By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 23, 2026
दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को पुलिस के उस नोटिस में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा से शांति बनाए रखने के लिए बॉण्ड भरने को कहा गया था। अदालत ने कहा कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) के पास बोरा के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सामग्री थी। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने बोरा की 17 अक्टूबर के नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि नोटिस कानूनी आवश्यकताओं के अनुरूप था और यह “केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं था।” अदालत ने कहा कि इस चरण में उच्च न्यायालय “एसईएम की जगह बैठकर” सामग्री के प्रति उनकी व्यक्तिपरक संतुष्टि की जांच नहीं कर सकता।
इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126 और 130 के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने से पहले एसईएम के पास कोई सामग्री नहीं थी।” अदालत ने कहा, “इतना कहना पर्याप्त है कि इस अदालत की राय में बीएनएसएस की धारा 126 के तहत कार्रवाई किए जाने से पहले मजिस्ट्रेट के पास पर्याप्त सामग्री थी।” बीएनएसएस की धारा 126 एसईएम को ऐसी स्थिति में बॉण्ड भरवाने का अधिकार देती है, जब विश्वसनीय सूचना हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक शांति भंग कर सकता है या ऐसा गलत कार्य कर सकता है, जिससे अशांति फैलने की आशंका हो। अदालत ने 46 पन्नों के फैसले में अस्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता उचित चरण पर (जिसमें एसईएम की ओर से अंतिम आदेश दिए जाने के बाद का समय भी शामिल है) नयी चुनौती पेश करने के लिए स्वतंत्र है। उसने पुलिस को निर्देश दिया कि वह जांच के समय याचिकाकर्ता को सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए।
अदालत ने एसईएम को यह सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया कि बॉण्ड भरने का आदेश देने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन न हो। निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शनों में अग्रणी भूमिका निभा रही बोरा ने नोटिस रद्द करने और पुलिस को उनके खिलाफ बलपूर्वक कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था। बोरा को 24 अक्टूबर को दोपहर दो बजे एसईएम के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया है।
बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी थी कि नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं है और लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करने में कुछ भी गलत नहीं है।