भारत में Data Centre क्षमता 5 गुना बढ़कर 7.5 GW पहुंचेगी, AI से मिलेगी रफ्तार

By Ankit Jaiswal | Nov 03, 2026

भारत में डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसका असर अब बड़े स्तर पर डेटा सेंटर कारोबार में भी दिखाई देने लगा है। इंटरनेट, ऑनलाइन भुगतान, वीडियो स्ट्रीमिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी सेवाओं की बढ़ती मांग के बीच देश में डेटा सेंटर बनाने पर बड़ी रकम खर्च होने वाली है। क्रिसिल रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2030 तक भारत में डेटा सेंटर की कुल क्षमता मौजूदा स्तर से करीब 5 गुना बढ़कर 7.5 गीगावाट हो सकती है। इस विस्तार पर अगले 4 वित्त वर्षों में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आने का अनुमान है।

क्रिसिल का कहना है कि इस विस्तार का फायदा तभी मिलेगा, जब कंपनियों को समय पर बिजली कनेक्शन, जरूरी सरकारी मंजूरी और निर्माण से जुड़ी सुविधाएं मिलेंगी। रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाली कुल क्षमता का करीब आधा हिस्सा पहले ही लंबे समय के समझौतों के तहत तय हो चुका है। वहीं, निर्माणाधीन क्षमता में से 95 प्रतिशत से अधिक के लिए ग्राहक पहले ही मिल चुके हैं। इससे परियोजनाओं के पूरा होने के बाद खाली रहने का खतरा कम होता है।

भारत में डेटा सेंटर बनाने की लागत भी दूसरे एशियाई बाजारों के मुकाबले कम है। क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक आनंद कुलकर्णी के मुताबिक, जमीन, निर्माण और मजदूरी की अपेक्षाकृत कम लागत के कारण भारत में डेटा सेंटर विकसित करना कई प्रतिस्पर्धी देशों से करीब 20 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। बिजली की कम दरों के चलते यहां किराया भी दूसरे बाजारों के मुकाबले 30 से 35 प्रतिशत तक कम है। इसके अलावा, नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाले बड़े परिसर वैश्विक कंपनियों के लिए भारत को और आकर्षक बनाते हैं।

हालांकि, इस तेजी से बढ़ते कारोबार के सामने बिजली की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन सकती है। क्रिसिल के अनुसार, आने वाली करीब 6 गीगावाट क्षमता का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा विशाखापत्तनम, मुंबई और हैदराबाद में विकसित होने की उम्मीद है। 2030 तक इन शहरों में डेटा सेंटर की बिजली जरूरत उनकी मौजूदा अधिकतम मांग के मुकाबले क्रमशः करीब 80 प्रतिशत, 60 प्रतिशत और 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। ऐसे में बिजली ग्रिड और ट्रांसमिशन व्यवस्था को समय रहते मजबूत करना जरूरी होगा।

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में मौजूदा डेटा सेंटर करीब 90 प्रतिशत क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। क्रिसिल के एसोसिएट निदेशक नितिन बंसल के अनुसार, ग्राहकों के साथ होने वाले समझौतों की अवधि भी बढ़कर 15 से 20 साल हो गई है, जबकि पहले यह 10 से 12 साल रहती थी। इससे कंपनियों को लंबे समय तक कमाई का भरोसा मिलता है। हालांकि, नए एआई कामकाज के लिए बेहतर शीतलन व्यवस्था और अधिक बिजली क्षमता वाले उपकरणों में लगातार निवेश करना होगा।

दूसरी ओर, बड़ी वैश्विक तकनीकी कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता भी जोखिम पैदा कर सकती है। 2030 तक कुल किराये पर दी गई क्षमता में इन कंपनियों की हिस्सेदारी 75 से 80 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2026 में 60 से 65 प्रतिशत थी। इससे कीमत तय करने में ग्राहकों का दबदबा बढ़ सकता है। डेटा सेंटर बनाने में कमाई शुरू होने से पहले 24 से 36 महीने तक निवेश करना पड़ता है, जिससे कर्ज का बोझ भी बढ़ता है। ऐसे में समय पर परियोजनाएं पूरी करना, लागत संभालना और बदलती तकनीक के मुताबिक सुविधाएं तैयार करना ही इस क्षेत्र की सफलता तय करेंगे।

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