By अभिनय आकाश | Oct 29, 2026
सिर के गिरते हुए बाल और आंखों में छलकता आक्रोश... यह महज एक तस्वीर नहीं, हमारे सिस्टम के मुंह पर लगा एक जोरदार तमाचा है। जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो अपनी आवाज़ सुनाने के लिए एक नौजवान को किस हद तक जाना पड़ता है? जवाब है-113 दिनों की भूख और एक महिला का मुंडवाया हुआ सिर! केरल में सरकारी नौकरी की लिस्ट में नाम आने के बावजूद नियुक्तियों के इंतजार में एक महिला अभ्यर्थी ने अपना सिर मुंडवा लिया। 113 दिन... जी हां, 113 दिन से यह आंदोलन चल रहा है, मगर सत्ता के गलियारों तक इसकी गूंज नहीं पहुंची। यह विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहा है? देश के तमाम पेशेवर एक्टिविस्ट, मोमबत्ती ब्रिगेड और सुबह-सुबह लोकतंत्र बचाने का ठेका लेने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने एक मिसाल कायम कर दी है। मिसाल खामोशी की, मिसाल चुप्पी की भी और डबल स्टैंडर्ड की भी। जिस पर गिनीज बुक वाले भी शोध कर सकते हैं। देश के सबसे साक्षर राज्य केरल जिसका एजुकेशन और हेल्थ मॉडल आए दिन सोशल मीडिया के पन्नों पर ऐसा चिपकाया जाता है मानो बाकी दुनिया तो अभी अक्षरों की पहचान ही कर रही है। लेकिन उसी केरल में पिछले 113 दिन से ज्यादा दिनों से शिक्षक भर्ती को लेकर धरना चल रहा है। भूख हड़तालें हो रही है और नौबत यह आ गई है कि हमारी बहनें और महिलाएं विरोध में अपने सिर के बाल मुंडवा रही हैं। लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर्स एलपीएसटी की केपीएससी परीक्षा पास करके मेरिट लिस्ट में रैंक लाकर यह पढ़े लिखे युवा नियुक्ति पत्र मांग रहे हैं। लेकिन सरकार के कानों तक आवाज पहुंचने भी तो कैसे? आखिर क्यों 115 दिन से सड़कों पर हैं केरल के युवा? क्या कर रही है वहां की लेफ्ट सरकार? सवाल उन विपक्षी पार्टियों से भी चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी जो दिल्ली में कुछ और बोलती हैं और राज्यों में उनका स्टैंड कुछ और हो जाता है! ऐसे में बिना किसी लाग-लपेट के राजनीति के इस डबल स्टैंर्डर और केरल के ज्वलित सवाल का एमआरआई स्कैन करते हैं जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया।
एक शिक्षक पर 30 बच्चों की बजाए 25 बच्चों की जिम्मेदारी हो। इससे ज्यादा शिक्षकों की जरूरत पड़ेगी और नियुक्तियों के मौके बढ़ सकते हैं।
हेड टीचर या हेड मास्टर के खाली पदों को भी पीएससी के जरिए भरा जाए।
मौजूदा रैंक लिस्ट की समयसीमा बढ़ाई जाए ताकी उम्मीदवारों को इस लिस्ट के जरिए नौकरी पाने का मौकका और समय दोनों ही मिल सके।
मौजूदा रैंक लिस्ट से नियुक्तियां पूरी होने तक नई नौकरी का नोटिफिकेशन जारी न किया जाए। यानी उम्मीदवारों का कहना है कि पहले मौजूदा लिस्ट से खाली पदों पर भर्ती की जाए और उसके बाद नई भर्ती की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।
ऑल केरल लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर (LPST) रैंक होल्डर्स एसोसिएशन की सचिव वलारमथी ने नियुक्तियों में देरी के विरोध में अपना सिर मुंडवा लिया। उन्होंने एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को टेंट लगाने से रोक दिया, जिसकी वजह से भूख हड़ताल पर बैठे लोग बारिश में भीगने को मजबूर हो गए। सरकार ने यह कहा कि जिन सरकारी स्कूलों के लोअर प्राइमरी सेक्शन में 150 से ज्यादा छात्र हैं, वहां हेड टीचर के पदों को भरने के लिए पीएससी को भेजा जाएगा। इन पदों पर मौजूदा रैंक लिस्ट से नियुक्तियां करने की बात भी कही गई। रैंक लिस्ट की समय सीमा बढ़ाने तक की बात हुई। लेकिन इसके बाद भी प्रदर्शन खत्म नहीं हुआ। इसकी वजह समझने के लिए 30 सितंबर की बैठक को लेकर एसोसिएशन के सचिव वलारमती का पक्ष जानना जरूरी है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए इंटरव्यू में वलारमती ने बताया कि बैठक के दौरान अधिकारियों ने कहा था कि अगर प्रदर्शनकारी प्रदर्शन खत्म कर लेते हैं तो उनकी मांगे स्वीकार करने का आदेश जारी किया जाएगा। उनका कहना है कि मंत्री उनकी मांगों को मानने के लिए तैयार थे लेकिन लिखित में आश्वासन देने को तैयार नहीं थे। इसी नाराजगी के बीच 27 अक्टूबर को वलारम ने अपना सिर मुंडवा लिया और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनका कहना है कि सरकार ने मांगों पर कारवाई करने का भरोसा तो दिया था लेकिन अब तक उन्हें उसका कोई नतीजा देखने को नहीं मिला था। बलारमती ने एक वीडियो साझा कर यह आरोप भी लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बारिश से बचने के लिए छतरी या शेड लगाने की अनुमति नहीं दी थी। उनका कहना है कि भूख हड़ताल पर बैठे लोगों को बारिश में बैठना पड़ा। अब इस पूरे मामले में राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। सूबे में 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ यानी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार है। वि डी सतीशन राज्य के मुख्यमंत्री हैं।
यह पहली बार नहीं है जब वलारमथी ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की है। अगस्त में, उन्होंने 13 दिनों का उपवास तब खत्म किया था, जब सामान्य शिक्षा मंत्री एन. शम्सुद्दीन ने संघ के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उनकी मांगों पर विचार करने के लिए 45 दिन का समय मांगा। उस समय तक यह व्यापक आंदोलन 37 दिनों से चल रहा था। 30 सितंबर को सरकार ने कहा कि वह अधिकांश मांगों को मानने के लिए सहमत हो गई है। सरकार ने बताया कि जिन सरकारी स्कूलों के लोअर प्राइमरी सेक्शन में 150 से अधिक छात्र हैं, वहां प्रधानाध्यापक के पदों के लिए PSC को सूचित किया जाएगा, ताकि मौजूदा रैंक लिस्ट से नियुक्तियां की जा सकें। मंत्री ने यह भी कहा कि लिस्ट की वैधता खत्म होने के बाद, इसे बढ़ाने के अनुरोधों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा।
देश भर में घूम-घूम कर युवाओं के रोजगार और शिक्षा पर लंबी चौड़ी भाषण बाजी करने वाली कांग्रेस को अचानक केरल के इस मामले में सांप क्यों सूंघ गया है? क्या वहां हाथ मिलाने की कोई मजबूरी है या वहां शिक्षकों का दर्द पॉलिटिकल माइलेज नहीं दे रहा। जब अपनी सहूलियत हो तो शिक्षा देश को आगे बढ़ाएगी और जब अपनी राजनीति पर बात आए तो शिक्षकों को सड़क पर मुंडन करवाने के लिए छोड़ दीजिए। केरल में प्रदर्शन आज भी जारी है। लड़कियां अपने बाल कटवाकर सवाल पूछ रही हैं। युवा भूख से निढाल होकर अपने हक का लेटर मांग रहे हैं। लेकिन अब देखना यह है कि वामपंथी सरकार के कान में पर्दा कब फटता है और इन सेलेक्टिव एक्टिविस्ट का इंटरनेट पैक कब रिन्यू होता है ताकि वह केरल के इन शिक्षकों के हक में भी कम से कम एक ट्वीट ही कर सके।