Tibet Flood Coverage: चीन पर सोशल मीडिया और विदेशी मीडिया की सूचना नियंत्रित करने के आरोप

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 02, 2026

(वेनिंग सुन, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी) सिडनी, दो सितंबर (द कन्वरसेशन) नेपाल और तिब्बत में विनाशकारी बाढ़ के बाद राहत एवं बचाव अभियान जारी रहने के बीच सोशल मीडिया पर इस आपदा की रिपोर्टिंग को लेकर चीन पर सूचना नियंत्रित करने के आरोप तेज हो गए हैं। यह विवाद बीबीसी की चीन संवाददाता लॉरा बिकर की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ। उन्होंने कहा था कि चीन-तिब्बत सीमा पर जिरोंग बंदरगाह को भूस्खलन और बाढ़ की तेज लहर में समाते दिखाने वाले वीडियो इंटरनेट से हटा दिए गए।

चीन की सरकार लंबे समय से तिब्बत से जुड़ी खबरों में पश्चिमी मीडिया के कथित ‘‘पूर्वाग्रह’’ की आलोचना करती रही है। इस सप्ताह सोशल मीडिया पर उसके समर्थकों ने बीबीसी को निशाना बनाते हुए इस दावे को फिर जोरदार तरीके से उठाया। हालांकि, चीन के अंदर और बाहर रहने वाले चीनी सोशल मीडिया उपयोगकर्ता भी लंबे समय से सूचना पर सरकारी नियंत्रण का सामना करते रहे हैं।

बाढ़ के बाद जिरोंग बंदरगाह को पानी और कीचड़ की विशाल लहर में समाते दिखाने वाले वीडियो वीशिन और रेडनोट जैसे मंचों पर प्रसारित हुए, लेकिन बाद में उपयोगकर्ता उन्हें देख नहीं पाए। स्वतंत्र और विदेशी पत्रकारों के लिए आपदा प्रभावित क्षेत्र तक सीमित पहुंच भी सूचना नियंत्रण का एक प्रमुख मुद्दा रही। ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन की पत्रकार एलिसन हॉर्न ने कहा कि उन्होंने तिब्बत की यात्रा की अनुमति के लिए कई बार अनुरोध किया, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं मिली।

अन्य विदेशी पत्रकारों को भी इसी तरह रोके जाने की खबरें हैं। इससे विदेशी मीडिया के लिए चीन सरकार द्वारा पेश किए गए घटनाक्रम के विवरण और मृतकों की संख्या की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल हो गया है। स्वतंत्र रिपोर्टिंग के अभाव और सोशल मीडिया से फुटेज हटाए जाने के कारण सरकारी मीडिया को घटनाक्रम का अपना पक्ष प्रमुखता से रखने का मौका मिला है।

चीन के सरकारी मीडिया में तिब्बत की बाढ़ की कवरेज मुख्य रूप से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बचाव अभियानों, राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेतृत्व और प्रधानमंत्री ली क्विंग के आपदा प्रभावित क्षेत्र के दौरे पर केंद्रित रही। सड़कों को फिर से खोलने और प्रभावित लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाने के प्रयासों को भी प्रमुखता दी गई। इसके विपरीत, स्थानीय ग्रामीणों, उनके घरों और समुदायों पर आपदा के असर की अपेक्षाकृत कम रिपोर्टिंग हुई।

नेपाल की ओर विदेशी पत्रकारों को प्रभावित लोगों से बिना प्रतिबंध बातचीत करने की अनुमति मिली। चीन में आपदा के दौरान ‘‘सकारात्मक खबरों’’ पर जोर देने की नीति नई नहीं है। 2008 में सिचुआन में आए भीषण भूकंप के बाद सरकारी मीडिया ने शुरुआती दौर में व्यापक और अपेक्षाकृत खुली कवरेज की थी।

विदेशी मीडिया ने खराब निर्माण वाले स्कूल भवनों के ढहने और इसके लिए स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाए थे। चीनी मीडिया ने भी शुरुआत में इनमें से कुछ सवालों को जगह दी, लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद सरकार ने स्कूलों के निर्माण से जुड़ी सूचनाओं पर नियंत्रण बढ़ा दिया, क्योंकि उसे आशंका थी कि यह मुद्दा सरकार विरोधी भावना को बढ़ा सकता है। देश में 2011 की वेनझोउ रेल दुर्घटना के दौरान भी मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए।

पत्रकारों को घटनास्थल पर जाने, दुर्घटना के कारणों की जांच करने और इसे हाई-स्पीड रेल के विकास से जोड़ने से रोका गया। इसके बजाय उन्हें बहादुरी, त्याग और रक्तदान जैसी ‘‘भावनात्मक’’ कहानियों पर ध्यान देने को कहा गया। शी चिनफिंग के 2012 में सत्ता में आने के बाद सरकार ने मीडिया और सोशल मीडिया पर नियंत्रण और कड़ा कर दिया।

तिब्बत की बाढ़ की मौजूदा कवरेज में भी सीमित पहुंच और सकारात्मक खबरों पर जोर देने की यही प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीनी प्रतिबंधों के कारण पश्चिमी पत्रकारों के लिए घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल हो रहा है। इससे पश्चिम में चीन पर सेंसरशिप और सूचना छिपाने के आरोप मजबूत होते हैं, जबकि बीजिंग इसे तिब्बत पर पश्चिमी मीडिया के कथित पक्षपात के प्रमाण के रूप में देख सकता है।

इस तरह दोनों पक्षों के बीच अविश्वास सूचना पर और अधिक प्रतिबंधों का कारण बन सकता है।

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