610 दल कोई सीट नहीं जीत पाये और 530 दलों को एक भी वोट नहीं मिला

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  जून 7, 2019   11:29
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610 दल कोई सीट नहीं जीत पाये और 530 दलों को एक भी वोट नहीं मिला

2019 के लोकसभा चुनावों में 530 राजनीतिक दल तो ऐसे रहे जिनका वोट प्रतिशत शून्य रहा। सीटों के हिसाब से देखें तो इस बार जितने दल लोकसभा चुनाव के समर में उतरे थे उसमें से 610 क्षेत्रीय और पंजीकृत दल कोई भी सीट जीतने में विफल रहे।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ हर किसी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का अधिकार प्राप्त है लेकिन चुनाव आयोग के पास दर्ज हजारों राजनीतिक पार्टियों में से कुछेक ही हैं जोकि जनता का विश्वास हासिल कर पाती हैं बाकी सब राजनीतिक पार्टियां तो मात्र कागजों पर या अपने कार्यालयों तक ही सीमित हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों में इन सभी पार्टियों का क्या प्रदर्शन रहा आइए इस पर एक सरसरी नजर डालते हैं।

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सूनामी ने मचाई तबाही

इस बार मोदी सूनामी में सात राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में से छह पार्टियों को बुरी तरह हार मिली। यही नहीं राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त 64 राजनीतिक दलों में से अधिकतर वही दल अच्छा प्रदर्शन कर पाये जोकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, द्रमुक आदि ने अपने चमत्कारी प्रदर्शन से क्षेत्रीय दलों की लाज बचा ली। देखा जाये तो भारत में कुल 64 क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जोकि मान्यता प्राप्त हैं लेकिन चुनाव परिणाम के आंकड़ों पर नजर डालें तो मात्र 13 राजनीतिक दल ऐसे थे जो सिर्फ एक सीट जीतकर लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाये। अब यदि ऐसे दलों की बात करें जोकि चुनाव आयोग के पास पंजीकृत तो हैं लेकिन उन्हें मान्यता नहीं है तो ऐसे दलों की कुल संख्या 2301 है। 2019 के लोकसभा चुनावों में इन सभी 2301 पंजीकृत दलों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। 2019 के लोकसभा चुनावों में 530 राजनीतिक दल तो ऐसे रहे जिनका वोट प्रतिशत शून्य रहा। सीटों के हिसाब से देखें तो इस बार जितने दल लोकसभा चुनाव के समर में उतरे थे उसमें से 610 क्षेत्रीय और पंजीकृत दल कोई भी सीट जीतने में विफल रहे।

लोकसभा पहुँचे 37 राजनीतिक दल

दलीय स्थिति के हिसाब से देखें तो सत्रहवीं लोकसभा में कुल 37 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि चुन कर आये हैं जबकि पिछले लोकसभा चुनावों में 464 पार्टियों ने हिस्सा लिया था और उसमें से 38 दलों के प्रतिनिधि लोकसभा में चुन कर आये थे।

सबसे अमीर और सबसे गरीब उम्मीदवार का क्या हुआ ?

इस बार के चुनावी समर में हालांकि हजारों की संख्या में उम्मीदवार थे लेकिन सबसे अमीर और सबसे गरीब उम्मीदवार की बात की जाये तो बिहार की पाटलीपुत्र सीट से निर्दलीय उम्मीदवार रमेश कुमार शर्मा सबसे अमीर प्रत्याशी थे। उन्होंने अपनी संपत्ति 1107 करोड़ रुपए घोषित की थी और चुनावों में खूब पैसा भी खर्च किया लेकिन उन्हें मात्र 1558 वोट ही मिले और वह अपनी जमानत तक गँवा बैठे। अगर सबसे गरीब उम्मीदवार की बात करें तो मध्य प्रदेश की खरगोन सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले जॉनी करण सबसे गरीब उम्मीदवार थे। उनके एक बैंक खाते में शून्य राशि और एक बैंक खाते में एक हजार रुपए ही थे। ये हजार रुपए वाला बैंक खाता उन्हें चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार खुलवाना पड़ा था। चुनाव खत्म होने तक वह मात्र 12-13 हजार रुपए ही खर्च कर सके थे और यह राशि भी उन्होंने अपने जानकारों से उधार लेकर जुटाई थी।

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सबसे तेजी से बढ़ने वाली पार्टी है भाजपा

अगर भाजपा को मिली सफलता का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में इस बार अपनी सीटों की संख्या में 21 अंकों की वृद्धि करते हुए 303 सीटों पर कमल खिलाया और वोट शेयर में भी 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जोकि एक बहुत बड़ी कामयाबी है। 1952 के बाद से यदि भारतीय चुनावी इतिहास को देखें तो कोई भी राजनीतिक दल इस तेजी के साथ आगे नहीं बढ़ सका है जितना भाजपा बढ़ गयी है। दूसरी तरफ यदि कांग्रेस की बात करें तो वह पिछले चुनावों में 44 सीटें जीतने में सफल रही थी और इस बार उसकी सीटों का आंकड़ा 52 हो गया। लगातार दूसरी बार ऐसा हुआ है जब कांग्रेस लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा हासिल करने से चूक गयी।

सोशल मीडिया पर जमकर खर्च

इस बार के लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया का राजनीतिक दलों ने भरपूर उपयोग किया। सोशल मीडिया मंचों जैसे फेसबुक, गूगल, यूट्यूब आदि की भारतीय आम चुनावों में बल्ले बल्ले हो गयी। राजनीतिक दलों ने कुल 53 करोड़ की राशि के विज्ञापन सोशल मीडिया पर दिये। इनमें सबसे ज्यादा विज्ञापन भाजपा ने दिये। फेसबुक के मुताबिक उसे इस वर्ष फरवरी से लेकर मई तक कुल 1.21 लाख राजनीतिक विज्ञापन मिले जिनके लिए 26.5 करोड़ रुपये वसूले गये। इसी प्रकार राजनीतिक पार्टियों ने गूगल, यूट्यूब और उसके सहयोगी मंचों पर 14837 विज्ञापनों पर 27.36 करोड़ रुपये खर्च किये। जहाँ तक भाजपा का सवाल है उसने फेसबुक पर 2500 विज्ञापनों पर 4.23 करोड़ रुपए खर्च किये। गूगल के विभिन्न मंचों पर पार्टी ने विज्ञापन पर 17 करोड़ रुपए की राशि खर्च की।

जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है उसने फेसबुक पर 3686 विज्ञापनों पर 1.46 करोड़ रुपए और गूगल के मंचों पर दिये गये 425 विज्ञापनों पर 2.71 करोड़ रुपए खर्च किये। फेसबुक पर विज्ञापनों के मामले में तृणमूल कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही और पार्टी ने यहां 29.28 लाख रुपए खर्च किये। आम आदमी पार्टी ने 176 विज्ञापनों पर 13.62 लाख रुपए खर्च किये। आम आदमी पार्टी के बारे में इस तरह की भी खबरें रहीं कि वह एक कंपनी के माध्यम से भी विज्ञापनों पर खर्च कर रही थी। गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में सोशल मीडिया कंपनियों ने इस बात का ऐलान किया था कि पारदर्शिता बरतते हुए वह भारत के आम चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से उनके मंचों पर दिये गये विज्ञापनों पर किये जाने वाले खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक करेंगी।

-नीरज कुमार दुबे







भारत और सऊदी अरब के बीच पहले युद्धाभ्यास की शुरुआत के गहरे हैं निहितार्थ

  •  कमलेश पांडेय
  •  फरवरी 24, 2021   14:57
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भारत और सऊदी अरब के बीच पहले युद्धाभ्यास की शुरुआत के गहरे हैं निहितार्थ

2020 के दिसम्बर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने सऊदी अरब का दौरा किया था। यह पहली बार था जब किसी भारतीय सेना प्रमुख ने भारत और सऊदी अरब के बीच बढ़ते संबंधों का एक स्पष्ट संकेत देते हुए पश्चिम एशियाई देश का दौरा किया था।

भारत और सऊदी अरब के बीच प्रगाढ़ होते जा रहे द्विपक्षीय सम्बन्धों का ही यह नतीजा है कि वर्ष 2021 में पहली बार दोनों देश युद्धाभ्यास करने जा रहे हैं। यह भारत व सऊदी अरब के बीच मजबूत होते रक्षा सम्बन्धों और अन्य क्षेत्रों में भी विकसित हो रहे विश्वास परक सहयोग संबंधों के नतीजे हैं, जिससे एशिया में भारत की स्थिति और मजबूत होगी, वहीं सऊदी अरब की स्थिति भी एशिया व यूरोप में मजबूत होगी।

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गौरतलब है कि भारतीय और सऊदी अरब की सेनाएं पहली बार संयुक्त द्विपक्षीय अभ्यास करेंगी। खास बात यह है कि इतिहास में इन दोनों देशों के बीच यह पहला युद्धाभ्यास होगा। आपको यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि इससे पहले सऊदी अरब अपनी सेना को युद्ध की बारीकियां सिखाने के लिए पाकिस्तान और अमेरिका के भरोसे रहता था। लेकिन अब भारत की तरफ सऊदी अरब का बढ़ता झुकाव वैश्विक बिरादरी में उसके बढ़ते कद को अभिव्यक्त करता है। अभी सऊदी अरब की सेना भारत की यात्रा करके यहां युद्धाभ्यास करेगी, जबकि अगले वित्त वर्ष में होने वाले अभ्यासों के लिए भारतीय सेना सऊदी अरब की यात्रा करेगी। 

गौरतलब है कि 2020 के दिसम्बर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने सऊदी अरब का दौरा किया था। यह पहली बार था जब किसी भारतीय सेना प्रमुख ने भारत और सऊदी अरब के बीच बढ़ते संबंधों का एक स्पष्ट संकेत देते हुए पश्चिम एशियाई देश का दौरा किया था। तब द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के मुद्दे पर व्यापक चर्चा हुई थी। अपनी सऊदी अरब यात्रा के दौरान सेना प्रमुख नरवणे ने रॉयल सऊदी लैंड फोर्स के मुख्यालय, संयुक्त बल कमान मुख्यालय और किंग अब्दुल अजीज सैन्य अकादमी का दौरा किया था। तब उन्हें रॉयल सऊदी लैंडफोर्स के मुख्यालय में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। उन्होंने रॉयल सऊदी के कमांडर जनरल फहद बिन अब्दुल्ला मोहम्मद अल-मुतीर से भी मुलाकात करके द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के मुद्दे पर चर्चा की थी। इसके बाद उन्होंने संयुक्त बल सऊदी अरब के लेफ्टिनेंट जनरल मुतलाक बिन सलीम बिन अल-अजीमा कमांडर के साथ बातचीत की और रक्षा सहयोग पर विचारों का आदान-प्रदान किया। तब जनरल नरवणे के साथ गए प्रतिनिधिमंडल और उनकी पत्नी वीना नरवणे ने भी ऑल वीमेन सेंटर रियाद सऊदी अरबिया का दौरा किया। उनकी इस यात्रा से रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते खुलने की उम्मीद जताई गई थी।

आपको यह स्पष्ट कर दें कि सऊदी अरब, भारत को 'विज़न 2030' के तहत किंगडम के रणनीतिक साझेदार देशों में से एक के रूप में पहचान देता है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच जुड़ाव बढ़ा है। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सऊदी अरब यात्रा के दौरान रणनीतिक साझेदारी परिषद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। फरवरी 2019 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने नई दिल्ली का दौरा किया था। इस यात्रा के दौरान प्रिंस ने भारत में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के निवेश की घोषणा की थी। दोनों देशों के बीच घनिष्ठ हो रहे संबंधों के नतीजे अब भारतीय और सऊदी अरब की सेनाओं के पहली बार संयुक्त द्विपक्षीय अभ्यास करने का कार्यक्रम बनने से दिखने लगे हैं। 

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भारत-सऊदी अरब के बीच प्रगाढ़ होते सैन्य व अन्य सम्बन्धों से एक तरफ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, बंगलादेश, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, इंडोनेशिया आदि देशों की मानसिकता भारत के प्रति बदलेगी। वहीं, चीन, रूस, इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आशियान देश समूह व ब्राजील आदि साधन संपन्न देशों में भी भारत की सूझबूझ के प्रति एक सकारात्मक संदेश जाएगा। वैश्विक दुनियादारी में भारत के बढ़ते कद और उसे संतुलित रखने के लिहाज से भी सऊदी अरब के साथ हमारे प्रगाढ़ होते रिश्ते के अपने खास मायने हैं, जिसे समझने व समझाने की जरूरत है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार







रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर सतर्क है भारत !

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  फरवरी 23, 2021   14:48
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रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर सतर्क है भारत !

भारत की चिंता यह है कि अफगानिस्तान के बहाने रूस-पाक फौजी-सहकार जोरों से बढ़ रहा है। अभी-अभी अफगानिस्तान पर रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव ने इस्लामाबाद-यात्रा की है। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई तो यह है कि अफगान-समस्या को हल करने में भारत की भूमिका नगण्य है।

भारत के विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला अभी-अभी मास्को होकर आए हैं। कोविड के इस भयंकर माहौल में हमारे रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और विदेश सचिव को बार-बार रूस जाने की जरूरत क्यों पड़ रही है ? ऐसा नहीं है कि किसी खास मसले को लेकर भारत और रूस के बीच कोई तनाव पैदा हो गया है या भारत-रूस व्यापार में कोई गंभीर उतार आ गया है। लेकिन ऐसे कई मुद्दे हैं, जिनकी वजह से दोनों मित्र-राष्ट्रों के बीच सतत संवाद जरूरी हो गया है।

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सबसे पहला मुद्दा तो यह है कि रूस से भारत जो एस—400 मिसाइल 5 बिलियन डॉलर में खरीद रहा है, उसे लेकर अमेरिका कोई प्रतिबंध तो नहीं लगा देगा। ट्रंप-प्रशासन के दौरान यह खतरा जरूर था लेकिन अब इसकी संभावना कम ही है। ये रूसी मिसाइल इस वक्त दुनिया के सबसे तेज मिसाइल हैं। दूसरा, कोरोना महामारी से निपटने में दोनों राष्ट्र परस्पर खूब सहयोग कर रहे हैं। यों भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और मोदी अब तक 19 बार मिल चुके हैं। कोराना-काल में पिछले साल उनकी चार बार बात भी हुई है। तीसरा, मुद्दा है— भारत-प्रशांत का यानि रूस को यह चिंता है कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में भारत कहीं अमेरिका का मोहरा बनकर चीन और रूस के विरूद्ध मोर्चाबंदी तो नहीं कर रहा है ? इसके जवाब में श्रृंगला ने कहा है कि भारत किसी भी देश के विरुद्ध नहीं है। वह चेन्नई से व्लादिवस्तोक तक समुद्री गलियारा बनाने की भी तैयारी कर रहा है। चौथा, अफगानिस्तान के सवाल पर श्रृंगला ने कहा कि भारत को इस बात से कोई एतराज नहीं है कि रूस और पाकिस्तान के बीच सीधा संवाद चल रहा है। यदि यह संवाद अफगानिस्तान में शांति लाता है तो भारत इसका स्वागत करेगा लेकिन अफगानिस्तान पर वह किसी राष्ट्र के कब्जे को बर्दाश्त नहीं करेगा।

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इधर भारत की चिंता यह है कि अफगानिस्तान के बहाने रूस-पाक फौजी-सहकार जोरों से बढ़ रहा है। अभी-अभी अफगानिस्तान पर रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव ने इस्लामाबाद-यात्रा की है। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई तो यह है कि अफगान-समस्या को हल करने में भारत की भूमिका नगण्य है। भारत सरकार और भाजपा में ऐसा कोई नहीं है, जो अफगान-स्थिति को ठीक से जानता-समझता हो। वैसे भी हमारी सर्वज्ञ सरकार अपने बयानों की नौटंकी से ही खुश होती रहती है। दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश होने के नाते हमारी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है लेकिन अफगान-मामले में हम हाशिए में पड़े हुए हैं।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं) 







छोटी बहू अपर्णा यादव ने मुलायम और अखिलेश, दोनों को दिखाया आईना

  •  अजय कुमार
  •  फरवरी 22, 2021   14:30
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छोटी बहू अपर्णा यादव ने मुलायम और अखिलेश, दोनों को दिखाया आईना

अपर्णा का राममंदिर निर्माण के लिए दान इसलिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि पहले समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और अब उनके पुत्र अखिलेश यादव ने तुष्टिकरण की सियासत के चलते कभी भी राम मंदिर निर्माण का पक्ष नहीं लिया था।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भले ही अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए चंदा एकत्र करने वालों का चंदाजीवी कहते हों, लेकिन उनके छोटे भाई की बहू अपर्णा यादव इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती हैं। अपर्णा को इस बात का भी मलाल है कि उनके ससुर और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाई गईं थी। इस बात का अहसास तब हुआ जब उन्होंने अतीत की घटनाओं से अपने आप को अलग करते हुए यहां तक कह दिया कि वह अतीत के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। इसके साथ ही अपर्णा ने राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा लेने पहुंचे राम भक्तों के सामने अपनी झोली खोल दी। अपर्णा यादव ने राममंदिर निर्माण के लिए 11 लाख रुपए का चंदा देकर न केवल मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम के प्रति अपनी आस्था का इजहार किया, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी आइना दिखा दिया, जिन्होंने आज तक मुलायम राज में कारसेवकों पर चलाई गई गोलियों की लिए जनता से माफी मांगना जरूरी नहीं समझा।

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गौरतलब है कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने रामलला के मंदिर निर्माण के लिए धन संग्रह का अभियान चला रखा है। इसी अभियान में समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव ने भी बड़ा योगदान दिया है। लखनऊ में मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव ने अयोध्या के राम मंदिर निर्माण के लिए 11 लाख रुपया दान देने के साथ ही कहा कि यह दान मैंने स्वेच्छा से किया है। यह (दान) मेरी जिम्मेदारी थी। इसके साथ ही अपर्णा ने यह भी स्पष्ट किया कि यह दान अपने परिवार की तरफ से नहीं दे रही हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए दान देने के बाद मीडिया से रूबरू होते हुए अपर्णा ने कहा कि अतीत कभी भी भविष्य के बराबर नहीं होता है, इसी कारण समझा जाना चाहिए कि मैंने अपनी जिम्मेदारी निभाई है। इसमें मैं अपने परिवार के लिए जिम्मेदारी नहीं निभा सकती। अतीत कभी भी भविष्य के बराबर नहीं होता है।

अपर्णा का अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए दान देना इसलिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि पहले समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और अब उनके पुत्र अखिलेश यादव ने तुष्टिकरण की सियासत के चलते कभी भी राम मंदिर निर्माण का पक्ष नहीं लिया था। अपर्णा के इस कदम से समाजवादी पार्टी आलाकमान दुविधा में नजर आ रहा है। बहरहाल, यह पहला मौका नहीं है जब अपर्णा ने अपने परिवार से अलग राह पकड़ी है। समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ के कैंट विधानसभा क्षेत्र से 2017 में चुनाव लड़ चुकीं अपर्णा उस समय भी चर्चा में रही थीं, जब उन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से बगावत करके जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अपने चचिया ससुर शिवपाल सिंह यादव तथा जौनपुर के मल्हनी से लड़े स्वर्गीय पारसनाथ यादव के लिए वोट मांगे थे। शिवपाल व पारसनाथ यादव तो चुनाव जीते थे, लेकिन अपर्णा यादव को भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी ने चुनाव हरा दिया था।

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इतना ही नहीं अपर्णा पार्टी लाइन से अलग हटकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामों की तारीफ करती रहतीं हैं। इस दौरान उनके निशाने पर अक्सर समाजवादी पार्टी के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी रहते हैं। अपर्णा यादव देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली की बड़ी प्रशंसक हैं। वह कई बार समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ भी टिप्पणी कर चुकी हैं। वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात भी कर चुकी हैं। अपर्णा यादव के पति प्रतीक यादव सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव को छोटे पुत्र हैं। प्रतीक हमेशा सियासत से दूर रहते हैं जबकि अपर्णा को सियासत काफी रास आती है।

-अजय कुमार







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