जश्न मनाओ कि सब ठीक है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 06, 2021

माहौल ठीक हो तो हम जश्न मनाकर अपनी पुरानी संस्कृति संजोए रखने का पुण्य कार्य लगातार कर सकते हैं। वातावरण का पर्यावरण ठीक कर दिया गया है तभी तो चारों तरफ बहार का आलम है। कर्ज़ लेने की नहीं, कर्ज़ ज़्यादा देने की समृद्ध होती परम्परा ने इसमें खूब इजाफा किया है। जीने और खाने के लिए धन ही तो चाहिए, जश्न की तमन्ना तो तन और मन खुद जवां रखते हैं। एक बार क़र्ज़ मिल जाए तो अगला क़र्ज़ लेकर भूल जाने की योग्यता समृद्ध हो जाती है और पूरे माहौल पर इसका असर सकारात्मक रहता है। यह ऐतिहासिक खुशखबर है कि मुफ्त का क़र्ज़ देने वाला राजा लौट आया है, तभी रथ है और रथ यात्राएं हैं। राजा की पसंद के रंग के वस्त्र पहने, संतुष्ट जनता हाथ उठाकर स्वागत कर रही है, विजय पताकाएं लहरा रही हैं। जीवन मनोरंजन हुआ जाता है। 

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लोकतंत्र, तंत्र से निरंतर जूझने का उत्सव मनाने में अस्त व्यस्त है। ज़िम्मेदारी अपनी जान बचाने के लिए सबसे हाथ छुड़ा कर भाग गई है। न्याय, ज़रूरत के मेले में गुमसुम सा, खुद के साथ न्याय करने की कोशिश में बढ़िया वकील ढूंढ रहा है, इत्तफाक से उसके पास पैसे की कमी है। वजीरों द्वारा, वक़्त आराम से गुजारना भी तो एक टशन है। यह हमेशा की तरह भुगतान लेकर जश्न मनाने की सफल जुगत है। जिनका कर्तव्य राजा को जगाना हो अगर वही उदासी का नृत्य करने लगें तो जश्न अनेक बार असफल हो जाता है। सच बोलने और पारदर्शिता बनाए रखने वालों से बचकर सचाई और पारदर्शिता अपना बीज बचाने के लिए कहीं अनजान गुफा में तपस्या लीन हो चुकी है। अध्यात्म उसका पहरेदार हो गया है। दूसरों की सुरक्षा के वस्त्र पहनने वाले अपने शरीर की संतुष्टि में गिरफ्तार होकर फरार हैं। शांति हवन के आस पास, सच बोलने की तैयारी करना या बोलने की हिम्मत करने जैसा खतरा कुछ भी अप्रत्याशित हो जाने के डर से कतरा रहा है। इस स्थिति को भी जश्न मानते हुए व्यवसाय जुगाड़ कर रहा है कि उसका महंगा सामान बाज़ार में बिकता रहे। विकासजी के राज्य में आनंद हैं आओ जश्न जारी रखें।

- संतोष उत्सुक 

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