Matrubhoomi: भीकाजी कामा: विदेशी धरती पर पहली बार भारत का झंडा फहराने वाली बहादुर महिला की कहानी

By अभिनय आकाश | Apr 02, 2022

देश की राजधानी दिल्ली का भीकाजी कामाप्लेस वैसे तो दिल्ली का हर शख्स नाम से परिचित है। आजादी के 75वें वर्ष में आज आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर इस जगह के साथ क्यों भीखाजी का नाम जुड़ गया। भारत की आजादी में उनका किस तरह से योगदान रहा है की हर हिंदुस्तानी उन्हें आज भी याद करता है। दरअसल, इस जगह का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी ऐसी स्वतंत्र विचरों वाली महिला के नाम पर रखा गया जिन्होंने लंदन, जर्मनी और अमेरिका जाकर भारत की आजादी की अलख जगाई और ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया। ये इस अदम्य महिला की आकर्षक कहानी है जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभिक वर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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1896 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी में बुबोनिक प्लेग फैल गया और भीकाजी ने तुरंत स्वेच्छा से प्लेग पीड़ितों को बचाने के लिए काम में अपनी टीम के साथ जुट गईं। बंबई में सैकड़ों लोग मर रहे थे और भीकाजी ने भी इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ गईं। हालांकि बाद में वो ठीक हो गई, लेकिन बीमारी ने उनके स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला। उन्हें आराम और स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई और 1902 में, भीकाजी भारत से लंदन चली गईं, जो जीवन भर के लिए उनका घर बनने वाला था। अपने प्रवास के दौरान कामा की मुलाकात दादाभाई नौरोजी से हुई, जो भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति के एक मजबूत आलोचक थे। बाद में भीकाजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए काम करना शुरू कर दिया। कामा लाला हरदयाल और श्यामजी कृष्णवर्मा सहित अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों के संपर्क में भी आईं और लंदन के हाइड पार्क में कई सभाओं को भी संबोधित किया।

भीकाजी रूस्तम कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में अगस्त 1907 में हुई 7वीं अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में देश का झंडा फहराया था। 21 अगस्त, 1907 को जर्मनी के एक शहर स्टटगार्ट में एक अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन आयोजित किया जा रहा था। सम्मेलन में भाग लेने के लिए दुनिया भर से एक हजार प्रतिनिधि आए थे। इसी अवसर पर भीकाजी रुस्तम कामा ने हरे, केसरिया और लाल धारियों वाला भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का पहला संस्करण फहराया दिया। उन्होंने तिरंगा फहराते हुए कहा- यह स्वतंत्र भारत का झंडा है। मैं सभी सज्जनों से अपील करता हूं कि खड़े होकर ध्वज को सलामी दें।

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इस नाटकीय घटना से चकित होकर सम्मेलन में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों अपने स्थान उठ खड़े होते हैं और स्वतंत्र हिन्दुस्तान के पहले झंडे को सलामी देते हैं। मैडम कामा ब्रिटिश राज के तहत देश को मिले गरीबी, भुखमरी और उत्पीड़न को समाप्त करना चाहती थीं साथ ही भारत की आजादी की प्यास को भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ध्यान में लाना चाहती थी और जिसमें वो काफी हद तक सफल रही थी। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। भारत अपनी स्वतंत्रता से 40 साल दूर खड़ा था। दुनिया अभी भी उन हजारों युवा भारतीयों की ज्वलंत देशभक्ति से अनजान थी जो अपने देश को औपनिवेशिक शासन से मुक्त करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार खड़े थे।  इसके अलावा उस समय अंग्रेज क्रांतिकारियों को अध्यादेश लाकर, प्रतिबंध करके और आजीवन कारावास की सजा देकर दंडित करने की पूरी कोशिश कर रहे थे। मैडम कामा की अपने देश के लिए लड़ाई ब्रिटिश राज के लिए देशद्रोह थी और अगर उन्होंने उसे पकड़ लिया होता, तो उसे अंडमान की खतरनाक काला पानी जेल भेज दिया जाता। 

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स्टटगार्ट के बाद भीकाजी संयुक्त राज्य अमेरिका गईं, जहां उन्होंने अमेरिकियों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में बताया। उन्होंने महिलाओं के लिए भी लड़ाई लड़ी और अक्सर राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका पर जोर दिया। 1910 में मिस्र के काहिरा में राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने पूछा, “मिस्र का दूसरा आधा भाग कहाँ है? मैं केवल ऐसे पुरुष देख रही हूं जो आधे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं! माताएँ कहाँ हैं? बहनें कहाँ हैं? 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा तो भीकाजी ने ब्रिटिश विरोधी रुख अपनाया। तीस साल से ज़्यादा तक भीकाजी कामा ने यूरोप और अमरीका में भाषणों और क्रांतिकारी लेखों के ज़रिए अपने देश के आज़ादी के हक़ की मांग बुलंद की। हले विश्व युद्ध के दौरान वो दो बार हिरासत में ली गईं और उनके लिए भारत लौटना बेहद मुश्किल हो गया था। राष्ट्रवादी काम छोड़ने की शर्त पर आखिरकार 1935 में उन्हें वतन लौटने की इजाज़त मिली। मैडम कामा इस व़क्त तक बहुत बीमार हो चुकी थीं और बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते 1936 में उनकी मौत हो गई।

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