अमेठी की जंग: राजीव बनाम मेनका से राहुल बनाम स्मृति तक

By अभिनय आकाश | May 06, 2019

लोकसभा 2019 के चरण धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं और 23 मई को चुनाव के परिणाम आने हैं। देश को आठ प्रधानमंत्री देने वाले प्रदेश की रानीति पर भी सभी की निगाहें टिकी है।  यूपी की हाई प्रोफ़ाइल सीटों में से एक अमेठी सीट जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मुकाबले भाजपा की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से है। उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट 'गांधी परिवार' का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। पहले संजय गांधी और उनके निधन के बाद राजीव गांधी ने लोकसभा में अमेठी की नुमाइंदगी की। वहीं, 1999 में सोनिया गांधी भी यहां से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचीं। साल 2004 में कांग्रेस ने राहुल गांधी को अमेठी से मैदान में उतारा और उन्होंने जीत हासिल की। फिर 2009 और 2014 में भी वह यहां से सांसद चुने गए। 

साल 1984 दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद हुए चुनाव में जहां पूरे देश में कांग्रेस के लिए सहानभूति की लहर थी वहीं ये चुनाव एक ऐतिहासिक मुकाबले का साक्षी भी बना था। इस चुनाव में राजीव गांधी और मेनका गांधी के बीच अमेठी में मुकाबला हुआ था। यह पहली बार था जब गांधी परिवार के दो करीबी सदस्य आपस में टकरा रहे थे। अमेठी से कभी मेनका गांधी के पति संजय गांधी सांसद हुआ करते थे और उन्होंने काफी काम भी किया था। इसलिए मेनका को उम्मीद थी कि अमेठी की जनता उन्हें ही चुनेगी। दूसरी ओर इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बात चुनाव हो रहे थे और राजीव गांधी  मैदान में थे। लेकिन अमेठी की जनता ने राजीव गांधी को ही इस इस क्षेत्र की निगेहबानी का जिम्मा सौंपा। गौरतलब है कि अमेठी सीट का इतिहास रहा है कि एक-दो मौके को छोड़ कर इस पर गांधी परिवार या उनके करीबियों का ही कब्जा रहा है और एक से एक रोचक मुकाबले होते रहे हैं।

इतिहास को छोड़ वर्तमान की ऊँगली थाम अगर अमेठी के रण को देखें तो केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के इस मजबूत किले पर कब्जा जमाने के लिए भरसक प्रयास कर रही है। पिछली बार की पराजय के बाद भी भाजपा ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी राहुल गांधी से मुकाबले के लिए एक बार फिर मैदान में डटी हैं। 2014 में भले ही स्मृति ईरानी को अमेठी में हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वह लगातार यहां सक्रिय रही हैं और पार्टी की जमीन मजबूत करती रही हैं। जिसका नतीजा भी दिख रहा है। स्मृति ईरानी के नामांकन में अच्छी खासी भीड़ देखने को मिली। इससे कांग्रेस का चिंतित होना स्वभाविक है, लेकिन इस बार अमेठी में सपा और बसपा ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है। जिससे कांग्रेस को एक तरीके से 'वॉक ओवर' मिल गया है।

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अमेठी का जातीय समीकरण

अमेठी लोकसभा सीट पर दलित और मुस्लिम मतदाता किंगमेकर की भूमिका में हैं। इस सीट पर मुस्लिम मतदाता करीब 4 लाख के करीब हैं और तकरीबन साढ़े तीन लाख वोटर दलित हैं। इनमें पासी समुदाय के वोटर काफी अच्छे हैं। इसके अलावा यादव, राजपूत और ब्राह्मण भी इस सीट पर अच्छे खासे हैं। वहीं अगर 2017 के विधानसभा चुनाव को देखें तो अमेठी लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटों तिलोई, जगदीशपुर, अमेठी, गौरीगंज और सलोन विधानसभा सीट में से 4 सीटों पर भाजपा और महज एक सीट पर सपा को जीत मिली थी।

सपा-बसपा ने इस सीट पर कांग्रेस से निभाई दोस्ती

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी वैसे तो कांग्रेस पर प्रहार करती रहती है लेकिन अमेठी और रायबरेली सीट पर कांग्रेस को परोक्ष रूप से समर्थन देते हुए अपना उम्मीवार नहीं उतारा है। आंकड़ों पर गौर करें तो अमेठी में सपा के मुकाबले बसपा ज्यादा मजबूत नजर आती है और पिछले चुनावों तक यहां से प्रत्याशी उतारती रही है। 2014 में अमेठी से बसपा के उम्मीदवार को 50 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। जबकि 2009 और 2004 में एक लाख के आसपास। वहीं, सपा ने आखिरी बार 1999 में इस सीट से अपना उम्मीदवार उतारा था, जिसे मात्र 16 हजार के आसपास वोट ही मिले थे। इससे पहले 1998 में सपा के प्रत्याशी को 30 हजार के आसपास और 1996 में 80 हजार के करीब वोट मिले थे।

2014 के लोकसभा चुनाव को देखें तो राहुल गांधी को जहां 4 लाख 08 हज़ार 651 वोट मिले थे, वहीं भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और 3 लाख 748 वोट हासिल किये। पिछले बार के आंकड़े बताते हैं कि इस बार अमेठी में राहुल गांधी की राह आसान नहीं है, लेकिन पार्टी के लिए संतोषजनक बात यह है कि सपा-बसपा का प्रत्याशी न होने की वजह से उसका पलड़ा कुछ हद तक ठीक है।

- अभिनय आकाश

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