By संतोष उत्सुक | Jun 07, 2021
शुक्रिया सांसारिक ताकतों का जिन्होंने आखिर यह साबित कर ही दिया कि महाशातिर कोरोना की उत्पत्ति हमारे पुराने भाई के आंगन में हुई। किसी को कहा जाए कि यह गलत काम तुमने किया है, यह सब मानने या मनवाने वाले पर निर्भर करता है। ‘भाई’ तो बहुत पहले से शक्तिशाली, वैभवशाली और आत्मनिर्भर है, अब यह उनकी मर्ज़ी है कि वह माने या न माने। दुनिया में आना जाना लगा रहता है सो अच्छाई या बुराई के कीट पतंग भी तो यात्रा करते हैं। इस तरह से बीमारी के कीटाणु भी यात्रा कर सकते हैं। वैसे तो लाखों नजरिए इस बारे उपलब्ध हैं कि ऐसे होता है या वैसे होता है लेकिन यह भी तो नजरिया ही है कि पता नहीं कैसे होता है। कहते हैं वह छ फुट दूर से वार करता है तो क्या छ या नौ इंच की दूरी उसे अच्छी नहीं लगती होगी।
पडोस की नाली से बदबू आनी बंद हो जाए तो इम्युनिटी बढ़ सकती है। धूप में खड़े हों और गंजे सिर पर टोपी न लगाई हो तो क्या संक्रमण के कीटाणु मर जाते होंगे। मेडिकल वालों से पूछकर सेनिटाइज़र में परफ्यूम टपकाने से इसकी बिक्री बढ़ गई है, इससे ज़िंदगी महकेगी और बहकेगी भी। आम शरीर को चाहे थोड़ा बहुत कुछ हो जाए कम्पनी को कुछ नहीं हो सकता। अब तक यह खुशी की बात है कि भ्रष्टाचार, जमाखोरी, अधर्म की रक्षा करने, दूसरों का हक छीनने, अनैतिक कार्य करने, लाशें नदी में फेंकने, गलत आंकड़े पकाने से कोरोना नहीं होता है। दूसरों को ठिगना, काला, नीचा, छोटा, घटिया समझने से भी कुछ नहीं हो सकता। कई बार लगता है कि उनकी पसंद की बात न करो तो वे रिमोट से कोरोना करवा सकते हैं। अपने निगेटिव विरोधियों को पॉजिटिव घोषित करवा सकते हैं। जिसको चाहें पॉजिटिव से निगेटिव करवा सकते हैं। जिनके लिए कुछ मुश्किल नहीं होता उनके लिए सब मुमकिन होता है। अगर यह अफवाह स्थापित कर दी जाए कि वोट देने से कोरोना हो जाता है तो नए तंत्र का उदय हो सकता है। समाज यह मानने लग जाए कि नफरत फैलाने से भी कोरोना हो सकता है तो नई प्रेम क्रांति आ सकती है।
- संतोष उत्सुक