राहुल गांधी के 'मिशन बिहार' को बड़ा झटका- अब कांग्रेस क्या करेगी?

By संतोष कुमार पाठक | Jun 19, 2025

कांग्रेस पार्टी को देशभर में मजबूत बनाने के अभियान में जुटे राहुल गांधी पिछले कुछ महीनों से लगातार बिहार का दौरा कर रहे हैं। वर्ष 2025 में वह अब तक कुल मिलाकर पांच बार बिहार का दौरा कर चुके हैं। अपने इन दौरे के दौरान कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ने बिहार के दलित मतदाताओं, अन्य पिछड़ी जाति के लोगों और अत्यंत पिछड़ी जाति के लोगों के साथ-साथ युवाओं और महिलाओं के साथ संवाद कर,उन्हें साधने की कोशिश की। पार्टी संगठन को धार और नई रफ्तार देने के लिए उन्होंने प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष से लेकर जिला अध्यक्षों तक को बदल दिया। 

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लेकिन राहुल गांधी के इस 'मिशन बिहार' को उनके अपने ही सहयोगी दल राष्ट्रीय जनता दल ने बड़ा झटका दे दिया है। लालू यादव के फॉर्मूले ने कांग्रेस पार्टी को बेचैन कर दिया है। कांग्रेस 2020 की तरह इस बार भी 70 विधानसभा सीटों पर ही चुनाव लड़ना चाहती है लेकिन राजद ने इतनी सीटें देने से साफ-साफ इनकार कर दिया है। यानी अब यह तय हो गया है कि विपक्षी महागठबंधन में कांग्रेस को इस बार 2020 की तरह 70 सीटें नहीं मिलेगी। गठबंधन और सीटों को लेकर होने वाली बैठकों की अध्यक्षता भले ही तेजस्वी यादव कर रहे हो लेकिन पर्दे के पीछे से सब कुछ लालू यादव ही तय कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, राजद ने यह साफ कर दिया है कि राजनीतिक दलों की संख्या और क्षमता के आधार पर गठबंधन में कांग्रेस को लगभग 53 सीटें ही मिल सकती है। 

बिहार में वर्ष 2020 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के सबसे बड़े दल के तौर पर राजद 144 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। जबकि कांग्रेस के खाते में 70 सीटें आई थी। सीपीआई-माले 19, सीपीआई 6 और सीपीएम 4 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ी थी। पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने वाले मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी भी इस बार विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है। एक तरफ जहां मुकेश सहनी की पार्टी को सीट बंटवारे में एडजस्ट करने की चुनौती है वहीं लेफ्ट फ्रंट के दल खासकर सीपीआई-माले सीट बढ़ाने की मांग को लेकर अड़  गया है। ऐसे में लालू यादव भी अपनी पार्टी के कोटे को घटाने पर तैयार हो गए हैं। लेकिन वो किसी भी कीमत पर 140 से कम पर जाने को तैयार नहीं है।

सूत्रों के मुताबिक, तेजस्वी यादव ने कांग्रेस के सामने जो पहला फॉर्मूला रखा है उसके तहत आरजेडी 144 की बजाय 140 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। पिछली बार की तरह ही इस बार भी सीपीआई को 6 और सीपीएम को 4 सीटें ही दी जाएगी। लेकिन सीपीआई-माले को 6 सीटें बढ़ाकर 25 सीटें दी जा सकती है। मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी को 15 सीटों पर लड़ाया जाएगा। वहीं पिछली बार 70 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस को इस बार 53 सीटों के आसपास ही संतोष करना पड़ेगा। इस फॉर्मूले में 2-3 सीटों का हेरफेर किया जा सकता है। 

लेकिन अगर आने वाले दिनों में पशुपति पारस, असदुद्दीन ओवैसी, हेमंत सोरेन और अखिलेश यादव को भी बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर गठबंधन में शामिल किया गया तो फिर सभी दलों को त्याग करना पड़ेगा। ऐसे हालात में, कांग्रेस के हाथ में सिर्फ 45-46 सीटें ही आ पाएंगी। यानी लालू यादव के पहले फॉर्मूले के तहत कांग्रेस को 53-55 और दूसरे फॉर्मूले के तहत सिर्फ 45-46 सीटें ही मिल सकती है। 

आपको याद दिला दें कि, वर्ष 2020 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान राजद मुखिया लालू यादव जेल में थे। यह आरोप लगाया जाता है कि लालू यादव के जेल में रहने का फायदा उठाते हुए कांग्रेस ने तेजस्वी यादव पर दबाव डालकर गठबंधन में 70 सीटें झटक ली। लेकिन 70 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस सिर्फ 19 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई। लालू यादव और तेजस्वी यादव सहित विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं का यह मानना है कि कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के कारण ही बिहार में नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो गए थे। 

लालू यादव 2020 के विधानसभा चुनाव के समय पर जेल में थे लेकिन इस बार बाहर है और सीट बंटवारे के अपने फॉर्मूले पर अडिग है।

राजद के इस फॉर्मूले ने कांग्रेस नेताओं को दुविधा की स्थिति में डाल दिया है। अब गेंद राहुल गांधी के पाले में है कि वह इतनी ही सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाएं या सीधे लालू यादव से बात करके कांग्रेस के कोटे की सीटों की संख्या को बढ़ाने का प्रयास करें। हालांकि बिहार में कांग्रेस के कई नेता दबी जुबान में एक तीसरे विकल्प की बात भी कर रहे हैं। तीसरा विकल्प यानी राहुल गांधी बिहार में अन्य छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर तीसरा मोर्चा बनाए और बड़े भाई की भूमिका में चुनाव लड़ जाएं।

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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