Vanakkam Poorvottar: एक Water Bomb भारत के बगल में भी रख रहा है China, Brahmaputra पर बन रहा China Motuo Hydropower Project ला सकता है आपदा

By नीरज कुमार दुबे | Aug 27, 2026

नेपाल में ग्लेशियर ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ हिमालय की नाजुक भौगोलिक संरचना को उजागर नहीं किया है, बल्कि भारत की सीमा से सटे तिब्बत में चीन के निर्माणाधीन 60,000 मेगावाट के मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी खतरे की घंटी तेज कर दी है। नेपाल में सैंकड़ों लोगों की मौत और 750 लोगों के लापता होने की खबरों के बीच अब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक हिमालय में इतना विशाल बांध आखिर कितना सुरक्षित है।

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इस आपदा में 133 भारतीय नागरिकों समेत सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं। बड़ी संख्या में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालुओं के भी प्रभावित होने की खबर है। घर, सड़कें और बिजली परियोजनाएं पानी के तेज बहाव में बह गईं। भू-आकृति विशेषज्ञ डेनियल शुगर के आकलन के मुताबिक, ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के खिसककर टूटने और पिघलती बर्फ से बने पानी ने इस भयावह घटना को जन्म दिया।

लेकिन नेपाल की यह त्रासदी अब भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। इसकी वजह है चीन का मेदोग या मोटुओ हाइड्रोपावर स्टेशन, जिसका निर्माण यारलुंग त्सांगपो नदी पर किया जा रहा है। यही नदी भारत में प्रवेश करते ही अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है।

करीब 60 गीगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बन सकती है। इसके 2033 तक चालू होने का लक्ष्य बताया गया है। परियोजना की अनुमानित लागत 137 अरब डॉलर से 170 अरब डॉलर के बीच है और इसमें यारलुंग त्सांगपो के विशाल मोड़ वाले क्षेत्र में पांच चरणों में जलविद्युत ढांचा विकसित करने की योजना है।

सबसे बड़ा सवाल इसकी विशालता नहीं, बल्कि इसका स्थान है। मेदोग परियोजना उस हिमालयी क्षेत्र में बनाई जा रही है जहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव होता है। जुलाई में चीन की सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण व्यवस्था से जुड़े भूवैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने भी परियोजना स्थल के नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट होने की बात कही थी। यानी जिस क्षेत्र में धरती की हलचल स्वयं एक स्थायी खतरा है, वहीं दुनिया का सबसे विशाल बांध खड़ा किया जा रहा है।

रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इसे “वॉटर बम” की संज्ञा देते हुए चेतावनी दी है कि किसी बड़े भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन या अचानक जलप्रवाह की स्थिति में इसका असर भारत के पूर्वोत्तर और आगे बांग्लादेश तक पड़ सकता है। पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने भी अरुणाचल और असम के लिए कहीं बड़ी तबाही की आशंका जताई है।

वहीं भारत की चिंता केवल संभावित बांध दुर्घटना तक सीमित नहीं है। चीन नदी के ऊपरी हिस्से को नियंत्रित करता है। हालांकि ब्रह्मपुत्र के जल का बड़ा हिस्सा भारत में मानसूनी सहायक नदियों से आता है, फिर भी तिब्बत से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा और समय में बड़े बदलाव अरुणाचल और असम के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं। भारी बारिश के दौरान अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा गया तो बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि सूखे दौर में प्रवाह कम होने से कृषि, मत्स्य पालन और स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पहले ही इस परियोजना को अस्तित्व से जुड़ा खतरा बता चुके हैं। भारत ने जवाबी रणनीति के तौर पर सियांग नदी पर 11,000 मेगावाट की अपर सियांग मल्टीपर्पज परियोजना को आगे बढ़ाया है, जिसका एक उद्देश्य ऊपरी हिस्से से आने वाले अचानक जलप्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कवच तैयार करना है। हालांकि इस परियोजना को लेकर अपर सियांग की आदि जनजातीय समुदायों में विस्थापन और पारदर्शिता को लेकर विरोध भी मौजूद है।

देखा जाये तो नेपाल की त्रासदी ने पूर्व चेतावनी का एक गंभीर सवाल खड़ा किया। आरोप है कि तिब्बत की ओर से आने वाली इस विशाल जलराशि के बारे में नेपाल को समय पर सूचना नहीं मिली। भारत के लिए भी यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत के बीच ऐसा कोई व्यापक जल-साझेदारी समझौता नहीं है, जिसके तहत वास्तविक समय में व्यापक हाइड्रोलॉजिकल जानकारी साझा करना अनिवार्य हो।

हिमालय ने नेपाल की बाढ़ के जरिए एक बार फिर बता दिया है कि यहां खतरा केवल भूकंप का नहीं है। ग्लेशियर ढह सकते हैं, पहाड़ टूट सकते हैं, भूस्खलन नदी का रास्ता बदल सकते हैं और देखते ही देखते शांत जलधारा विनाश की दीवार बन सकती है। ऐसे में सक्रिय फॉल्ट लाइन के ऊपर खड़ा हो रहा चीन का मेदोग मेगा डैम केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। बहरहाल, नेपाल की तबाही एक स्थानीय आपदा भर नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है, क्योंकि पहाड़ जब करवट लेता है, तो सीमाएं उसकी तबाही को रोक नहीं पातीं।

-नीरज कुमार दुबे

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