By अभिनय आकाश | May 11, 2026
90 के दशक का दौरा और गुवाहाटी का कॉटन कॉलेज। वकालत पढ़ रहे 22 साल के लड़के से उसकी दोस्त ने पूछा कि मैं अपनी मां से तुम्हारे बारे में क्या बताऊं? उस छात्र नेता ने जवाब दिया, अपनी मां से कहना, मैं एक दिन असम का मुख्यमंत्री बनूंगा। मुख्यमंत्री बनना उस लड़के की महत्वाकांक्षा थी और इसे खुलकर जाहिर करने की उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। इसी लड़के की जो छात्र राजनीति के दौर से ही चुनाव मैनेज करने का एक्सपर्ट था। जिसे तीन-तीन मुख्यंत्रियों का सीधा संरक्षण प्राप्त था और हर कोई उसके रणनीतिक कौशल का मुरीद था जो 15 साल तक राज्य की सत्ता में नंबर दो रहा और जब नंबर एक बनने की बारी आई तो मुख्यमंत्री ने अपना बेटा आगे कर दिया। जब उस नेता ने गुवाहाटी से लेकर दिल्ली तक विधायकों की परेड करा दी और बताया कि यह सरकार उसने बनाई है तो पार्टी में शीश पर बैठे नंबर दो की हैसियत रखने वाले नेता ने वीटो लगा दिया और कहा तो क्या इंतजार पार्टी बदलने पर भी खत्म नहीं हुआ। अगले 5 साल फिर से नंबर दो की ही कुर्सी रही। लेकिन जब वो आया तो अपनी ही नहीं अगल-बगल की छह सात राज्यों की राजनीति बदल कर रख दी। उस पर सांप्रदायिक राजनीति के आरोप हैं। भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। आरोप एक नेता की हत्या और प्रतिबंधित संगठन उल्फा के लिए वसूली के भी लगे लेकिन कभी साबित नहीं हो पाए। पश्चिम बंगाल में पहली बार शुभेंदु अधिकारी के रूप में बीजेपी को अपना डेब्यू मुख्यमंत्री मिल गया। ममता बनर्जी को पिछले चुनाव में नंदीग्राम से शिकस्त देने वाले अधिकारी ने इस बार टीएमसी सुप्रीमो के गढ़ भबानीपुर में जाकर उन्हें हराया और जायंट किलर का तमगा पाया। लेकिन इसके साथ ही एक और राज्य में बीजेपी ने वो करिश्मा कर दिखाया जिसे पूरा करना सालों पहले तक बहुत मुश्किल लगता था। जिस नॉर्थ ईस्ट में कभी बीजेपी का झंडा ढूंढना मुश्किल था, आज वहां भगवा लहर दिख रही है। ये मोदी लहर नहीं क्योंकि यह कहना इस कहानी को फिर छोटा करना होगा। यह कहानी है हेमंता विश्व शर्मा की जिन्हें आप नॉर्थ ईस्ट का चाणक्य भी कह सकते हैं।
असम पूर्वोत्तर में भारत का सबसे बड़ा राज्य आजादी के बाद से ही घुसपैठ और अवैध प्रवास से जूझ रहा है। बंटवारे के वक्त पूर्वी पाकिस्तान से लाखों बंगाली शरणार्थी असम में घुसे। यह शरणार्थी चाय बागान, जंगल, बंजर जमीन पर बसते गए और स्थाई होते गए और इससे स्थानीय असमिया लोगों को अपनी भाषा, रोजगार, जमीन पर कब्जे का खतरा महसूस हुआ। 1960 में एसएमीस को राजकीय भाषा बनाने का कानून बना तो बंगाली इलाकों में बवाल शुरू हो गया। दंगे हुए। यहीं से असम के नौजवानों के मन में एक सवाल उठा। क्या असम के लोग अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएंगे? फिर आया 1971 बांग्लादेश बना। फिर से लाखों की संख्या में शरणार्थी असम आ गए। युद्ध खत्म हुआ पर ज्यादातर लोग वापस नहीं गए। अचानक से कई जिलों में बांग्ला भाषियों की संख्या बढ़ गई। 1979 में मंगलदोई लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए। वोटर लिस्ट आई तो बवाल शुरू हो गया। करीब 45,000 से ज्यादा अवैध प्रवासियों के नाम वोटर लिस्ट में दर्ज थे। यहीं से बाियों को असम से निकालने के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई। नारा था जोकर जति तेकर मत जिसकी जमीन उसी का वोट और दूसरा नारा लगा विदेशी खेदा यानी विदेशियों को भगाओ। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू और अखिल असमगढ़ संग्राम परिषद यानी एएजीएसपी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन शुरुआत में अहिंसक था। बाद में यह हिंसक हो गया। आंदोलन का नेतृत्व प्रफुल कुमार महंत और भृगु फुकन जैसे छात्र नेता कर रहे थे। इन्हें पूरे असम के अलग-अलग कॉलेजों के छात्र संघों का समर्थन था। यह वो लड़के थे जो अभी कॉलेज में पढ़ रहे थे। लेकिन रातोंरात पूरे असम के हीरो बन गए। 1979 से 1985 छ साल तक असम में अस्थिरता रही। बंद धरना प्रदर्शन से लेकर रेल रोको आंदोलन और तेल कुओं पर हमले तक हुए। पुलिस की गोलियों से लगभग 850 से ज्यादा छात्र नेताओं की जान गई। फरवरी 1983 में हुए नीली और खराबारी नरसंहारों में 2000 से ज्यादा लोग मारे गए। जिसके बाद 1985 में असम अकॉर्ड हुआ। 15 अगस्त 1985 को राजीव गांधी ने भृगुफन और प्रफुल महंत और विराज शर्मा जैसे छात्र नेताओं के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। आंदोलन रुका। आसू के नेताओं ने असम गण परिषद नाम से पार्टी बनाई और चुनावी राजनीति में उतर गए। 1985 में हुए चुनावों में एजीपी ने 67 सीटें जीतकर कमाल कर दिया। छात्रों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। कॉटन कॉलेज के छात्र नेता रहे प्रफुल महंत असम के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने और भृगुफन गृह मंत्री। यह वो दौर था जब असम की राजनीति पूरी तरह से छात्र नेताओं के हाथ में थी। और 70 के दशक से ही कॉटन कॉलेज स्टूडेंट यूनियन की आंसू यूनिट को सबसे ताकतवर और प्रतिष्ठित यूनिट माना जाता था। कॉटन कॉलेज पूर्वोत्तर का सबसे पुराना हायर एजुकेशन इंस्टट्यूट। गुवाहाटी शहर के बीचों-बीच बसे इस पुराने से कैंपस को बाहर से देखो तो लगता है जैसे ब्रिटिश काल में बने किसी किले का अवशेष हो। लेकिन अंदर घुसो तो पेड़ों की छांव, लाल ईंटों की इमारतें और एक हवा है जो किताबों और राजनीति की खुशबू से भरी है। कॉटन कॉलेज का असम की राजनीति में कितना दखल है? इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक असम के जो 15 मुख्यमंत्री हुए हैं उनमें से सात इसी कॉलेज के छात्र रहे हैं।
19 साल का यह खास मेहमान चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। हॉस्टल के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक की चर्चाओं का हिस्सा हुआ करता था। एक तेजतर्रार लड़का जो दबंग था और भाषण देने में फायर ब्रांड था। चुनाव से पहले अक्सर डीएस कॉलेज के रूम नंबर 20 में वह रुकता था ताकि हॉस्टल के इन मेट्स को अपने साथ जोड़कर रख सके। यह लड़का क्लास खत्म होने के बाद घर लौटने की बजाय हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के साथ घूमना शुरू कर देता था क्योंकि उसे पता था कि अगर कॉलेज की राजनीति में अपना बेस मजबूत करना है तो सबसे पहले हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स के बीच अपनी पैठ मजबूत करनी होगी। जल्द ही डीएस हॉस्टल का कमरा नंबर 20 छात्र संघ चुनाव के हाई वोल्टेज वॉर रूम में तब्दील हो गया क्योंकि खास मेहमान छात्र संघ के सबसे प्रभावशाली पद महासचिव के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहा था। यह दावेदारी राज्य में सबसे ताकतवर संगठन माने जाने वाले आंसू से थी। कॉटन कॉलेज का महासचिव बनना पूरे राज्य में छात्र नेतृत्व और बाद में मुख्यधारा की राजनीति के लिए सबसे बड़ा लॉन्चपैड माना जाता था और इस चुनाव को जीतने के लिए यह महत्वाकांक्षी खास मेहमान कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था। वह जब भी भाषण देता तो हॉल के हर कोने में अपने लोगों को बिठाता ताकि तालियों और नारों की गूंज हर कोने से आए। हॉस्टल में हेमंता दा के नाम से लोकप्रिय यह युवा अब कॉटन कॉलेज छात्र संघ का महासचिव था। पूरा नाम हेमंता विश्व शर्मा। 1994 में हेमंता को छात्र और युवा कल्याण सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया। 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें भृगुफ फूंकन के मुकाबले जालक कुबारी सीट से उतार दिया। हेमंता पहला चुनाव हार गए, लेकिन यह पहली और आखिरी हार थी। चुनाव में हार के बाद हेमंता प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिलने गए। नरसिम्हा राव ने उन्हें एक सलाह दी। हारे हुए उम्मीदवार को अपना क्षेत्र कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हेमंता ने इसे पूरी गंभीरता से लिया। हारने के बावजूद जालकुबारी विधानसभा में सक्रिय रहे। 2001 में कांग्रेस ने उन्हें फिर से गुवाहाटी की जालकुबारी सीट से टिकट दिया। इस बार हेमंता ने अपने गुरु और दिग्गज नेता भृगुफ फुकन को हराकर उलटफेर कर दिया। इस तरह वो पहली बार विधानसभा पहुंचे और जालकुबारी सीट उनका स्थाई ठिकाना बन गई। 2001 से 2021 तक वह लगातार पांच बार जालक कुबारी सीट से विधायक चुने जा चुके हैं और मार्जिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पहला चुनाव 10,000 वोटों से जीतने वाले हेमंता 2021 में 1,000 वोटों से जीते।
दरअसल, 2026 के नतीजों से क्योंकि असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे केवल आंकड़ों के खेल नहीं है। यह हेमंता की उस कार्यशैली की जीत है जिसने विपक्ष को पूरी तरह अप्रसंगिक बना दिया। बीजेपी और उनके सहयोगी ने असम की 126 में से 101 सीटें जीती। लगातार तीसरी बार सत्ता। अपने दम पर बीजेपी 82 सीटें हासिल कर रही। डाटा कहता है कि कांग्रेस का वोट शेयर उन इलाकों में भी गिरा जहां पर उनके मजबूत गढ़ थे। हेमंता की जीत का सबसे बड़ा आधार अपर असम और लोअर असम के वो इलाके जहां डेमोग्राफिक बदलाव की वजह से स्थानीय लोगों में डर था। उन्होंने खुद को उस डर का एकमात्र ठोस समाधान बनाकर पेश किया। यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि हेमंता ने इसे केवल हिंदुत्व के मुद्दे पर नहीं बल्कि काम की राजनीति पर लड़ा और खुलकर कहा कि मुझे मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए। उनके कई इंटरव्यूज वायरल हुए जहां पूछा गया कि मोदी जी हिंदू मुसलमान नहीं करते तो वो कहते हैं हम तो करते हैं। 2026 के नतीजों ने साबित किया कि असम की जनता पुराने सुस्त शासन की जगह एक ऐसी सरकार चाहती है जो बेबाक है, बिंदास है। स्पष्ट है। जैसा भी है। रिकॉर्ड कहते हैं कि असम के ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की पैठ पहले से मजबूत हुई। महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हेमंता के पक्ष में वोट दिया और इसी वजह से बीजेपी की हैट्रिक हुई। अब असम की राजनीति में कांग्रेस के लिए वापसी का रास्ता लगभग बंद है क्योंकि हेमंता ने उनके पूरे स्ट्रक्चर को ही ध्वस्त कर दिया और एक ऐसा किला तैयार किया है जिसे अगले कुछ सालों में तो भेजना बड़ा मुश्किल है।
राहुल गांधी और उनके कुत्ते पिद्दी से जुड़ा वो चर्चित किस्सा जो अक्सर सुर्खियों में रहा। वो एक किस्सा था लेकिन असली कहानी उस जिद्दी सोच की है जिसने हेमंता को फॉलोअर्स से हटाकर किंग मेकर बना दिया। नॉर्थ ईस्ट में आज चारों तरफ भगवा ही भगवा फैला दिया। दुनिया अक्सर यह मानती है कि हेमंता ने केवल सत्ता की चाहत में पाला बदला। उन पर कुछ मुकदमे चल रहे थे। सारी बातें लेकिन एक बड़ी हकीकत उस मुलाकात में छिपी है जिसने भारतीय राजनीति का रुख बदला। यह मुलाकात जिसके बारे में हेमंता ने खुद बताया। 2015 की मुलाकात जो दिल्ली में राहुल गांधी के साथ हुई जो स्वाभिमान की चोट का बड़ा कारण बनी। हेमंता ने कई बार साझिक तौर पर बताया कि जब वह असम की समस्याओं को लेकर पार्टी की गिरती साख को लेकर चर्चा करने दिल्ली पहुंचे तब राहुल गांधी अपने पालतू कुत्ते पिद्दी को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे। अब आलोचक इसे व्यक्तिगत नाराजगी या एक छोटी सी घटना बताते हैं। लेकिन गहराई से देखें तो यह कांग्रेस की उस हाई कमांड संस्कृति का प्रतीक है। जहां जमीन के बड़े नेताओं की तुलना में दरबारी वफादारी को ज्यादा अहमियत दी जाती है। हेमंता ने शायद समझा कि जिस पार्टी में राज्य के मुद्दों से ज्यादा प्राथमिकता एक पालतू जानवर को दी जाए वहां रुकना उनके वजूद के खिलाफ होगा और यह घटना कांग्रेस के लिए घातक साबित हुई क्योंकि हेमंता ने सिर्फ पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि उत्तर पूर्व से कांग्रेस का नामोनिशान मिटा दिया। यह उस पिद्दी के बदले जिद्दी सोच की शुरुआत थी जिसने फॉलोअ को पूरे पूर्वोत्तर किंग मेकर बनाया और आज 2026 के नतीजे उस तिरस्कार का अंतिम न्याय बनकर सामने खड़े हैं।
बता दें कि लाचित वही महानायक थे जिन्होंने मुगलों को सराय घाट की लड़ाई में शिकस्त दी थी। असम की रक्षा की थी। हेमंता ने खुद को इसी सांस्कृतिक रक्षक की भूमिका में बड़ी सफाई से ढाला। लाचित की विरासत को राजनीतिक हथियार बनाने में हेमंता ऐसे सफल रहे क्योंकि सांस्कृतिक गौरव को विकास के एजेंडे के साथ बड़ी कुशलता से जोड़ा। अनधिकृत घुसपैठ और तेजी से बदलते डेमोग्राफिक बदलावों को रोकने के लिए जो कड़े फैसले लिए उसने लाचित की रक्षात्मक विरासत के साथ जोड़ दिया। विपक्ष ने जब बार-बार हेमंता पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया तो हेमंता ने उसे बहुत ही चतुराई से असमिया अस्मिता की रक्षा बताकर पलट दिया। उनका साफ कहना रहा कि असम की डेमोग्राफी को बदलने के लिए किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा क्योंकि यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं बल्कि जड़ों और पहचान की सुरक्षा का सवाल है।