By Ankit Jaiswal | Nov 05, 2026
कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था और ब्याज दरों को लेकर बाजार की सोच पर भी दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल करीब 94 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। इसके बाद निवेशकों को लगने लगा है कि आरबीआई आने वाले समय में ब्याज दरें पहले के अनुमान से कम बढ़ा सकता है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक युद्ध चलने की आशंका घटने से तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता भी कुछ कम हुई है। इससे भारत के तेल आयात खर्च, महंगाई और रुपये पर दबाव घटने की उम्मीद है।
बाजार अब आने वाले समय में ब्याज दरों में कुल 75 से 100 आधार अंक तक बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहा है। एक बार में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। पहले दिसंबर की बैठक में 50 आधार अंक की बढ़ोतरी की चर्चा थी, लेकिन अब यह अनुमान घटकर 25 आधार अंक रह गया है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, अगले एक साल में कुल बढ़ोतरी का अनुमान भी करीब 100 आधार अंक से घटकर 75 आधार अंक पर आ गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की एक बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच लंबे संघर्ष की आशंका कम होना है। ब्रेंट तेल की कीमत पहले 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी। अब तनाव कम होने की उम्मीद से कीमतों में शामिल युद्ध का अतिरिक्त असर घटा है। हालांकि, पश्चिम एशिया में स्थिति पूरी तरह सामान्य होने को लेकर अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल खरीदकर पूरा करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और रुपये की कीमत कमजोर हो सकती है। कमजोर रुपया विदेश से आने वाली वस्तुओं को महंगा कर देता है, जिसका असर देश में महंगाई पर पड़ता है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के अर्थशास्त्री अभिषेक उपाध्याय का कहना है कि तेल की कीमतों में अब उतनी तेजी आने की आशंका नहीं है, जितनी पहले जताई जा रही थी। उनके मुताबिक, आगे कीमतें बढ़ने पर भी बाजार को इनके फिर नीचे आने की उम्मीद रहेगी। तेल सस्ता रहने से सरकार पर खाद की सब्सिडी का खर्च बढ़ने का दबाव भी कम हो सकता है।
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई को भी अब पहले जितनी सख्ती करने की जरूरत नहीं पड़ सकती। अक्टूबर में केंद्रीय बैंक ने आयातकों की डॉलर मांग कम करने के लिए कुछ कदम उठाए थे और विदेशी मुद्रा बाजार में भी दखल दिया था। गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, इन कदमों का असर दिखा है। 23 अक्टूबर को खत्म हुए सप्ताह में आरबीआई की शुद्ध डॉलर बिक्री घटकर 70 करोड़ डॉलर रह गई, जबकि विशेष अदला-बदली सुविधाएं बंद होने के बाद यह 80 से 100 अरब डॉलर प्रति सप्ताह के स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि, रुपये की स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार के नए आंकड़ों पर भी नजर रहेगी।
तेल सस्ता होने के बावजूद ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसकी वजह घरेलू महंगाई है। सेनगुप्ता का अनुमान है कि महंगाई औसतन करीब 5.2 प्रतिशत रह सकती है और अक्टूबर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों के कारण यह 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। उनका कहना है कि वैश्विक तेल महंगा होने के बावजूद खुदरा ईंधन की कीमतों में करीब 5 प्रतिशत ही बढ़ोतरी हुई, क्योंकि सरकार और तेल कंपनियों ने बढ़े खर्च का कुछ हिस्सा खुद उठाया। कंपनियां अपने पुराने नुकसान की भरपाई करना चाहेंगी, इसलिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत घटने की उम्मीद भी कम है। अल नीनो से जुड़ी आशंकाएं भी खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं।
सेनगुप्ता के मुताबिक, आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाकर मांग कम करने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि वह वास्तविक ब्याज दर को सकारात्मक बनाए रखना चाहता है। उनके अनुसार, देश में मांग के कारण नहीं, बल्कि आपूर्ति से जुड़ी दिक्कतों के चलते महंगाई का दबाव है।
बाजार में ब्याज दरों के उस स्तर का अनुमान भी घटा है, जहां पहुंचकर आरबीआई बढ़ोतरी रोक सकता है। इसे अंतिम दर कहा जाता है। अभिषेक उपाध्याय के मुताबिक, रातोंरात ब्याज दरों से जुड़े बाजार में इसका अनुमान 6.75 प्रतिशत से घटकर 6.25 प्रतिशत हो गया है। हालांकि, वह अभी भी अंतिम दर 6.25 प्रतिशत रहने की उम्मीद कर रहे हैं। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य अर्थशास्त्री कनिका पसरीचा का अनुमान 6 प्रतिशत है। उपाध्याय का मानना है कि रुपये में स्थिरता और विदेशी निवेश बढ़ने से आरबीआई को फैसले लेने में अधिक गुंजाइश मिलेगी। वहीं, बाजार में नकदी कम होने पर रातोंरात ब्याज दरें नीतिगत दर से ज्यादा भी बढ़ सकती हैं। गौरतलब है कि आगे ब्याज दरों की दिशा तेल की कीमतों, खाद्य महंगाई और रुपये की स्थिरता पर निर्भर करेगी।