South China Sea में 14 देशों ने चीन को मिलकर 'घेर लिया', जवाब में J-16 Fighter Plane की ताकत दिखाने लगा Dragon

By नीरज कुमार दुबे | Jul 13, 2026

चीन को इन दिनों झटके पर झटके लग रहे हैं। एक ओर दक्षिण चीन सागर में उसकी समुद्री दावेदारी को लेकर दुनिया का बड़ा समूह खुलकर उसके खिलाफ खड़ा हो गया है, तो दूसरी ओर बीजिंग अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करके यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए तैयार है। यही वजह है कि एक तरफ चीन जापान के राजनयिक को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज करा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अपने सबसे ताकतवर लड़ाकू विमान की नई मारक क्षमता दुनिया के सामने प्रदर्शित कर रहा है। दोनों घटनाएं अलग जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे छिपा सामरिक और रणनीतिक संदेश एक ही है कि चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ रहा है और वह अपनी सैन्य शक्ति दिखाकर उस दबाव को संतुलित करने का प्रयास कर रहा है।

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चीन ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए बीजिंग स्थित जापानी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी को तलब किया और जापान पर क्षेत्रीय मामलों में हस्तक्षेप करने तथा शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। बीजिंग ने दोहराया कि दक्षिण चीन सागर पर उसकी संप्रभुता कभी नहीं बदली और वह पंचाट के फैसले को अवैध, अमान्य तथा बेकार कागज का टुकड़ा मानता है। इतना ही नहीं, चीन ने जापान पर पुराने विस्तारवादी इतिहास की याद दिलाने और नए सैन्यवाद को बढ़ावा देने जैसे आरोप भी लगाए। यह प्रतिक्रिया बताती है कि बीजिंग अब केवल कानूनी बहस नहीं कर रहा, बल्कि राजनीतिक और ऐतिहासिक तर्कों के सहारे भी अपनी स्थिति मजबूत दिखाने का प्रयास कर रहा है।

हम आपको बता दें कि असल विवाद की जड़ चीन की तथाकथित नौ रेखा वाली समुद्री सीमा है, जिसके आधार पर वह दक्षिण चीन सागर के अधिकांश हिस्से पर दावा करता है। यह दावा फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के दावों से टकराता है। वर्ष 2016 में फिलीपींस की याचिका पर अंतरराष्ट्रीय पंचाट ने स्पष्ट कर दिया था कि चीन के ऐतिहासिक अधिकारों का दावा मान्य नहीं है और संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून के तहत उसका कानूनी आधार नहीं बनता। इसके बावजूद चीन ने फैसले को मानने से इंकार कर दिया और विवादित जलक्षेत्र में अपनी नौसेना, तटरक्षक बल तथा कृत्रिम द्वीपों के जरिये सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ाई।

देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद गहरा है। दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है, जहां से हर वर्ष वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा गुजरता है। यदि इस क्षेत्र पर चीन का एकाधिकार मजबूत होता है तो वह केवल पड़ोसी देशों पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री सुरक्षा पर भी प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि अमेरिका, जापान, यूरोपीय देशों और अन्य साझेदारों ने पहली बार इतने व्यापक स्तर पर एकजुट होकर चीन के दावों को खुली चुनौती दी है। यह घटनाक्रम हिंद प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन की नई दिशा का संकेत माना जा रहा है।

इसी बीच, चीन ने अपने सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों में शामिल जे-16 की नई मारक क्षमता का प्रदर्शन कर यह दिखाने की कोशिश की कि उसकी वायु सेना तेजी से आधुनिक हो रही है। हाल ही में सामने आई तस्वीर में यह विमान अब तक के सबसे भारी हवा से हवा में मार करने वाले अस्त्रों के साथ दिखाई दिया। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाले आठ मिसाइल और निकट दूरी के दो आधुनिक मिसाइल लगाए गए हैं। चीनी रक्षा विशेषज्ञ इसे इस विमान का सबसे घातक स्वरूप बता रहे हैं, जो लंबी दूरी के हवाई युद्ध में अत्यधिक मारक क्षमता प्रदान कर सकता है।

यह विमान चीन की आधुनिक वायु शक्ति की रीढ़ माना जाता है। दो इंजनों वाला यह बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान उन्नत रडार, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, स्वदेशी इंजन और अत्याधुनिक सेंसर से लैस है। इसकी मारक क्षमता, लंबी उड़ान सीमा और भारी अस्त्र भार इसे हवाई प्रभुत्व, जमीनी हमले, समुद्री अभियान और शत्रु की वायु सुरक्षा को निष्क्रिय करने जैसे अभियानों में बेहद प्रभावी बनाती है। चीन ने इसका एक विशेष इलेक्ट्रॉनिक युद्ध संस्करण भी विकसित किया है, जो विरोधी की वायु सुरक्षा प्रणाली को कमजोर करने में सक्षम माना जाता है।

इस नई संरचना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष लंबी दूरी वाले आधुनिक मिसाइल हैं, जिनकी मारक दूरी लगभग दो सौ किलोमीटर तक बताई जाती है। इनके साथ लगाए गए निकट दूरी के मिसाइल अत्यधिक फुर्तीले लक्ष्यों को भी निशाना बना सकते हैं। इस संयोजन का उद्देश्य एक ही विमान को अधिकतम मारक क्षमता देना है, ताकि वह लंबे समय तक हवाई संघर्ष में सक्रिय रह सके। यही कारण है कि विश्लेषक इसे चलते फिरते मिसाइल भंडार की संज्ञा दे रहे हैं।

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह प्रदर्शन ऐसे समय सामने आया है जब चीन की समुद्री दावेदारी पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। इसलिए यह केवल सैन्य तकनीक का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक संदेश भी है। बीजिंग यह दिखाना चाहता है कि यदि कूटनीतिक मोर्चे पर उसे घेरा जाएगा तो वह सैन्य शक्ति के सहारे अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है। दूसरी ओर चीन स्वदेशी इंजनों, भारी परिवहन विमानों और हवा में ईंधन भरने वाले विमानों की संख्या बढ़ाकर लंबी दूरी तक सैन्य शक्ति पहुंचाने की क्षमता भी लगातार मजबूत कर रहा है।

बहरहाल, कुल मिलाकर चीन इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक समर्थन उसकी समुद्री महत्वाकांक्षाओं को चुनौती दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ वह आधुनिक हथियारों और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के जरिये अपनी छवि मजबूत करने में जुटा है। आने वाले समय में हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, समुद्री व्यापार और शक्ति संतुलन पर इन दोनों घटनाओं का दूरगामी प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है।

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