम है। वहीं गुटेरेस के साथ बातचीत यह संकेत देती है कि भारत वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने के सवाल पर अपनी भूमिका को और मुखर करना चाहता है।
12 सितंबर का कार्यक्रम भारत की ‘एक साथ कई मोर्चों पर साझेदारी’ वाली रणनीति को स्पष्ट करता है। इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबीय अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के प्रधानमंत्री ले मिन्ह हंग के साथ बैठकें भारत के लिए अफ्रीका, आसियान, खाड़ी और हिंद-प्रशांत, चारों दिशाओं में अपनी पहुंच मजबूत करने का अवसर हैं। खासकर वियतनाम और मलेशिया के साथ संबंध हिंद-प्रशांत में भारत की सक्रियता तथा समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। इसी दिन राष्ट्रपति पेजेशकियन की राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति से मुलाकात भी भारत-ईरान संबंधों की व्यापकता को रेखांकित करती है। लेकिन सबसे अधिक निगाहें शाम को होने वाली प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर रहेंगी। भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच शीर्ष स्तर की बातचीत यह संदेश देती है कि भारत प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहता। यह ‘प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व और संवाद’ वाली व्यावहारिक कूटनीति का संकेत है।
13 सितंबर को कजाखस्तान, फिलीपींस, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं के साथ बातचीत इस रणनीति को और व्यापक बनाती है। कजाखस्तान भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, फिलीपींस हिंद-प्रशांत में समुद्री साझेदारी की दृष्टि से अहम है, जबकि मिस्र स्वेज नहर और पश्चिम एशिया-अफ्रीका के बीच भारत की कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ संवाद भारत-अफ्रीका साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लिहाज से विशेष महत्व रखता है।
बुरुंडी, नाइजीरिया और युगांडा के शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकातें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ये बैठकें बताती हैं कि भारत अफ्रीका को केवल व्यापारिक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है।
देखा जाये तो इन द्विपक्षीय बैठकों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत किसी एक शक्ति-गुट के साथ खड़े होने के बजाय सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को संतुलित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। रूस से रक्षा और ऊर्जा, ईरान से कनेक्टिविटी, खाड़ी से निवेश और ऊर्जा, चीन से संवाद, आसियान से हिंद-प्रशांत सहयोग और अफ्रीका से ग्लोबल साउथ की साझेदारी, इन सभी को एक साथ साधने की कोशिश दिखाई देती है।
यही भारत की सामरिक स्वायत्तता का नया रूप है। दिल्ली में होने वाली ये मुलाकातें दुनिया को यह संदेश देंगी कि भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का सहभागी नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और दिशा को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है।
-नीरज कुमार दुबे