India के लिए Water Bomb बना रहे Xi Jinping को चीनी वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी, प्रकृति से छेड़छाड़ बहुत भारी पड़ेगी

By नीरज कुमार दुबे | Jul 10, 2026

भारत के लिए ब्रह्मपुत्र पर महाबांध बनाकर मानो वाटर बम जैसी चेतावनी देने वाला चीन अब खुद गंभीर आशंकाओं के घेरे में आ गया है। दरअसल, तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी पर दुनिया की सबसे विशाल जलविद्युत परियोजना खड़ी करने की उसकी महत्वाकांक्षा पर उसके अपने वैज्ञानिकों ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। चीन के सरकारी समर्थन वाले भूवैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह महाबांध एक सक्रिय भ्रंश रेखा के ऊपर बनाया जा रहा है, जहां भूकंप, भूस्खलन और संरचनात्मक अस्थिरता का स्थायी खतरा मौजूद है। यह खुलासा केवल चीन की परियोजना की सुरक्षा पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि भारत और बांग्लादेश जैसे निचले प्रवाह वाले देशों की जल सुरक्षा, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी नई चिंताएं पैदा करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह चेतावनी किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं, बल्कि चीन के अपने वैज्ञानिकों ने दी है।

वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि इस भ्रंश रेखा ने आसपास की चट्टानों को कमजोर कर दिया है, जिससे किसी भी भारी निर्माण की नींव अधिक असुरक्षित हो जाती है। जलाशय के दोनों किनारों की ढलानों में मिट्टी और चट्टानों का जुड़ाव कमजोर है। लंबे समय तक पानी के दबाव, लगातार भूकंपीय गतिविधियों और भ्रंश रेखा की हलचल के कारण कभी भी विशाल भूस्खलन हो सकता है। उन्होंने यह भी चेताया कि निर्माण और संचालन के दौरान ढलानों को मजबूत करने तथा सुरक्षा अवरोध लगाने जैसे विशेष उपाय अनिवार्य होंगे, अन्यथा किसी भी समय बड़ी दुर्घटना हो सकती है।

हम आपको बता दें कि चीन का यह महाबांध प्रतिवर्ष लगभग तीन सौ अरब किलोवाट घंटा बिजली उत्पादन के लक्ष्य के साथ बनाया जा रहा है। इसकी क्षमता चीन के थ्री गार्जेस बांध से भी लगभग तीन गुना अधिक बताई जा रही है। जिस यारलुंग सांगपो नदी पर यह परियोजना बन रही है, वही नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र कहलाती है, फिर असम की जीवनरेखा बनते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। इसलिए इस परियोजना का प्रभाव केवल चीन की सीमा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की जल व्यवस्था पर पड़ सकता है।

भारत के लिए यह केवल पर्यावरण या जल संसाधन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक संतुलन का प्रश्न भी है। ब्रह्मपुत्र पूर्वोत्तर भारत की कृषि, पेयजल, मत्स्य पालन, जलविद्युत उत्पादन और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। यदि चीन किसी कारणवश जल प्रवाह को नियंत्रित करता है, पानी रोकता है, अचानक छोड़ता है या किसी प्राकृतिक आपदा के कारण बांध को नुकसान पहुंचता है, तो उसका सीधा असर अरुणाचल प्रदेश और असम सहित पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र पर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में विनाशकारी बाढ़, पर्यावरणीय तबाही और मानवीय संकट से इंकार नहीं किया जा सकता।

सामरिक दृष्टि से यह परियोजना और भी अधिक संवेदनशील है। चीन लंबे समय से तिब्बत के जल संसाधनों को अपनी रणनीतिक शक्ति के रूप में विकसित कर रहा है। सीमा विवाद के बीच ब्रह्मपुत्र जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी के ऊपरी हिस्से पर इतना विशाल बांध बनाना उसे भविष्य में जल प्रवाह पर प्रभाव डालने की क्षमता देता है। चाहे चीन इसे केवल बिजली उत्पादन की परियोजना बताए, लेकिन जल संसाधनों पर नियंत्रण स्वयं में एक प्रभावशाली रणनीतिक साधन होता है। किसी भी तनावपूर्ण परिस्थिति में यह क्षमता भारत के लिए दबाव का माध्यम बन सकती है।

रिपोर्टों के मुताबिक, चीन के वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि परियोजना क्षेत्र हिमालय की सबसे सक्रिय भूकंपीय पट्टियों में स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियाई विवर्तनिक प्लेटें लगातार टकरा रही हैं। अध्ययन में कहा गया है कि पैझेन क्षेत्र की भूगर्भीय गतिविधियां प्रारंभिक हिमयुग से लेकर वर्तमान काल तक लगातार जारी रही हैं। तलछट के अध्ययन से लगभग साढ़े नौ हजार वर्ष पहले तक सक्रियता के प्रमाण मिले हैं। वर्ष 2017 में तिब्बत के मिलिन क्षेत्र में आया 6.9 तीव्रता का भूकंप भी इस खतरे की ताजा याद दिलाता है। वैज्ञानिकों ने माना है कि क्षेत्रीय भूकंपों के दौरान भूस्खलन और चट्टानों के धंसने की घटनाएं आसानी से हो सकती हैं, जिससे परियोजना और वहां कार्यरत लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

भारत लंबे समय से चीन से सीमा पार बहने वाली नदियों पर अधिक पारदर्शिता, समय पर सूचना साझा करने और आपसी परामर्श की मांग करता रहा है। अब चीन के अपने वैज्ञानिकों की यह चेतावनी भारत की आशंकाओं को और मजबूत करती है। यदि बीजिंग वास्तव में अपने इस महाबांध को सुरक्षित मानता है तो उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पारदर्शिता दिखानी चाहिए, तकनीकी जानकारी साझा करनी चाहिए और निचले प्रवाह वाले देशों की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए।

यहां सबसे बड़ा प्रश्न चीन की उस विकास नीति पर है जिसमें प्रकृति को जीतने का अहंकार दिखाई देता है। हिमालय दुनिया की सबसे युवा और संवेदनशील पर्वतमालाओं में से एक है। यहां की नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जैव विविधता और पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन की आधारशिला हैं। ऐसे नाजुक भूभाग में केवल शक्ति प्रदर्शन और आर्थिक महत्वाकांक्षा के लिए विशाल परियोजनाएं खड़ी करना प्रकृति के साथ खतरनाक छेड़छाड़ है। इतिहास गवाह है कि जब मनुष्य प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा करता है तो उसका दुष्परिणाम सीमाओं से परे जाकर पूरी मानवता को भुगतना पड़ता है।

बहरहाल, भारत के लिए अब समय केवल चिंता व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस रणनीतिक तैयारी का है। सीमा पार जल प्रबंधन को राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। ब्रह्मपुत्र पर वास्तविक समय निगरानी तंत्र, उपग्रह आधारित पर्यवेक्षण, पूर्व चेतावनी व्यवस्था, पूर्वोत्तर में आपदा प्रबंधन क्षमता और जल कूटनीति को और मजबूत करना होगा। साथ ही बांग्लादेश सहित क्षेत्रीय साझेदारों के साथ समन्वय बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन पर पारदर्शिता और जवाबदेही का दबाव बनाना भी आवश्यक है। क्योंकि यदि भूकंप की दरार पर खड़ा यह महाबांध कभी डगमगाया, तो उसका कंपन केवल तिब्बत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसकी गूंज पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा, स्थिरता और भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

-नीरज कुमार दुबे

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