By Ankit Jaiswal | May 17, 2026
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर भी दिखने लगा हैं। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती अस्थिरता के बीच भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया हैं। पहली बार रुपया 96 के पार फिसल गया, जिससे बाजार और कारोबार जगत में चिंता बढ़ गई है।
बता दें कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये की मजबूती पर पड़ता हैं। शुक्रवार को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रही, जिससे भारत का आयात खर्च बढ़ने की आशंका और गहरी हो गई हैं।
गौरतलब है कि एशिया की प्रमुख मुद्राओं में भारतीय रुपया इस समय सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 140 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो रुपये पर दबाव और ज्यादा बढ़ सकता हैं।
कमजोर रुपया आम लोगों की जिंदगी पर भी असर डालता हैं। क्योंकि भारत कच्चा तेल अमेरिकी डॉलर में खरीदता हैं, इसलिए रुपया कमजोर होने पर तेल आयात महंगा हो जाता हैं। इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और रोजमर्रा की चीजों पर दिखाई देता हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक रुपये में गिरावट आने से विदेशों से आयात होने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान, सोना, लक्जरी कारें, घड़ियां, खाने के तेल और प्राकृतिक गैस जैसी वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। इसके अलावा विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों और उनके परिवारों पर भी आर्थिक बोझ बढ़ सकता हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई भी बाजार में हस्तक्षेप कर रहा हैं ताकि रुपये में अत्यधिक गिरावट और अस्थिरता को रोका जा सके। हालांकि लगातार बढ़ती तेल कीमतों के कारण डॉलर की मांग बढ़ रही हैं, जिससे रुपये पर दबाव बना हुआ है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता हैं और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती हैं, तो भारत में महंगाई और आयात खर्च दोनों बढ़ सकते हैं। ऐसे में सरकार और आरबीआई को मिलकर स्थिति संभालने के लिए जरूरी कदम उठाने पड़ सकते हैं।