15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी

देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा और किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन ऐसे समय पर हो रहा है, जब मध्य एशिया वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया मैदान बन चुका है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एससीओ शिखर सम्मेलन में शिरकत करने की पुष्टि करते हुए उनके उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान दौरे के कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी जिसके बाद पूरी दुनिया में हलचल-सी मच गयी है। हलचल इसलिए मची है क्योंकि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बार फिर एक साथ दिखाई देंगे, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीने पर पिछले साल की तरह फिर से सांप लोट सकते हैं। पिछली बार चीन के तियानजिन में एससीओ मंच पर इन तीन नेताओं की तस्वीर ने अमेरिकी रणनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी थी। तब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ट्रंप की टैरिफ नीतियों को भारत-अमेरिका रिश्तों को दशकों पीछे धकेलने वाला कदम बताया था और कहा था कि ऐसी नीतियों ने मोदी को पुतिन और शी के और करीब पहुंचा दिया। अब दृश्य और बड़ा है। पहले मध्य एशिया, फिर नई दिल्ली यानि पहले एससीओ और उसके तुरंत बाद ब्रिक्स। संदेश साफ है कि भारत किसी की रणनीतिक जागीर नहीं है।
देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा और किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन ऐसे समय पर हो रहा है, जब मध्य एशिया वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया मैदान बन चुका है। चीन बेल्ट एंड रोड के जरिए अपनी पकड़ बढ़ा रहा है, रूस इस क्षेत्र को अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और अमेरिका भी यहां अपनी मौजूदगी तथा रणनीतिक पहुंच बनाए रखने की कोशिश में है। ऐसे में मोदी की सक्रिय कूटनीति भारत को खेल का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रही है।
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उज्बेकिस्तान इस रणनीति का अहम केंद्र है। मोदी की प्रस्तावित ताशकंद यात्रा व्यापार, रक्षा, निवेश, कनेक्टिविटी, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति दे सकती है। पिछले पांच वर्षों में भारत-उज्बेकिस्तान व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और द्विपक्षीय कारोबार लगभग 1.3 अरब डॉलर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। भारत का निवेश फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में फैला है, जबकि भारतीय विश्वविद्यालय भी उज्बेकिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
लेकिन इस यात्रा की असली ताकत केवल व्यापार के आंकड़ों में नहीं है। उज्बेकिस्तान भारत की मध्य एशिया रणनीति का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। पाकिस्तान द्वारा भूमि मार्ग अवरुद्ध रखने के कारण भारत के सामने संपर्क का प्रश्न लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा यानि आईएनएसटीसी और चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सामरिक महत्व रखते हैं। ईरान और पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिरता ने इन परियोजनाओं की राह कठिन जरूर बनाई है, लेकिन भारत के लिए विकल्प तलाशना अब मजबूरी नहीं, रणनीतिक आवश्यकता है।
अफगानिस्तान भी मोदी-मिर्जियोयेव वार्ता का बड़ा मुद्दा हो सकता है। स्थिर अफगानिस्तान के बिना दक्षिण और मध्य एशिया की कनेक्टिविटी, व्यापार और सुरक्षा की कोई भी बड़ी योजना अधूरी है। ताशकंद और नई दिल्ली पुनर्निर्माण, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता पर अधिक निकट समन्वय विकसित कर सकते हैं। इसके साथ ही रक्षा सहयोग, ‘दुस्तलिक’ सैन्य अभ्यास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान-तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों में साझेदारी भारत की मध्य एशिया नीति को नई धार दे सकती है।
इसके बाद बिश्केक में एससीओ का मंच मोदी को रूस और चीन समेत प्रमुख यूरेशियाई शक्तियों के साथ सीधे संवाद का अवसर देगा। भारत के लिए एससीओ केवल फोटो-ऑप नहीं है। आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता, ये सभी भारत के प्रत्यक्ष राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रश्न हैं। नई दिल्ली लगातार यह भी रेखांकित करती रही है कि कनेक्टिविटी परियोजनाएं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें तथा आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जा सकते।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू मोदी-पुतिन संबंध हैं। हम आपको बता दें कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मॉस्को यात्रा के दौरान पुतिन ने मोदी से एससीओ में मिलने की इच्छा जताई और भारत के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने की बात कही। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, परमाणु सहयोग और कृषि जरूरतों से जुड़े रिश्ते लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रूस के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखे हैं और यही मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
लेकिन असली भू-राजनीतिक धमाका इसके बाद हो सकता है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पुतिन और शी चिनफिंग की मौजूदगी की संभावना भारत की कूटनीतिक हैसियत को और मजबूत करेगी। यदि मोदी, पुतिन और शी एक ही मंच पर लगातार दो बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में मिलते हैं, तो यह किसी औपचारिक मित्रता की घोषणा नहीं होगी; लेकिन यह जरूर दिखाएगा कि विश्व राजनीति अब एकध्रुवीय निर्देशों पर नहीं चलती।
भारत, रूस और चीन के बीच मतभेद मौजूद हैं, विशेषकर भारत-चीन संबंधों में। इसलिए इसे किसी स्थायी त्रिपक्षीय गठबंधन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। मगर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक शासन सुधार, ग्लोबल साउथ की आवाज, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक आर्थिक संस्थाओं के सवाल पर तीनों देशों की बातचीत का प्रभाव अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों तक जरूर पहुंचेगा।
मोदी की उज्बेकिस्तान से बिश्केक और फिर नई दिल्ली तक फैली यह कूटनीतिक श्रृंखला एक बड़े संदेश का निर्माण करती है। संदेश यह है कि भारत अब मध्य एशिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है, रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंधों को नए आर्थिक आधार दे रहा है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद, दोनों को एक साथ साध रहा है और ब्रिक्स जैसे मंचों के जरिए ग्लोबल साउथ की राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है। वॉशिंगटन के लिए संदेश इसलिए असहज हो सकता है, क्योंकि दबाव, टैरिफ और रणनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति भारत को किसी खेमे में बांधने की गारंटी नहीं देती।
बहरहाल, मोदी की कूटनीति का मूल मंत्र साफ दिखाई देता है कि जहां भारत का हित, वहीं भारत का हाथ। अगले कुछ सप्ताह में ताशकंद, बिश्केक और नई दिल्ली के मंच शायद यही साबित कर दें कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अपनी शर्तों पर चाल चलने वाला निर्णायक खिलाड़ी है।
-नीरज कुमार दुबे
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