दास्तान-ए-सांड (व्यंग्य)

By डॉ. मुकेश असीमित | Nov 25, 2024

जन्म दिवस मेरा अभी दूर है। परिवार में एक महीने पहले ही चर्चा शुरू हो गई है कि इस दिवस को कैसे अनूठा बनाया जाए। इस बार गायों को चारा और गुड़ खिलाकर मनाने का फैसला हुआ है। शहर में भी देखा-देखी कई गौ आश्रम खुल गए हैं। जब से हमारे आयुर्वेदिक प्रचारक योग गुरु बाबा ने हर सौंदर्य प्रसाधन, खानपान, दवा-दारू में गाय का तड़का लगाया है, देश में गायों के प्रति प्रेम उच्च कोटि का जाग्रत हो गया है। गाय और गाय के सभी उत्पाद, जैसे गौमूत्र, दूध, दही, घी, योगर्ट, गोबर, पनीर—सब 5-स्टार रैंकिंग वाले शो रूम में सज गए हैं। देसी गाय की पहुँच अब देशवासियों के लिए अपनी औकात से बाहर की बात हो गई है।

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पंडित जी के कर्मकांडों की दक्षिणा स्वरूप गौदान जहाँ सबसे महत्वपूर्ण दान होता था, उसकी जगह अब पंडित जी हाई-टेक सुविधा से दक्षिणा की राशि UPI से अपने मोबाइल में ट्रांसफर करवा लेते हैं। गायें पंडित जी के आंगन से निकलकर अब गौ आश्रम में हांक दी गई हैं। मेरे जैसे लोग, जिन्हें अपना जन्म दिवस यादगार बनाना है, इन्हीं आश्रमों में जाकर गायों को घास चराने वाले हैं। साथ ही फोटो खींचकर फेसबुक पर डालकर अपने गौ प्रेम की असीम झलक प्रदर्शित करने वाले हैं।

बचपन में हमें दो ही माताएं बताई गई थीं—एक, हमें चप्पलों से पीटकर संस्कार भरने वाली हमारी मम्मी, और दूसरी गाय माता। पिताजी भी दो हैं, यह भी बचपन में ही जान लिया। एक, हमारे खाल उधेड़ने की गाहे-बगाहे धमकी देने वाले पिताजी, और दूसरे, महात्मा गांधी जी, जिन्हें हमारे स्कूल के मास्साब ने बेंत की सुताई से आखिरकार रटा ही दिया था।

लेकिन इसी बीच गायों के भाई, बाप, खसम स्वरूप बैल और सांड से भी बचपन से जुड़ाव रहा। पापा के मुँह से कभी-कभार हमें “बनिया का बैल ही रहेगा तू" सुनने को मिल जाता। उस समय हम नहीं समझते थे कि पापा का मतलब हमें बेकार, निकम्मा, निठल्ला साबित करने का था। बैल की दुर्दशा उस समय इतनी दिखती नहीं थी, जितना पापा हमें “बनिया का बैल” कहकर उसकी महिमा को कम आंकते थे।

सुबह-सुबह गाँव की कच्ची सड़कों की गंडारों में बैल गाड़ी खींचने वाले ये बैल, किसान की चाबुक की मार और पूँछ मरोड़कर बैलगाड़ी को एक्सेलरेटर देने का काम करते। बैल के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज़ सुबह-शाम गाँव की गलियाँ गुंजायमान करती। गाँव के बाहर खेतों में ये बैल हल में जुते जुताई करते, तेली के कोल्हू में तेल निकालते, धुनिया की रुई धुनते, और इक्के-दुक्के पक्के मकान बनाने में गारे-चूने के मिश्रण की चिनाई करते।

धीरे-धीरे मशीनीकरण ने पैर पसार लिए। किसानों को मशीनों का चस्का लग गया। ट्रैक्टर आने लगे, बैलों के काम को मशीनें खा गईं। बैल निरीह प्राणी बनकर बेकार हो गए। विसंगति यह है कि जहाँ गाय हिंदू धर्म में पूजनीय है, वहीं बैलों के लिए किसी ने नहीं सोचा। अगर गाय को माता माना गया, तो बैल को भी छोटा-मोटा बाप बना दिया जाता, लेकिन इंसान है न, गधे को तो बाप बना सकता है, पर बैल को नहीं।

आज ये बैल शहर की हर गली-मोहल्ले में दयनीय हालत में पड़े हैं। गौ आश्रम वाले गायों को पकड़-पकड़कर आश्रम में ढकेल रहे हैं। संस्था के सदस्यों को गाय और बैल में अंतर पहचानने की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। कई बार कुछ नए, अतिउत्साहित सदस्य गलती से बैल को पकड़ लाते हैं। गौ आश्रम के चालक उन्हें बैलों को लौटाने का आदेश देते हैं, और ऐसे सदस्यों को संस्था से बाहर कर दिया जाता है।

जहाँ स्टॉक मार्केट बुल और बेयर के भंवरजाल को कवरेज देता है, वहीं असल में जो वास्तविक बुल (बैल) सड़क पर पड़ा है, उसके लिए कोई कवरेज नहीं। स्कूल में बुलिंग किए जाने वाले बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है, लेकिन सड़क पर बुलिंग का शिकार होने वाले इस निरीह बैल पर किसी का ध्यान नहीं। अपनी दुर्दशा से पीड़ित यह बैल कभी-कभी सांड का उग्र रूप धारण करके सड़क पर कुंठापूर्वक लड़ते हैं। उस समय क्षणिक रूप से बाजार और शहर के नागरिकों का ध्यान उनकी ओर जरूर जाता है, लेकिन वह भी गाली-गलौज और उनके जीवन को धिक्कारने के रूप में ही मिलता है।

बैल अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाता हुआ शहर की गलियों, सड़कों और नालों पर पड़ा मिल जाएगा। शहर वाले सड़क और नाली की दुर्दशा पर आंसू बहाएंगे। न्यूज़पेपर वाले नगर पालिका को गालियाँ देते नजर आएंगे कि "फलां जगह सांड नाली में पड़ा हुआ तीन दिन हो गया, नालियाँ अवरुद्ध हो गईं, नालियों का पानी सड़क पर आ गया। नगर पालिका ने शहर की नालियों की सुध नहीं ली।" लेकिन कहीं भी यह शिकायत सुनने को नहीं मिलेगी कि "नगर पालिका ने सांड की सुध नहीं ली।"

नगर पालिका भी क्या करे! सरकार ने गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए तो विभिन्न मदों में बजट दे रखा है, लेकिन इन सांडों के लिए कोई बजट है ही नहीं। तो खर्च कैसे करें? सांडों के लिए न कोई यूनियन है, न चुनावी वादों में इनका नाम लिया जाता है। कई बार नेताओं की रैली में ये घुसकर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन नेताजी इसे रैली की सुरक्षा व्यवस्था में हुई लापरवाही बताते हुए विरोधी पार्टी की मिलीभगत पर ठीकरा फोड़ देते हैं और इसे एक और चुनावी मुद्दा बना लेते हैं।

बरसात में जब जमीन गीली हो जाती है, तो ये सांड सूखी जमीन की तलाश में बीच सड़क पर आश्रय लेने लगते हैं। लोग अपने वाहनों की चिल्लपों मचाते हुए, इनके अज्ञात मालिकों को गालियाँ देते हुए निकल जाते हैं। बेचारे सांड करें भी तो क्या? इनकी यही कुंठा कई बार उन्हें रोटी खिलाने वाले धर्मप्रेमी बुजुर्गों और महिलाओं पर भी निकल जाती है।

कारण? हर कोई अपनी-अपनी नजर से बताएगा। कुछ दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि "हड्डी जोड़ने वाले डॉक्टरों ने इन्हें खासतौर पर सब्जी मंडियों में छोड़ रखा है, ताकि ये हमारे लिए मरीज निर्माण करें।" खैर, जितने मुँह उतनी बातें। लेकिन वजह साफ है। जो भी रोटी खिलाने जाता है, वह आशा करता है कि गाय को खिलाएगा। जब गाय नहीं मिलती, तो मजबूरी में सांड को खिलाना पड़ता है, और शायद यही बात उन्हें पसंद नहीं।

जलीकट्टू जैसे पारंपरिक त्योहारों की मान्यता एक बार कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर काफी बवाल मचा। व्हाट्सएप ने जमकर ज्ञान फॉरवर्ड किया। ट्विटर ने अपनी चहचहाहट से माहौल गर्माया। फेसबुक और यूट्यूब पर वीडियो की बाढ़ आ गई। लेकिन कुछ दिनों बाद जनता यह भूल गई कि आखिर लड़ाई किसके लिए लड़ी जा रही थी। इंसान बुल फाइट के जरिए अपनी ईगो की भूख शांत करने की फिराक में है और इसमें खुश है। बुल को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।

अब मुझे बस एक ही आसरा लगता है—उन कथा वाचकों का, जो आजकल समाज सुधारक, मोटिवेटर और प्रेरक का काम संभाले हुए हैं। इनके एक इशारे पर जनता दिन को रात कर देती है। अगर ये इनकी सुध लें और बुल की असलियत को उजागर करें—जो कि पुराणों में अच्छे से वर्णित है, जहाँ यह नंदी, भगवान शिव की सवारी है—तो इसे सार्वजनिक रूप से "नंदी" नाम से पुकारा जाए। कोई इसे बैल या सांड नहीं कहेगा। मुझे लगता है कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग भगवान शिव की इस सवारी को फिर नजरअंदाज नहीं करेंगे। इनके लिए भी "नंदी आश्रम" खुलने लगेंगे।

कम से कम इन कथावाचकों से अनुरोध है कि इस मामले की गंभीरता को पहचानें और अपने चढ़ावे में से कुछ अंश इन नंदियों के कल्याणार्थ अलग रखकर एक अच्छी शुरुआत करें।

- डॉ. मुकेश असीमित

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