मानवता की डिग्री (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jun 17, 2025

शासक बना राजनेता, जब उद्योग हो चुकी शिक्षा के माध्यम से मानव सेवा की बात करता है तो कितना अजीब लगता है। इस बार भी उन्होंने छात्रों से कहा कि केवल डिग्री लेने के लिए न पढ़ें बल्कि मानवता के सच्चे वाहक बनने की दिशा में आगे बढ़ें। एक बार यह लगा कि उनका संवाद किसी नाटक का हिस्सा है। यह बात किसी फिल्म में भी नहीं देख रहे थे। यह तो एक प्रसिद्ध विद्यालय के खेल मैदान में आयोजित वार्षिक समारोह में कही गई। उनके ऐसा कहने पर काफी लोगों ने खूब तालियां बजाई जिनमें छात्र भी शामिल रहे लेकिन कुछ छात्रों को उनके अभिभावकों द्वारा बैंक से लिए गए शिक्षा ऋण की न दी गई किश्तें याद आने लगी। वह दिन याद आने लगा जब उनके माता पिता पहली बार उन्हें इस परिसर में छोड़ने आए थे और कहा था, बेटा ध्यान से पढ़ना खूब मेहनत करना ।

उन विद्यार्थियों को लग रहा था कि प्रसिद्ध लोग, खुद को सात फुट ऊंचा समझते हुए, कैसी भी बातें करने के लिए अधिकृत होते हैं। नेताजी ने भी वैसा ही कहा कि जब आप किसी का इलाज कर रहे होते हैं तो किसी परिवार के एक सदस्य का नहीं पूरे परिवार की आशा और विशवास का इलाज कर रहे होते हैं। यह बात व्यवसायिक कोर्स कर रहे अधिकांश छात्रों के सर के ऊपर से निकल गई। उन्हें लगा कि वह अध्यात्म की कक्षा में हैं और योग भी सीख रहे हैं।

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मुख्य अतिथि चाहे काले, भूरे, लम्बे, तिकोने, चौरस या मोटे हों लगभग एक जैसी बात करते हैं। उन्होंने कहा मैं इस संस्थान की कार्यशैली, अनुशासन, समाज के प्रति प्रतिबद्धता की सराहना करता हूं। छात्रों ने खुद से कहा कि अब तो उन्हें भी संस्थान की धन कमाऊ व्यावसायिक कार्य शैली समझ आने लगी हैं। राजनीति के बेटे मुख्य अतिथि ने कहा, मुझे तो इस पंडाल में देश की सशक्त झलक मिल रही है। आप मुझे निस्वार्थ सेवक लग रहे हो। विद्यार्थियों को लगा वे तो यहां व्यावसायिक डिग्री लेने आए हैं। प्रशिक्षण लेकर दूसरे लोगों का स्वास्थ्य सुधार कर पैसे कमाने के काबिल बनकर जाना चाहते हैं। अपना व्यावसायिक जीवन शुरू कर बैंक का कर्ज भी चुकाना चाहते हैं ताकि अभिभावकों को भी गर्व महसूस हो कि उनके बच्चे अपने पांव पर खड़े हो गए हैं। जीवन में अच्छे सपने देख सकें, जिसमें मनपसंद जीवन साथी सहयोग करे और एक बार मिली ज़िंदगी सफलता से गुज़ार सकें। दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकें।  

विद्यार्थियों ने कार्यक्रम के समापन तक बैठना ही था लेकिन वे मुख्य अतिथि की आदर्श भरी बातों से खुद को जुड़ता हुआ न पा सके। उन्हें समझ आ रहा था, जीवन भी एक व्यवसाय है जिसका आर्थिक रूप से समृद्ध होना लाज़मी है।

- संतोष उत्सुक

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