राष्ट्रीय राजनीतिक नफ़ा के फेर में प्रदेश की राजनीति से भी हुए सफ़ा

By अभिनय आकाश | May 24, 2019

हिन्दी में एक मशहूर कहावत है 'ना घर के रहे ना घाट के', एग्जिट पोल के बाद से राष्ट्रीय राजनीति में एक्टिव मोड के साथ भाजपा के खिलाफ ‘मिशन सरकार’ को अंजाम देने की कवायद में लगे चंद्रबाबू नायडू पर यह एकदम सटीक बैठती है। लोकसभा चुनाव में जहां आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलगु देशम पार्टी को बुरी हार मिली है वहीं राज्य में उनकी सत्ता भी हाथ से तली गई। अपने पद यात्रा से विधानसभा और लोकसभा चुनाव में सफलता के शिखर नापने वाले जगनमोहन रेड्डी ने एकतरफ़ा जीत हासिल कर आंध्र प्रदेश की राजनीति में इतिहास बनाया। प्रदेश की 175 में से 149 सीटों पर वाईएसआर कांग्रेस जीत हासिल की है। वहीं तेलगु देशम के खाते में सिर्फ़ 25 सीटें ही आईं। तेदेपा की हार का आलम यह रहा कि चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश भी पराजित हो गए। नायडू ने लोकेश को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किया था लेकिन मंगलागिरि विधानसभा क्षेत्र में अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। ये तो हुई विधानसभा की बात लेकिन किंगमेकर बनने की चाह लिए देशभर में परिक्रमा कर नेताओं के मंथन से मोदी की काट ढूंढ़ने वाले नायडू को आंध्र प्रदेश की जनता ने लोकसभा चुनाव में भी निराश कर दिया। देश की राजनीति में सत्ता की चाबी अपने पास रखने की चाह लिए चंद्रबाबू, जगन मोहन की आंधी और सत्ता विरोधी लहर में प्रदेश की राजनीति से भी हवा हो गए। लोकसभा चुनाव 2014 में 15 सीटें जीतने वाली तेलगू देशम पार्टी 2019 के चुनाव में 3 सीटों पर आ गई। 

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तेलगू देशम पार्टी की हार में नायडू की कुछ गलतियां जिम्मेदार बनीं। राजधानी हैदराबाद का खोना आंध्र के लोगों को नहीं भाया, 2014 में तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का दोषी आंध्र प्रदेश के लोग चंद्रबाबू को मानते हैं। विभाजन से पूर्व के आंध्र प्रदेश का 70 प्रतिशत राजस्व तेलंगाना से आता था। इसके अलावा चार साल से ज्यादा समय तक राजग सरकार का हिस्सा रह सियासत की मलाई खाने और चुनाव से पहले विशेष राज्य के मुद्दे पर साथ छोड़ने की राजनीति चंद्रबाबू पर उल्टी पड़ गई। रही सही कसर जगन मोहन द्वार पिता की तर्ज पर पूरे प्रदेश में 25 हजार किमी से ज्यादा की पदयात्रा और लोगों के बीच रहकर प्रचार करने के तरीके ने पूरी कर दी।

नतीजे आने से पहले क्या दिल्ली क्या लखनऊ और क्या कोलकाता मोदी विरोधी खेमाबंदी की चाह में ममता के आंगने से लेकर अखिलेश, मायावती और पवार के दरवाजे तक दस्तक दे दी।

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कांग्रेस के समर्थन के सहारे अलग गठबंधन की सियासत चलाने चले नायडू इस चुनाव में खुद किनारे लग गए। दरअसल, नायडू को उम्मीद थी कि नतीजों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बहुमत से दूर रह जाएगा। जिसके बाद वो मोदी विरोध के नाम पर सभी को साध कर सियासी चाणक्य की भूमिका निभाएंगे। लेकिन मोदी की सुनामी से उठती लहर में चंद्रबाबू नायडू के अरमान बह गए और किंगमेकर बनने के ख्वाब अधूरे रह गए। शेष कार्य विधानसभा चुनाव में जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस ने कर दिया।

बहरहाल, आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने के बाद अब नायडू के सामने यह स्थिति हो गई कि न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए। हार से निराश नायडू यह सोच रहे होंगे कि काश मोदी नाम की नैया पर सवार होते तो राजनीतिक कश्ती इतनी बेगैरत ढंग से न डूबती।

- अभिनय आकाश

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