By नीरज कुमार दुबे | Jan 13, 2026
भारत चीन संबंधों में एक बार फिर तनाव का पारा तेजी से चढ़ गया है। इस बार मुद्दा है शक्सगाम घाटी। चीन ने न केवल इस क्षेत्र पर अपना दावा खुलकर दोहराया है बल्कि वहां चल रहे निर्माण कार्यों को पूरी तरह जायज ठहराते हुए भारत की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है। यह बयान भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को सीधी चुनौती है। दरअसल, चीन का यह रुख उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह सीमा विवादों को जमीन पर तथ्य बनाकर स्थापित करना चाहता है। सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे के नाम पर चीन धीरे धीरे अपने सैन्य और रणनीतिक दबाव को बढ़ा रहा है। शक्सगाम घाटी में निर्माण को सही ठहराकर बीजिंग ने यह साफ कर दिया है कि वह भारत की संवेदनशीलता को कोई महत्व नहीं देता।
चीन का कहना है कि शक्सगाम घाटी उसका हिस्सा है और वहां किया जा रहा निर्माण पूरी तरह वैध है। उसके अनुसार यह क्षेत्र चीन और पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते के अंतर्गत आता है और वहां के विकास कार्य स्थानीय आबादी के हित में हैं। हम आपको बता दें कि चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने भारत की आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि जिस क्षेत्र का उल्लेख किया जा रहा है, वह चीन का ही हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस इलाके में बुनियादी ढांचे का निर्माण चीन द्वारा अपने ही क्षेत्र में किया जा रहा है और यह पूरी तरह वैध तथा उचित है। प्रवक्ता ने कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक में एक सीमा समझौता किया था, जिसके तहत दोनों देशों के बीच सीमा तय की गई थी और यह दो संप्रभु देशों का आंतरिक मामला है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और उक्त सीमा समझौता कश्मीर मुद्दे पर चीन के रुख को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करते और इस विषय पर चीन की स्थिति लगातार एक-सी रही है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का प्रश्न एक ऐतिहासिक विवाद है, जिसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों और भारत-पाकिस्तान के बीच हुए द्विपक्षीय समझौतों के अनुरूप शांतिपूर्ण और उचित तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।
चीनी प्रवक्ता ने जो तर्क दिये वो हमने आपको बताया लेकिन इस तर्क के पीछे छिपा असली मकसद साफ दिखाई देता है। दरअसल, शक्सगाम घाटी में सड़क और अन्य ढांचे का निर्माण चीन को काराकोरम क्षेत्र में तेज सैन्य आवाजाही की क्षमता देता है। यह इलाका सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख के बेहद करीब है। यहां मजबूत उपस्थिति का अर्थ है भारत पर रणनीतिक दबाव बढ़ाना और पाकिस्तान के साथ मिलकर एक संयुक्त मोर्चा तैयार करना।
हम आपको बता दें कि भारत ने चीन के इस दावे को पूरी तरह अवैध और अस्वीकार्य बताया है। भारत का स्पष्ट रुख है कि शक्सगाम घाटी जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा है और उस पर किसी भी तरह का चीनी दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत ने यह भी दोहराया है कि पाकिस्तान को इस क्षेत्र को किसी तीसरे देश को सौंपने का कोई अधिकार नहीं था। भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान और चीन के बीच हुआ तथाकथित सीमा समझौता शुरू से ही अवैध रहा है। भारत ने ऐसे सभी प्रोजेक्ट्स को भी खारिज किया है जो उसके क्षेत्र से होकर गुजरते हैं और उसकी सहमति के बिना चलाए जा रहे हैं।
देखा जाये तो भारत की यह प्रतिक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संदेश देती है कि भारत अब केवल कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भारत अपने हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाने को तैयार है।
आखिर क्या है शक्सगाम घाटी विवाद? यदि इसकी बात करें तो आपको बता दें कि शक्सगाम घाटी काराकोरम पर्वत श्रृंखला के उत्तर में स्थित एक ऊंचाई वाला और रणनीतिक रूप से बेहद अहम क्षेत्र है। यह इलाका पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का हिस्सा माना जाता है जिस पर भारत ने हमेशा दावा किया है। वर्ष 1963 में पाकिस्तान ने इस घाटी का एक बड़ा हिस्सा चीन को सौंप दिया था। भारत ने इस कदम को कभी मान्यता नहीं दी क्योंकि यह क्षेत्र भारत का है और पाकिस्तान वहां केवल अवैध कब्जेदार था। इस समझौते के बाद से ही चीन धीरे धीरे इस इलाके में अपनी मौजूदगी मजबूत करता गया। पहले सीमित गश्त फिर सर्वे और अब बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य।
इस घाटी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह सियाचिन ग्लेशियर के नजदीक है। सियाचिन पहले से ही दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है और वहां किसी भी तरह का संतुलन बिगड़ना भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
देखा जाये तो शक्सगाम घाटी में चीन की सक्रियता का सीधा असर भारत की उत्तरी सीमाओं पर पड़ता है। यदि चीन और पाकिस्तान इस क्षेत्र में संयुक्त सैन्य तालमेल बढ़ाते हैं तो भारत को दो मोर्चों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। यह केवल सैन्य चुनौती नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक संकट है। यह क्षेत्र भविष्य में ऊर्जा मार्गों व्यापारिक रास्तों और सामरिक कनेक्टिविटी का केंद्र भी बन सकता है। चीन इस इलाके का उपयोग अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने और दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को सीमित करने के लिए करना चाहता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि शक्सगाम घाटी का मुद्दा भारत के लिए चेतावनी है। यह याद दिलाता है कि चीन केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता बल्कि जमीन पर हालात बदलने में विश्वास करता है। निर्माण के नाम पर किया जा रहा यह विस्तार असल में भारत की सीमाओं को चुनौती देने की रणनीति है। यह केवल एक घाटी की बात नहीं बल्कि देश की संप्रभुता आत्मसम्मान और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। शक्सगाम घाटी पर स्पष्ट और निर्णायक नीति ही भारत को आने वाले भू राजनीतिक तूफानों में मजबूती से खड़ा रख सकती है।
हम आपको यह भी बता दें कि चीनी प्रवक्ता के बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि मोदी सरकार की विदेश नीति वेंटिलेटर पर पड़ी है। पार्टी ने एक्स पर सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि अब चीन ने जम्मू-कश्मीर की शक्सगाम घाटी को अपना बताया है। ''चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा- शक्सगाम घाटी चीन का इलाका है, यहां बुनियादी ढांचा बनाना गलत नहीं है।'' कांग्रेस ने पूछा है कि मोदी जी 'लाल आंख' का क्या हुआ?