Telecom Sector को बड़ी राहत! Bombay High Court ने Airtel-Vi का अतिरिक्त Spectrum शुल्क किया रद्द

By Ankit Jaiswal | Jun 08, 2026

टेलीकॉम क्षेत्र की दो बड़ी कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए बंबई उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के उन फैसलों को रद्द कर दिया है, जिनके तहत उनसे अतिरिक्त स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के रूप में बड़ी रकम वसूलने की कोशिश की जा रही थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस विवाद से जुड़े मामलों में कंपनियों द्वारा जमा कराई गई बैंक गारंटी को अब आगे जारी रखने की आवश्यकता नहीं है।

बता दें कि यह मामला वर्ष 2008 से 2012 के बीच दूरसंचार कंपनियों को आवंटित अतिरिक्त स्पेक्ट्रम से जुड़ा हुआ था। केंद्र सरकार ने बाद में वर्ष 2012 में हुए स्पेक्ट्रम आवंटन की ऊंची दरों को आधार बनाकर पूर्व अवधि के लिए भी अतिरिक्त शुल्क लगाने का फैसला किया था। इसी आधार पर भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया को मांग नोटिस जारी किए गए थे।

मौजूद जानकारी के अनुसार न्यायमूर्ति मनीष एम पितले और न्यायमूर्ति श्रीराम वी शिरसाट की खंडपीठ ने दोनों कंपनियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा पूर्व प्रभाव से अतिरिक्त शुल्क लगाने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया जा सका है।

सुनवाई के दौरान भारती एयरटेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और डेरियस खंबाटा ने पक्ष रखा, जबकि वोडाफोन आइडिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अस्पी चिनॉय पेश हुए थे। कंपनियों का तर्क था कि भारतीय तार अधिनियम या लाइसेंस समझौतों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत सरकार पूर्व प्रभाव से इस प्रकार का अतिरिक्त शुल्क लगा सके। इसलिए यह मांग कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने नवंबर और दिसंबर 2012 में मंत्रिमंडल स्तर पर दो महत्वपूर्ण फैसले लिए थे। इन्हीं फैसलों के आधार पर दूरसंचार विभाग ने कंपनियों को अतिरिक्त भुगतान के नोटिस जारी किए थे। हालांकि अदालत ने अब इन दोनों मंत्रिमंडलीय निर्णयों और उनसे जुड़े सभी मांग नोटिसों को रद्द कर दिया है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकार भारतीय टेलीग्राम अधिनियम की धारा 4 के तहत अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी वित्तीय बोझ नहीं डाल सकती है। न्यायालय के अनुसार किसी भी कार्रवाई के लिए स्पष्ट कानूनी अधिकार और कॉन्ट्रैक्चुअल आधार होना आवश्यक है।

बता दें कि अदालत ने लाइसेंस समझौतों की भी विस्तार से समीक्षा की है। इसके बाद न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सरकार सार्वजनिक हित का हवाला देकर समझौते की शर्तों से अलग नहीं जा सकती है और न ही बाद में नई वित्तीय जिम्मेदारियां जोड़ सकती है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 1999 का मूल उद्देश्य दूरसंचार सेवाओं को आम लोगों तक सुलभ और किफायती बनाना था। इसका उद्देश्य केवल अधिकतम राजस्व जुटाना नहीं था। ऐसे में सार्वजनिक हित की व्याख्या प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर की जानी चाहिए।

मौजूद जानकारी के अनुसार अदालत ने यह भी पाया कि अतिरिक्त शुल्क लगाने से पहले लाइसेंस समझौतों में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया था। न ही ऐसा कोई नया समझौता हुआ था जो पुराने अनुबंध का स्थान लेता। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने एकतरफा तरीके से अतिरिक्त शुल्क लागू कर दिया था।

इस फैसले को दूरसंचार क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में सरकारी नीतियों और लाइसेंस संबंधी विवादों में कॉन्ट्रैक्चुअल शर्तों तथा कानूनी अधिकारों की भूमिका और अधिक स्पष्ट हो सकती है।

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