पंजाब के पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह के खिलाफ केस दर्ज करना पुलिस के मनोबल को गिरायेगा

By राकेश सैन | May 11, 2020

दो दशकों तक आतंकवाद का दंश झेल चुके देश के सीमावर्ती राज्य पंजाब में आतंकवाद को लेकर ही दो समाचार मिले जिसने देश को चिंता में डाल दिया है। अमृतसर पुलिस ने 7 मई को दो नशा तस्करों को गिरफ्तार किया जिनका संबंध खतरनाक जिहादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन से सामने आया। एक अन्य घटना में पंजाब पुलिस के पूर्व प्रमुख सुमेध सिंह सैनी सहित चंडीगढ़ पुलिस के आठ जवानों व अधिकारियों के खिलाफ अपहरण जैसे 29 साल पुराने मामले में केस दर्ज किया है। सुमेध सिंह सैनी पंजाब पुलिस के पूर्व डीजीपी केपीएस गिल की टीम के उन अधिकारियों में शामिल रहे हैं जिन्होंने राज्य में आतंकवाद की विषैली बेल का समूल नाश किया। सैनी जैसे अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज होने से स्वाभाविक है पुलिस बल हतोत्साहित होगा। प्रश्न है कि प्रदेश में एक ओर जहां हिजबुल जैसे आतंकी संगठनों के वायरस विद्यमान हों उस राज्य में आतंकवाद से लड़ने वाले पुलिस अधिकारियों को प्रताड़ित करना कितना उचित है।

 

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जम्मू-कश्मीर के अवंतीपोरा बंकर में मारे गये हिजबुल कमांडर रियाज नायकू ने अपने साथी हिलाल अहमद को पैसा लेने अमृतसर भेजा और वह 25 अप्रैल को पकड़ा गया। हिलाल से 29 लाख रुपए बरामद हुए। यह पैसा उसे अमृतसर के ड्रग्स तस्कर बिक्रम सिंह और मनिंदर सिंह ने दिए। बिक्रम और मनिंदर को पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार किया है। दोनों से 32 लाख रुपए नकद और एक किलो हेरोईन बरामद हुई है। फिलहाल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) मामले की जांच कर रही है। यह कोई पहला अवसर नहीं है जब कश्मीर के जिहादी आतंकवाद से पंजाब के संपर्क सामने आए हों। इससे पहले 18, अक्तूबर 2018 को एक इंस्टीच्यूट के छात्रावास से तीन कश्मीरी छात्रों- जाहिद गुलजार, मोहम्मद इदरिस शाह उर्फ नदीम और युसूफ रफीक भट को गिरफ्तार किया था। यह घटनाएं साफ संकेत हैं कि पंजाब जिहादी आतंकवाद की आग से बचा नहीं बल्कि यहां फैले ड्रग्स कारोबार के चलते यह राज्य आतंकवाद का वित्तपोषक बनता दिखाई दे रहा है।


ऐसे में जहां पुलिस के जवानों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है उसके विपरीत करीब 29 साल पहले एक आईएएस अधिकारी के बेटे बलवंत सिंह मुल्तानी के लापता होने के मामले में 6 मई को पंजाब पुलिस के पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी समेत चंडीगढ़ पुलिस के आठ पूर्व अधिकारियों पर मोहाली में अपहरण का केस दर्ज किया गया है। यह मामला वर्ष 1991 का है, उस समय सुमेध सिंह सैनी चंडीगढ़ में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के पद पर तैनात थे। उस दौरान सैनी पर एक जानलेवा आतंकी हमला हुआ जिसमें उनके चार सुरक्षाकर्मी मारे गए। इस पर पुलिस ने हमले के आरोप में बलवंत सिंह मुल्तानी नामक आरोपी को 11 दिसंबर, 1991 को मोहाली स्थित उसके घर से उठाया। बलवंत सिंह मुल्तानी के भाई पलविंदर सिंह ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि सुमेध सिंह के आदेश पर उसके भाई को सेक्टर-17 चंडीगढ़ में पुलिस थाने ले जाया गया था। इस पर उन्होंने मुल्तानी के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले की काफी लंबी जंग चली। आखिरकार पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर जांच की गई। इसके बाद सीबीआई द्वारा दो जुलाई 2008 को मामला दर्ज किया गया। उच्च न्यायालय के आदेश को सर्वोच्च न्यायाल में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को इस आधार पर रद्द कर दिया कि उच्च न्यायालय की पीठ के पास केस का निपटारा करने के लिए अधिकार क्षेत्र की कमी है। नतीजे के तौर पर सीबीआई की तरफ से इन आदेशों के आधार पर दर्ज प्राथमिकी को केवल तकनीकी आधार पर रद्द किया गया।

 

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सुमेध सिंह सैनी पंजाब के कड़क अफसरों में माने जाते थे। आतंकवाद के दौरान में केपीएस गिल के बाद आतंकियों की हिट लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहकर सुपरकॉप के रूप में सैनी ने पहचान बनाई। पुलिस अधिकारियों व मुलाजिमों के एक वर्ग के पसंदीदा अफसर रहे सैनी की डीजीपी की कुर्सी 2015 में पंजाब में धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी की घटनाओं के चलते छिन गई थी। 1982 बैच के आईपीएस सैनी पूर्व डीजीपी केपीएस गिल के सबसे करीबी अफसरों के रूप में माने जाते थे। वह फिरोजपुर, बटाला, बठिंडा, लुधियाना, रूपनगर व चंडीगढ़ के एसएसपी के रूप में भी रहे। दीनानगर में 2015 में हुए आतंकी हमले के दौरान सैनी ने पंजाब पुलिस की टीम की ओर से ही आतंकियों का सफाया करवाया था। पंजाब पुलिस ने आतंकियों को ढेर करके पूरी दुनिया में शाबाशी हासिल की थी। साल 2002 में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के पहले कार्यकाल में उनके साथ मतभेद होने के बाद सैनी को विभाग में नजरअंदाज करके रखा गया था। कैप्टन के खिलाफ सिटी सेंटर व अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट घोटाले के केस दर्ज करवाने को लेकर भी सैनी कांग्रेसियों के निशाने पर रहे हैं। केवल इतना ही नहीं पंजाब में हुई बेअदबी की घटनाओं को लेकर भी वर्तमान कांग्रेस सरकार ने सैनी को कानूनी दांवपेंच में फंसाने का बहुत प्रयास किया और यह मामला अभी अधर में लटकता आ रहा है।

 

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वैसे तो आतंकवाद के दौर में भी मानवाधिकार, पंथक आधार पर आतंकियों से लोहा ले रहे पंजाब पुलिस के अधिकारियों को प्रताड़ित किया जाता रहा परन्तु आतंकवाद समाप्त होने के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं। राज्य में सक्रिय कट्टरपंथी तत्व पुराने मामलों में सच्ची-झूठी शिकायतें दर्ज करवा कर आज भी इन अधिकारियों पर मानसिक दबाव बनाए हुए हैं। इसी दबाव के चलते एक दशक पहले एक आईपीएस अधिकारी ने रेल गाड़ी के नीचे आकर आत्महत्या कर ली थी। आज भी वो अनेक पुलिस अधिकारी इन शिकायतों के चलते अदालतों के धक्के खा रहे हैं जिन्होंने अपनी व अपने परिजनों की जानें दांव पर लगा कर आतंकवादियों से लोहा लिया था। राज्य की राजनीति इन कट्टरपंथी तत्वों का समय-समय पर अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करती रही है। चाहे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह उक्त अपहरण के मामले में अपनी भूमिका होने से इंकार कर चुके हैं परंतु सभी जानते हैं कि सुमेध सिंह सैनी का उनके साथ छत्तीस का आंकड़ा रहा है। 29 सालों के बाद एक आतंक के संदिग्ध व्यक्ति के अपहरण का मामला दोबारा खुलना इस बात का कहीं न कहीं संकेत देता है कि राज्य में राजनीति की बिसात पर शतरंजी चालें चली जा रही हैं।


-राकेश सैन

 

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