जनादेश भी बड़ा है, चुनौतियां और अपेक्षाएं भी बड़ी हैं, पर 'मोदी है तो सब मुमकिन है'

By डॉ. विजय सोनकर शास्त्री | Publish Date: Jun 6 2019 1:29PM
जनादेश भी बड़ा है, चुनौतियां और अपेक्षाएं भी बड़ी हैं, पर 'मोदी है तो सब मुमकिन है'
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2019 का जनादेश बहुत बड़ा है। इसलिए केंद्र की नयी सरकार के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं। पर जो लोग प्रधानमंत्री मोदी की कार्यप्रक्रिया के जुनून को जानते हैं, वह कहते हैं- ''मोदी है, तो मुमकिन है''।

23 मई 2019 दिन-बृहस्पतिवार। लगभग 130 करोड़ लोगों वाले देश भारत में यह महज एक तिथि नहीं है, बल्कि यह वह दिन है, जो इतिहास में इसलिए दर्ज किया जायेगा कि अपनी विकासपरक नीतियों के दम पर आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोबारा भारी बहुमत से जीत प्राप्त की। यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जाएगी क्योंकि पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी को आम चुनाव में हराने के लिए एकजुट होकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था। चुनाव के मध्य भाजपा नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र नरेंद्र मोदी जी पर लगातार वार किए जा रहे थे और गलत आरोपों से उनकी छवि को जनता के मध्य तार-तार करने के लिए हर विपक्षी नेता सबसे आगे नजर आ रहा था। लेकिन विपक्ष के तमाम प्रयास और दावों को चुनाव परिणाम ने हवा में उड़ा दिया और प्रधानमंत्री मोदी भारी बहुमत के साथ जीत कर विजेता के रूप में सामने आये।


भाजपा नेता नरेंद्र मोदी को आम चुनाव में मिली प्रचंड जीत के पीछे छिपे कारणों पर ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट नजर आता है कि 2014 से लेकर 2019 के मध्य अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह देश की गरीब, दलित और वंचित जनता की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दिन-रात काम किया, उसका परिणाम चुनाव में जनता से मिले भारी समर्थन के रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहें तो पांच साल के दौरान उन्होंने देश की मजबूत नींव को तैयार किया है, जिस पर अब भव्य इमारत बनाने का काम किया जायेगा। आशय यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में देश की गरीब, दलित और वंचित जनता के उन हितों एवं मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने का काम किया, जिन हितों या सुविधाओं की तरफ, स्वतंत्रता के बाद बनाने वाली अधिकांश सरकारों ने न तो ध्यान दिया और न ही विचार किया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने जिस गंभीरता के साथ इन हितों को सोचा, समझा और फिर काम किया, उसका परिणाम विकास की दौड़ में आगे बढ़ रहे भारत के रूप में देखा जा सकता है।
 
अब एक बार फिर जब जनता ने लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी को फिर से स्थायी और मजबूत सरकार बनाने का जनादेश दे दिया है। नए जनादेश में भारत की जनता की उस आशा, विश्वास और अपेक्षाओं को भी देखा जा सकता है, जिसके सपने उनकी आंखों में सजे हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह हर भारतवासी के शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक हितों के अनुरूप अपनी सरकार की दिशा को निर्धारित करें, जिससे देश का हर नागरिक, वह चाहे दलित हो या गरीब, वंचित हो या कमजोर, सभी अपने जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति निर्बाध रूप से करते हुए अपना और अपने परिवार का जीवनयापन कर सकें।
 
अबकी बार का जनादेश बहुत बड़ा है। इसलिए केंद्र की नयी सरकार के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं। पर जो लोग प्रधानमंत्री मोदी की कार्यप्रक्रिया के जुनून को जानते हैं, वह कहते हैं- 'मोदी है, तो मुमकिन है'। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी पर सभी का विश्वास है कि वह भारत की पूरी तस्वीर को बदल कर रख देंगे। आगामी पांच साल के कार्यकाल के दौरान भारत को विकास के पथ पर और आगे ले जाने के लिए नयी सरकार को शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से जो काम करने होंगे, उस पर इस तरह से विचार किया जा सकता है।



भविष्य के भारत का शैक्षणिक एजेंडा
 


शिक्षा किसी भी देश के निर्माण का महत्वपूर्ण अंग होती है। शिक्षा हर मानव में संस्कार को जन्म देती है और संस्कार से मानव समाज का सकारात्मक विकास प्रशस्त होता है। यह वाक्य हजारों साल पुरानी भारतीय हिन्दू संस्कृति की परंपरा को दर्शाता है। प्राचीन काल में गुरुकुलों, आश्रमों तथा बौद्ध मठों में शिक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था होती थी। नालन्दा, तक्षशिला एवं वल्लभी जैसे शिक्षा केंद्रों की पहचान विश्व स्तर पर थी और विदेशी छात्र भी भारत में शिक्षा के लिए आते थे। लेकिन समय के साथ ऐसे कई शिक्षा केंद्र नष्ट कर दिए गए। मुगल काल से लेकर अंग्रेजों के समय आने तक शिक्षा का स्वरूप बदलता चला गया। अंग्रेजों के काल में शिक्षा की जिस आधुनिक प्रणाली की शुरुआत हुई, उस प्रणाली ने शिक्षा को आम जन से दूर करने का काम किया। भारत को जब स्वतंत्रता मिली तो देश की सरकारों ने शिक्षा के लिए काम तो किया, लेकिन शिक्षा से आम जनमानस को जोड़ पाने में असफल ही रहे। उनकी असफलता के कारण गरीब, दलित और वंचित समाज शिक्षा से दूर होता चला गया। राजनीति और वोट बैंक की मानसिकता ने सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता लगातार कम की, परिणाम निजी शिक्षा केंद्रों को धन आधारित शिक्षा के रूप में देखा गया। सभी को शिक्षा देने के लिए कानून भी बनाया गया, लेकिन आम जनमानस के बच्चे गुणवत्तायुक्त शिक्षा से दूर ही रहे।
देश की नयी मोदी सरकार के सामने शिक्षा क्षेत्र के आमूलचूल परिवर्तन की चुनौती भी है। खासतौर पर गरीब, दलित और वंचित समाज के बच्चों के लिए गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा देने के लिए बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को तो सही करना ही होगा, साथ ही उन निजी और महंगे स्कूलों पर भी नकेल कसनी होगी, जिनके लिए शिक्षा सिर्फ धन कमाने के साधन से ज्यादा और कुछ नहीं है। गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा को उच्च वर्गों के माध्यम से निम्न वर्गों तक पहुंचना होगा। देश में जब शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुआ तो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिये यह मौलिक अधिकार बन गया। इसके बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में चुनौतियों का अंबार लगा है तथा ऐसे उपायों की तलाश लगातार जारी है, जिनसे इस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए जा सकें। मानव संसाधन के विकास का मूल शिक्षा है जो देश के सामाजिक-आर्थिक तंत्र के संतुलन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारे देश का शिक्षा क्षेत्र शिक्षकों की कमी से सर्वाधिक प्रभावित है। साथ ही राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षा सुधार कार्यक्रम भी कोई खास उम्मीद नहीं जगा पाए हैं।
 
वर्तमान में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की जवाबदेही और प्रदर्शन सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला नहीं है। देश के शिक्षा संबंधी सभी अध्ययन इंगित करते हैं कि शिक्षा के साथ विद्यार्थियों का स्तर भी अपेक्षा से नीचे है। इसके लिये सीधे शिक्षकों को दोषी ठहरा दिया जाता है और इस वास्तविकता से आंख बंद कर ली जाती है कि शिक्षा का बुनियादी ढाँचा और शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था बेहद कमजोर है। देश में एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ केवल एक शिक्षक है। आजादी के 72 वर्ष बाद भी यदि देश में शिक्षा की यह दशा और दिशा है तो स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के सकारात्मक अभियान में सभी का सक्रिय सहयोग लेना आवश्यक होगा।
 
आर्थिक असमानता की बड़ी वजह मैकाले की शिक्षा नीति है, जो आम लोगों और संभ्रांत वर्ग के बीच फासले को बरकरार रखने के लिए तैयार की गयी थी। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में क्या खामी है और नयी शिक्षा व्यवस्था कैसी होनी चाहिए ? मैकाले ने अंग्रेजी शासन को कायम रखने के लिए संभ्रांत वर्ग तैयार करने वाली शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता के बाद भी आधुनिकता के नाम पर यही नीतियां अपनायी गयीं।  इससे समाज में शिक्षा के स्तर पर असमानता बढ़ी। अमीर अच्छी शिक्षा हासिल कर आर्थिक तौर पर संपन्न होने लगे और गरीब पैसे के अभाव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने से वंचित होने लगे। इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ी है। अब समय आ गया है जब स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार कर इस मुद्दे पर एक टीम इंडिया का गठन किया जाना चाहिये, जिससे देश के हर नागरिक का बच्चा ऐसी शिक्षा ग्रहण कर सके, जो उसमें संस्कार भी विकसित करने में सक्षम हो साथ ही देश के हर नागरिक के समग्र विकास का सपना पूरा हो सकेगा।
 
आर्थिक क्षेत्र
 
भारत तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्था है। लेकिन अर्थव्यवस्था के सामने कई चुनौतियां भी हैं। स्वतंत्रता के बाद खास कर आर्थिक उदारीकरण के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने देश के गरीबों, दलितों और वंचित समाज के लोगों पर नकारात्मक असर डाला है। स्वतंत्रता के बाद शासन-सत्ता की जिम्मेदारी संभालने वालों ने अपने निजी हितों को जिस तरह से महत्व दिया, वह समय के साथ बढ़ता गया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की सोच पीछे छूट गयी। कई सफलताओं के बावजूद कई असफलताएं, मसलन गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बढ़ता प्रदूषण अब भी चिंता के विषय बने हुए हैं। किसी भी देश के विकास में नेतृत्व का अहम योगदान होता है, क्योंकि इसका असर सभी संस्थाओं पर पड़ता है। नेतृत्व की कमजोरी का असर हर ओर दिखायी देता है। भारतीय नेतृत्व की कमजोरी की जड़ें औपनिवेशिक काल से जुड़ी हुई हैं और यही वजह है कि स्वतंत्रता के बाद इसकी गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आयी। कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण समस्याएं गंभीर होती चली गयीं।
 
गांधी जी का मानना था कि आर्थिक नीति के केंद्र में सबसे निचला व्यक्ति होना चाहिए। लेकिन 1991 से पहले और उसके बाद भी आर्थिक नीतियों में आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को हल करने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। 1950 से ही आर्थिक नीतियों का मुख्य मकसद निवेश बढ़ाना रहा है, न कि रोजगार। होना यह चाहिए था कि हम रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लेकिन अब देश में एक मजबूत नेतृत्व है। इसलिए अब ऐसी विकास प्रक्रिया को गति देनी होगी, जिसका लाभ देश के हर नागरिक को प्राप्त हो सके। गरीबी का उन्मूलन हो, रोजगार के अवसर बढ़ें, देश का हर व्यक्ति उत्पादक बन सके और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा सभी को समान रूप से उपलब्ध हों, तभी समाज में बराबरी आयेगी और देश आर्थिक रूप से पूर्ण विकसित हो सकेगा।
 
गांधी जी ने कहा था कि आम लोगों की जरूरत के लिए संसाधन पर्याप्त हैं, लेकिन उनके लालच के लिए नहीं। मौजूदा अर्थव्यवस्था उपभोग पर आधारित है। लोग सोचते हैं कि और अच्छा जीवन हो, सारी सुख-सुविधाएं मिलें, भले ही पर्यावरण पर और दूसरों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता हो। ऐसे हालात को बदलने के लिए ही एक वैकल्पिक मॉडल की जरूरत है, जिसमें उपभोक्तावाद न हो। भारत ही ऐसा देश है, जो यह मॉडल दे सकता है। भारत, चीन, ब्राजील जैसे बड़े देशों में सिर्फ भारत के पास ही वैकल्पिक आर्थिक मॉडल देने की क्षमता है। भारत में इतने संसाधन हैं कि यहां सभी को बुनियादी सुविधा मिल सकती है और हर नागरिक आर्थिक रूप से सशक्त हो सकता है।
 
1991 के बाद का मॉडल बाजार केंद्रित है। आज बाजार सब कुछ में प्रवेश कर गया है। बाजार की सोच हावी होने से राष्ट्रीय नीति कमजोर होती चली गयी है। मौजूदा आर्थिक संकट की प्रमुख वजह यही है। किसी देश की नीति दूसरे देश में भी सफल नहीं हो सकती, क्योंकि सबके भौगोलिक हालात और समस्याएं अलग-अलग होती हैं। इसलिए मौजूदा आर्थिक हालात से पार पाने के लिए भारत को अपने हितों वाली नीतियों को लागू करना होगा। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बनी नयी सरकार आर्थिक क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव की राह प्रशस्त करेगी। नयी सरकार की नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम ऐसे होने चाहिए, जो देश के हर नागरिक को विकास की राह में साथ लेकर चल सके।
 
भारत के आम आदमी की खुशहाली में कमी होने का बड़ा कारण यह है कि सरकार ने गरीबों के लिये योजनाएं बनायीं, लेकिन वह योजनाएं राजनीतिक लाभ लेने तक सीमित रही। यही कारण है कि देश में अब तक गरीबी नहीं खत्म हुई। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने बदलाव की जो शुरूआत की है, उसका सकारात्मक असर दिखने लगा है। विकास की सार्थकता इस बात में है कि देश का आम नागरिक खुद को संतुष्ट और आशावान महसूस करे। स्वयं आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ बने, तभी वह खुशहाल हो सकेगा। एक महान विद्वान ने कहा था कि जब हम स्वार्थ से उठकर अपने समय को देखते हुए दूसरों के लिए कुछ करने को तैयार होते हैं तो हम सकारात्मक हो जाते हैं। सरकार एवं सत्ताशीर्ष पर बैठे लोगों को निस्वार्थ होना जरूरी है। उनके निस्वार्थ होने पर ही आम आदमी के खुशहाली के रास्ते उद्घाटित हो सकते हैं। तभी आम आदमी को ऊर्जा एवं सकारात्मकता से समृद्ध किया जा सकता है। और प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा करके दिखाया है। खुशहाल और विकसित भारत को निर्मित करने के लिये अतीत से सीखना होगा। एक सार्थक एवं सफल कोशिश पूरे भारत को एक नयी दिशा देगी और गरीब, दलित और वंचित समाज को मुख्यधारा में लेकर आएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर देश के सभी वर्ग की जनता ने अपना भरोसा दिखाया है और यह भरोसा उनमें नया विश्वास पैदा करेगा, जो देश को फिर से उस ऊंचाई तक लेकर जायेगा, जिस ऊंचाई पर देश को ले जाने का सपना प्रधानमंत्री मोदी से लेकर भाजपा के हर कार्यकर्ता ने देखा है। 
 
-डॉ. विजय सोनकर शास्त्री
(लेखक पूर्व सांसद हैं और वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)
 

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