By अनन्या मिश्रा | Sep 05, 2026
आज यानी की 05 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा दही हांडी का पर्व मनाया जा रहा है। यह जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण की माखन लीला को याद किया जाता है। दही हांडी पर्व पर जगह-जगह गोविंदा की टोलियां एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ा जाता है। देश के कई हिस्सों में इस पर्व की रौनक देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का पर्व क्यों मनाया जाता है और इसका शुभ मुहू्र्त क्या है और पूजा कैसे करें।
जन्माष्टमी की रात में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का मुख्य अनुष्ठान किया जाता है। फिर अगले दिन श्रीकृष्ण के बाल रूप और नटखटपन की लीलाओं का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रीकृष्ण को माखन बहुत पसंद था। कान्हा अक्सर गोपियों का माखन चुराते थे। माखन चोरी से परेशान होकर गोपियों ने मटकी को जमीन से ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया, जिससे कि बाल कृष्ण वहां तक न पहुंचे।
लेकिन नटखट कृष्ण अपने सखाओं के साथ आते और एक-दूसरे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते थे। वहीं सबसे ऊपर रहने वाला साथी मटकी को फोड़ देता था। जिसके बाद सब दही और माखन का आनंद लेते थे। कान्हा की इस लीला की याद में दही हांडी का पर्व मनाया जाता है।
इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद श्रीकृष्ण या फिर लड्डू गोपाल की पूजा करें। इसके बाद भगवान पंचामृत से स्नान कराएं और फिर बाद में साफ जल से स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनें। अब कान्हा को बांसुरी, मुकुट और चंदन का तिलक लगाएं और उनका सुंदर सा श्रृंगार करें। कान्हा को सजाने के बाद उनको झूले में बिठाएं और श्रद्धा व भक्ति के साथ उनको झूला झुलाएं।
एक छोटी मटकी में मक्खन, दही, पोहा, सूखे मेवे और कुछ सिक्के डालकर पूजा घर में रखें। भगवान श्रीकृष्ण को पंचमेवा, मक्खन-मिश्री और गोपालकाला का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा पूरी होने के बाद सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें।