रुपया पहली बार 90 के पार: गिरावट के बीच महंगाई, आयात और घरेलू बजट पर गहरा असर

By Ankit Jaiswal | Dec 03, 2025

बुधवार को भारतीय रुपया पहली बार इतिहास में 90 प्रति अमेरिकी डॉलर के नीचे फिसल गया है, जिससे आर्थिक हलकों में चिंता और आम लोगों के बजट में दबाव दोनों बढ़ गए हैं। बता दें कि मंगलवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 89.94 पर बंद हुआ था, और भले ही यह गिरावट देखने में बहुत बड़ी न लगे, लेकिन इसका असर व्यापक स्तर पर महसूस किया जा रहा है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था आयात पर भारी रूप से निर्भर है, खासकर कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं पर। ऐसे में रुपये की कमजोरी सीधे घरेलू महंगाई को बढ़ाती है। गौरतलब है कि भारत करीब 90% कच्चा तेल और 60% से अधिक खाद्य तेल आयात करता है, जिससे ईंधन, रसोई का खर्च और परिवहन लागत में वृद्धि होना तय माना जा रहा है। इसी वजह से आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव आम परिवारों पर और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

जो छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं या योजना बना रहे हैं, उनके लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण बन गई है। डॉलर में फीस चुकाने वाले छात्रों को पिछले वर्ष की तुलना में 5 से 10 लाख रुपये तक अधिक खर्च करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, 50,000 डॉलर की वार्षिक फीस पहले लगभग 40 लाख रुपये होती थी, जो अब 45 लाख रुपये तक पहुंच रही है। वहीं, डॉलर में लिए गए शिक्षा ऋण की अदायगी भी अब 12-13% तक बढ़ गई है, जिससे मध्यम वर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

बता दें कि रुपये की कमजोरी के पीछे कई कारण गिनाए जा रहे हैं। भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं का असफल रहना और अमेरिकी टैरिफ का बढ़ना भारतीय बाजारों पर नकारात्मक असर डाल रहा है। इससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक इस वर्ष अब तक करीब 17 बिलियन डॉलर भारतीय शेयर बाजारों से निकाल चुके हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने हाल ही में भारत की मुद्रा प्रबंधन व्यवस्था को "स्थिर" से "क्रॉल-जैसी"  श्रेणी में रखा है, जिसका मतलब है कि रिजर्व बैंक अब रुपये को सख्ती से बचाने के बजाय धीरे-धीरे बाज़ार के अनुरूप चलने दे रहा है।

जानकारों के अनुसार, इस गिरावट का एक अनदेखा पहलू यह भी है कि इस बार डॉलर अपेक्षाकृत स्थिर है, इसलिए कमजोरी की मुख्य वजह घरेलू आर्थिक संकेतक हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि बढ़ता व्यापार घाटा, एफडीआई में सुस्ती और शेयर बाजार से विदेशी निकासी रुपये पर लगातार दबाव बना रहे हैं।

फिर भी एक वर्ग ऐसा भी है जिसे रुपये की गिरावट से फायदा हो रहा है विदेशों से आने वाली रेमिटेंसपर निर्भर परिवार। भारत ने 2024 में लगभग 138 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस प्राप्त की, और अब 500 डॉलर की मासिक भेजी गई राशि पहले की तुलना में 5,000 रुपये अधिक लेकर आ रही है। कई ग्रामीण और निम्न-आय वाले परिवारों के लिए यह अतिरिक्त रकम शिक्षा, इलाज या नए निवेश में बड़ी मदद बन रही है।

जहाँ तक रिजर्व बैंक का सवाल है, फिलहाल केंद्रीय बैंक रुपये को प्राकृतिक रूप से समायोजित होने दे रहा है। हालांकि, उसके पास 690 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जिससे जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप किया जा सकता है। लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि रिजर्व बैंकअल्पकालिक बचाव के बजाय दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है।

कुल मिलाकर रुपये का 90 के नीचे जाना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति, वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू नीतियों के बीच बदलते संतुलन का संकेत है। जैसे-जैसे रुपये में गिरावट जारी रहती है, वैसे-वैसे आम भारतीय परिवारों की मासिक योजनाओं, भविष्य की वित्तीय तैयारी और रोजमर्रा के खर्चों पर इसका असर गहराता जा रहा है।

अर्थव्यवस्था में इन उतार-चढ़ावों के बीच सवाल यही है कि आने वाले महीनों में स्थिति स्थिर होगी या भारतीय उपभोक्ताओं को और कठिन दौर का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि जो माहौल अभी दिखाई दे रहा है, उसके मुताबिक चुनौतियाँ आगे भी जारी रहने वाली हैं।

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