पारिवारिक दलों में भी लोकतंत्र लाया जाये, जरूरी हो तो इसके लिए कानून बने

By विजय कुमार | Jun 07, 2019

2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार सामान्य घटना नहीं है। यह इस बात की प्रतीक है कि अब कांग्रेस जैसे अलोकतांत्रिक दलों के दिन पूरे हो रहे हैं। 1947 से पहले कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में आजादी के लिए अहिंसक संघर्ष करने वाले सभी लोगों और समुदायों का एक मंच थी। इसीलिए आजादी के बाद उन्होंने इसे भंग करने का सुझाव दिया था; पर सत्तालोभी नेहरू यह पकी खीर छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी इससे बहुत दुखी थे। उनकी हत्या देश के लिए दुखद थी; पर इससे नेहरू की लाटरी खुल गयी। क्रमशः इस परिवार ने पार्टी पर कब्जा कर लिया। 

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इंदिरा गांधी ने यही व्यवहार मोरारजी देसाई, के. कामराज, जगजीवन राम, नीलम संजीव रेड्डी आदि के साथ किया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता प्रणब मुखर्जी को पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैडम सोनिया के कारण शरद पवार, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, के. चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी आदि पार्टी से बाहर हुए। आज ये सब अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के विकल्प बन चुके हैं। 

राहुल के कारण हेमंत बिस्व शर्मा ने पार्टी छोड़ी और अब वे पूर्वोत्तर में कांग्रेस की जड़ें खोद रहे हैं। पंजाब के कैप्टेन अमरिन्द्र सिंह ने जब पार्टी छोड़ने की धमकी दी, तब जाकर उन्हें पिछली विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया। अन्यथा वहां भी कांग्रेस साफ हो जाती। पूरे देश में जमीनी नेता कांग्रेस से दूर जा रहे हैं, चूंकि इस परिवार को यह पसंद नहीं है कि कोई इनसे आगे निकल सके। 

अधिकांश दलों का हाल यही है। मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, लालू यादव, अजीत सिंह, शरद यादव, रामविलास पासवान, ओमप्रकाश चौटाला, चंद्रबाबू नायडू, देवेगोड़ा, फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मायावती, प्रकाश सिंह बादल, ठाकरे और स्टालिन जैसे ‘एक व्यक्ति एक पार्टी’ के पुरोधा जब तक जीवित हैं, तब तक पार्टी उनकी जेब में रहेगी। उसके बाद उसमें टूट-फूट तय है। हमारा लोकतंत्र ऐसे ही अलोकतांत्रिक दलों के कंधे पर आगे बढ़ रहा है।  

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इस बारे में अपवाद दो ही दल हैं। एक हैं वामपंथी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। कई टुकड़ों में बंटा वामपंथ लगातार सिकुड़ रहा है, चूंकि वह धर्मविरोधी और हिंसाप्रेमी है। भारतीय जनता धर्मप्राण है और वह राजनीतिक हिंसा पसंद नहीं करती। इसलिए जैसे ही उसे विकल्प मिलता है, वह वामपंथ को खारिज कर देती है। बंगाल में यह विकल्प ममता बनर्जी, त्रिपुरा में भा.ज.पा. और केरल में कांग्रेस बन गयी है। जहां तक भा.ज.पा. की बात है, उस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुछ नियंत्रण रहता है। इसीलिए पहले जनसंघ और आज भा.ज.पा. लोकतांत्रिक बनी हुई है। उसका कोई अध्यक्ष एक-दूसरे का रिश्तेदार नहीं है। भा.ज.पा. में नया अध्यक्ष बनना तय है; पर वह कौन होगा, कहना कठिन है। 

2019 के चुनाव में कई घरेलू दलों को सफलता मिली है। इनमें नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी और स्टालिन के नाम विशेष हैं; पर ये भी अधिक दिन नहीं टिक सकेंगे। घरेलू दलों का प्रादुर्भाव कांग्रेस के कारण ही हुआ है। जैसे-जैसे कांग्रेस का अवसान होगा है, वैसे-वैसे ये दल भी अंत को प्राप्त होंगे। बंगाल के अगले विधानसभा चुनाव में यदि भा.ज.पा. जीत गयी, तो ममता की पार्टी टूट जाएगी। बिहार में लालू और उ.प्र. में मुलायम का जलवा समाप्ति पर है। बिना किसी बैसाखी के नीतीश कुमार भी बेकार हैं। उड़ीसा में नवीन बाबू और पंजाब में प्रकाश सिंह बादल भी अब बुजुर्ग हो चले हैं। उनके जाते ही उनके दल भी बिखर जाएंगे। दक्षिण में ऐसे दलों को समाप्त होने में शायद थोड़ा समय और लगेगा। यद्यपि कर्नाटक से इसकी शुरुआत हो चुकी है। 

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असल में कांग्रेस ने प्रथम परिवार को सुरक्षित रखने के लिए कभी किसी क्षेत्रीय नेता को नहीं उभरने दिया; पर भा.ज.पा. में राज्यों के नेताओं के भी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनने की पूरी संभावनाएं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह (उ.प्र.), नितिन गडकरी (महाराष्ट्र), लालकृष्ण आडवाणी, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह (गुजरात), कुशाभाऊ ठाकरे (म.प्र.), बंगारू लक्ष्मण और वेंकैया नायडू (आंध्र), जना कृष्णमूर्ति (तमिलनाडु)...आदि इसके उदाहरण हैं। अतः भा.ज.पा. के केन्द्र और इन राज्यों में प्रभावी होने पर ये घरेलू और जातीय दल भी समाप्त होंगे।

भारत में सरकार बनाने और चलाने के लिए तो नियम हैं; पर राजनीतिक दलों के निर्माण और संचालन के नियम नहीं हैं। भा.ज.पा. को इस बार बंपर बहुमत मिला है। अगले साल राज्यसभा में भी उसका बहुमत हो जाएगा। यदि वह साहसपूर्वक कुछ ऐसे नियम बनाये, जिससे सब दलों में आंतरिक लोकतंत्र बहाल हो सके, तो देश का बहुत भला होगा।

-विजय कुमार

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