By नीरज कुमार दुबे | Jul 30, 2026
कावेरी जल विवाद एक बार फिर देश की राजनीति और संघीय ढांचे की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर सामने खड़ा है। एक ओर कर्नाटक पानी की कमी और कमजोर मानसून का हवाला देकर तमिलनाडु को पानी छोड़ने से इंकार कर रहा है, तो दूसरी ओर तमिलनाडु अपने वैधानिक हिस्से की मांग को लेकर कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर सक्रिय हो गया है। इसी बीच कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने दोनों राज्यों से अपील की है कि वे आपसी सहमति से एक स्थायी और वैज्ञानिक "डिस्ट्रेस-शेयरिंग फॉर्मूला" तैयार कर उसके सामने रखें, ताकि हर बार संकट के समय टकराव की स्थिति पैदा न हो।
सीडब्ल्यूआरसी ने मौजूदा परिस्थितियों का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद कर्नाटक को 29 जुलाई से अगले 15 दिनों तक प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु की ओर छोड़ने का निर्देश दिया है। समिति के अनुसार यह आंकड़ा केवल अनुमान के आधार पर नहीं बल्कि वर्षा के पैटर्न, कर्नाटक के चार प्रमुख जलाशयों में वास्तविक जल प्रवाह, पिछले 30 वर्षों के औसत आंकड़ों तथा मौसम विभाग के इनपुट को ध्यान में रखकर तय किया गया है।
हालांकि समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि बिलीगुंडलू गेज एवं डिस्चार्ज स्टेशन पर प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी पहुंचाने के लिए कर्नाटक को अपने जलाशयों से लगभग 6,000 से 6,500 क्यूसेक पानी छोड़ना पड़ेगा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कृष्णराज सागर और काबिनी बांधों से लेकर बिलीगुंडलू तक का मध्यवर्ती कैचमेंट इस वर्ष लगभग पूरी तरह सूखा पड़ा है। सामान्य वर्षों में यही क्षेत्र औसतन 80 टीएमसी अतिरिक्त जल उपलब्ध कराता है, लेकिन इस बार जुलाई में वहां से लगभग कोई योगदान नहीं मिला।
आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। समिति के अनुसार कर्नाटक के जलाशयों में शुद्ध जल प्रवाह दीर्घकालिक औसत की तुलना में करीब 60 प्रतिशत कम है, जबकि बिलीगुंडलू पर जल प्रवाह में लगभग 90 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। वहां कई दिनों तक केवल 150 से 200 क्यूसेक पानी ही पहुंच रहा है। 27 जुलाई तक बिलीगुंडलू में केवल 0.6 टीएमसी पानी दर्ज हुआ, जबकि न्यायाधिकरण के आदेश के अनुसार इस अवधि तक 27.2 टीएमसी पानी पहुंचना चाहिए था। एक जून से 27 जुलाई के बीच कुल 36.4 टीएमसी के मुकाबले केवल 3.6 टीएमसी पानी ही पहुंचा, जिससे लगभग 33 टीएमसी का संचयी घाटा पैदा हो गया। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करने के बाद सीडब्ल्यूआरसी ने वास्तविक प्रभावी घाटा 9.8 टीएमसी माना और उसमें से 50 प्रतिशत यानी लगभग 4.5 टीएमसी पानी अगले 15 दिनों में उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
उधर कर्नाटक सरकार ने इस आदेश को मानने की बजाय चुनौती देने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने घोषणा की कि राज्य 54वीं आपात बैठक में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के समक्ष सीडब्ल्यूआरसी के आदेश के खिलाफ औपचारिक अपील करेगा। उन्होंने कहा कि राज्य के महाधिवक्ता, कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया है। शिवकुमार का तर्क है कि जब राज्य में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है और जलाशयों में पानी की भारी कमी है, तब भी पानी छोड़ने का निर्देश व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने दावा किया कि तमिलनाडु की मांग पहले भी दो बार अस्वीकार की जा चुकी है और इस बार भी कर्नाटक अपने अधिकारों की मजबूती से पैरवी करेगा।
राजनीतिक स्तर पर भी विवाद लगातार गहराता जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय 3 अगस्त को बेंगलुरु जाकर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात करने वाले हैं। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि यदि कर्नाटक को सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत वर्षा और जल प्रवाह मिला है तो उसे तमिलनाडु के निर्धारित हिस्से का भी कम से कम 40 प्रतिशत पानी प्रोराटा आधार पर छोड़ना चाहिए। बैठक में मेकेदातु परियोजना का मुद्दा भी उठाया जाएगा। हालांकि राज्य की विपक्षी पार्टियों डीएमके, एआईएडीएमके और पीएमके ने इस द्विपक्षीय वार्ता का विरोध किया है। उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय और कावेरी न्यायाधिकरण के स्पष्ट आदेश मौजूद हैं, ऐसे में बातचीत के जरिए समाधान खोजने की कोशिश तमिलनाडु की कानूनी स्थिति को कमजोर कर सकती है। विपक्ष ने 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्रियों जे. जयललिता और जगदीश शेट्टर के बीच हुई असफल वार्ता का हवाला देते हुए इस बैठक की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए हैं।
दूसरी ओर कर्नाटक ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय को कावेरी बेसिन का हवाई दौरा करने का निमंत्रण देते हुए कहा है कि वे स्वयं वहां की वास्तविक स्थिति देखें। मुख्यमंत्री शिवकुमार ने यहां तक कहा कि राज्य सरकार हेलीकॉप्टर की व्यवस्था भी करेगी ताकि तमिलनाडु को मौजूदा जल संकट की गंभीरता का प्रत्यक्ष अनुभव हो सके।
फिलहाल नजरें सीडब्ल्यूएमए की आपात बैठक और 3 अगस्त को प्रस्तावित दोनों मुख्यमंत्रियों की मुलाकात पर टिकी हैं। यदि कानूनी लड़ाई और राजनीतिक टकराव के बीच कोई साझा वैज्ञानिक फार्मूला विकसित नहीं हो पाया तो कावेरी का यह पुराना विवाद एक बार फिर न्यायालय, केंद्र सरकार और दोनों राज्यों के बीच नए संवैधानिक एवं राजनीतिक संघर्ष का कारण बन सकता है।